पेंशन से नाराज़ है किन्नर

किन्नर
Image caption भीख मांगना, वेश्यावृत्ति और शादी ब्याह में नाच गाना ही किन्नरों की कमाई का ज़रिया होता है

दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने शहर के किन्नरों को हर महीने हज़ार रूपए पेंशन देने का निर्णय लिया है लेकिन किन्नर समुदाय ने सरकार की इस पहल पर नाराज़गी ज़ाहिर की है.

उनका कहना है मंहगाई के ज़माने में हज़ार रूपए काफ़ी नहीं है.

अब तक एमसीडी की पेंशन योजना के तहत केवल विधवाएं, विकलांग और वरिष्ठ नागरिक ही इसके हक़दार होते थे.

एमसीडी के मेयर पीआर साहनी कहते हैं कि ये फैसला किन्नरों के जीवन में सुधार लाने के मक़सद से लिया गया है.

उन्होंने कहा, ''समाज में किन्नरों की स्थिति बेहद दुखद है. हम उनका पुनर्वास तो नहीं कर सकते, लेकिन उन्हें मासिक पेंशन के रुप में कुछ रूपए दे सकते हैं.''

लेकिन किन्नरों का कहना है, ''महंगाई के इस दौर में हज़ार रुपये में उनका ग़ुज़ारा मुमकिन नहीं है.''

दिल्ली में पिछले दस सालों से रह रहीं किन्नर सुशीला एमसीडी की पेंशन योजना की निंदा करते हुए कहती है, ''1000 रुपये में मैं महीने भर का प्याज़, लहसुन और अदरक भी नहीं ख़रीद सकती. राशन की तो बात ही छोड़िए. क्या नगर निगम हमारे साथ मज़ाक कर रही है.''

भारत में किन्नरों की बिरादरी को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता. उनका मज़ाक उड़ाया जाता है, उपेक्षा की जाती है.

जैसे ही उनकी लैंगिक पहचान हो जाती है इनका परिवार भी उनका बहिष्कार कर देता है.

भीख मांगना नहीं छोड़ेंगे

लक्ष्मी भी भरे हुए गले से कहती हैं कि समाज में उन्हें सिर्फ एक हंसी के पात्र के रुप में देखा जाता हैं.

लक्ष्मी कहती हैं, ''‘ऐसा जन्म किसी दुश्मन के बच्चे को भी न मिले. समाज में हमें किसी लायक नहीं समझा जाता. अगर हमें कहीं नौकरी मिल भी जाए तो लोग हमें टेढ़ी नज़रों से देखेंगें हमारा मज़ाक उड़ाएंगें. ये सोचकर मुझे अपने जन्म पर अफ़सोस होता है.''

केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के तहत किन्नरों को कुछ नहीं मिलता है.

दिल्ली में मौजूद कऱीब ढाई लाख किन्नरों में से ज़्यादातर लक्ष्मी की तरह बेरोज़गार हैं. भीख मांगना, वेश्यावृत्ति और शादी ब्याह में नाच गाना ही किन्नरों की कमाई का ज़रिया होता है.

नगर निगम का कहना है उसने ये पेंशन योजना इस मक़सद से लागू की है कि किन्नरों को दूसरों के आगे हाथ न फैलाने पड़ें.

लेकिन किन्नरों का कहना है कि 1000 रुपये उनके लिए कोई मायने नहीं रखते हैं.

दिल्ली में रहने वाली एक किन्नर का कहना है, ''हज़ार रुपये में न तो मैं मकान का किराया दे सकती हूँ और न ही अपनी बीमारी का इलाज करवा सकती हूँ. पेंशन मिलने से मैं भीख मांगना तो नहीं छोड़ सकती.''

समाज में वृद्ध किन्नरों की स्थिति मुख्य रुप से दयनीय है. 58 वर्षीय आलिया उम्र के उस मोड़ पर हैं जहां न तो वे भीख मांगने जा सकती हैं और न ही नाच गा सकती हैं.

आलिया कहती हैं, ''मैं तीन दिन से बीमार पड़ी हूँ, मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं है. अस्पताल में डॉक्टर मोटी फीस मांगते हैं. मेरे पास इलाज के लिए भी पैसे नहीं हैं. सरकार को हमारे लिए मुफ्त चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध करवानी चाहिए.''

किन्नरों की मांग है कि उन्हें सरकारी विभागों में नौकरियां दी जानी चाहिए ताकि वे इज़्जत भरी ज़िंदगी बिता सकें.

प्रशिक्षण की मांग

मेयर पीआर साहनी का कहना है कि अपनी ओर से वे जो कर सकते थे उन्होंने किया अब किन्नरों की समाज में स्थिति सुधारने के लिए दिल्ली सरकार को भी कुछ कदम उठाने चाहिए.

उन्होंने कहा, ''दिल्ली नगर निगम की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. दिल्ली सरकार के लोक कल्याण विभाग को भी किन्नरों के बारे में सोचना चाहिए. जिस तरह से विकलांगों को प्रशिक्षित कर सरकारी विभागों में रोज़गार दिया जाता है उसी तरह किन्नरों को भी प्रशिक्षित कर उन्हें काम दिया जाना चाहिए.''

ये पेंशन योजना साल 2011 के अप्रैल माह से लागू की जाएगी. एमसीडी की इस नई पेंशन योजना के तहत दिल्ली में रहने वाले 18 साल से ज्यादा की उम्र के किन्नर पेंशन के हक़दार होंगे.

पेंशन पाने के लिए उन्हें किन्नर होने का मेडिकल प्रमाण पत्र देना होगा और जन्मतिथि का कोई भी प्रमाण दिखाना होगा इसके बाद उनके इलाके के एमसीडी ज़ोन से उन्हें हर माह पेंशन मिलनी शुरू हो जाएगी.

ये भी शर्त है कि किन्नर शादी शुदा नहीं होना चाहिए.

लेकिन लक्ष्मी कहती हैं कि उनके लिए इस पेंशन से ज़्यादा इस बात की ज़रूरत है कि समाज में उन्हें भी आम लोगों की तरह मानवाधिकार मिलें और साथ ही एक इज़्जत भरी ज़िंदगी भी.

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