बिनायक सेन की रिहाई की मांग

बिनायक सेन

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बिनायक सेन की रिहाई की मांग की है.

एमनेस्टी इंटरनेशन का कहना है कि जिस क़ानून के तहत बिनायक सेन को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है वह अंतरराष्ट्रीय निष्पक्ष न्याय के मानकों का उल्लंघन करती है.

शुक्रवार को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक अदालत ने नक्सलियों को मदद करने के आरोप में देशद्रोह का दोषी पाया था और उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी.

मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्था पीयूसीएल ने इस फ़ैसले को वाहियात बताया था और सीपीएम ने इस फ़ैसले को अन्यायपूर्ण बताया था.

राजनीतिक आरोप

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि बिनायक सेन लोगों की शिकायतों को शांतिपूर्ण ढंग से उजागर कर रहे थे.

संस्था के एशिया-प्रशांत के निदेशक सैम ज़रीफ़ी ने कहा है, "बिनायक सेन के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और भारतीय अधिकारियों को चाहिए कि वे इन आरोपों को ख़त्म उन्हें रिहा करें."

समाचार एजेंसी एपी के अनुसार एक बयान में सैम जरीफ़ी ने कहा है, "एमनेस्टी इंटरनेशनल मानती है कि बिनायक सेन सच बोलने की सज़ा भुगत रहे हैं और उन्हें उन क़ानूनों के तहत सज़ा सुनाई गई है जो ज़ाहिर तौर पर अस्पष्ट है और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक क़ानूनों के मानकों के अनुरूप नहीं है."

सज़ा

रायपुर की अदालत ने बिनायक सेन को नक्सलियों के साथ साँठगाँठ और उनकी सहायता के आरोप में राजद्रोह और विद्रोह का दोषी पाया था.

उनके साथ नक्सली समर्थक नारायण सान्याल और कोलकाता के पीयूष गुहा को भी उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है.

डॉ. बिनायक सेन को मई, 2007 में बिलासपुर से गिरफ़्तार किया गया था.

उन पर आरोप लगाया गया था कि वे नक्सल समर्थक नारायण सान्याल का पत्र भूमिगत नक्सली नेताओं तक पहुँचाने जा रहे थे.

वे दो वर्षों तक जेल में रहे और आख़िर मई, 2009 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें ज़मानत मिल सकी थी.

लेकिन अदालत के इस फ़ैसले के बाद एक बार फिर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है.

बिनायक शुरु से राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की ज्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.

छत्तीसगढ़ पुलिस ने जिस जनसुरक्षा अधिनियम के तहत बिनायक सेन को गिरफ़्तार किया था उस क़ानून का वे तब से विरोध कर रहे थे जब सरकार ने इसे लागू करने का फ़ैसला किया था.

उनका तर्क था कि इस क़ानून का सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के ख़िलाफ़ दुरुपयोग किया जा सकता है.

बहुत से सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस क़ानून को 'पोटा से भी ख़तरनाक' बताया था.

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