अप्रिय सच्चाइयों से रूबरू कांग्रेस

मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी

कांग्रेस पार्टी के भारत में 125 साल पूरे होने पर 'द कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन नेशन' नाम की किताब जारी की है, इसमें पार्टी ने अतीत का विश्लेषण किया गया है. किताब का संपादन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने किया है.

इसके संपादक मंडल में नेहरू स्मृति संग्रहालय की निदेशक मृदुला मुखर्जी, जेएनयू के आदित्य मुखर्जी और सुचेता महाजन, भाष्यम कस्तूरी और रिज़वान क़ैसर शामिल हैं.

कुछ ख़बरों में मृदुला मुखर्जी के इसमें शामिल होने पर भी आपत्ति जताई गई है. दलील दी गई है कि सांस्कृतिक मंत्रालय की एक संस्था की निदेशक कैसे किसी पार्टी और उसके प्रकाशन से जुड़ सकती हैं.

इस किताब में कांग्रेस पार्टी के अपने बारे में और खासतौर से आपातकाल के बारे में बेबाक टिप्पणियाँ की गईं हैं.

ग़ौरतलब है कि जून 1975 में इमरजेंसी लगाई गई थी और ये जनवरी, 1977 तक जारी रही थी.

किताब में कहा गया है कि शुरुआत में जनता के एक बड़े वर्ग ने इमरजेंसी का स्वागत किया था क्योंकि इससे सामान्य प्रशासन में सुधार आया था. लेकिन दुर्भाग्य की बात ये थी कि जबरन नसबंदी और झुग्गी झोपड़ी हटाने जैसे कुछ कार्यक्रमों में ज़रूरत से ज्यादा उत्साह दिखाया गया जिसने जनता में नाराज़गी पैदा कर दी.

किताब कहती है कि इमरजेंसी के दौरान प्रधानमंत्री (इंदिरा गांधी) के हाथ में असीमित ताकत आ गई और इस दौरान संजय गांधी काफ़ी अहमियत वाले नेता बनकर उभरे.

इमरजेंसी पर सवाल

किताब में जयप्रकाश नारायण के बारे में कहा गया है कि उनकी ईमानदारी पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता, लेकिन उनकी विचारधारा अस्पष्ट थी.

किताब में जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन को कांग्रेस ने ‘संविधानेत्तर और अलोकतांत्रिक’ करार दिया है.

कांग्रेस का कहना है कि आरएसएस और जनसंघ ने संगठन शक्ति के बल पर जेपी आंदोलन पर कब्ज़ा कर लिया था और जयप्रकाश नारायण की भूमिका सीमित होकर रह गई थी.

उल्लेखनीय है कि जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आह्वान के बाद ही इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी.

राजीव गांधी के बारे में कहा गया है कि वो जल्द पार्टी और सरकार में जल्द बदलाव लाना चाहते थे, उन्होंने पार्टी में मौजूद सत्ता के दलालों पर हमला बोला लेकिन उन्होंने पार्टी के अंदर सुधार के जो वादे किए थे, वे पूरे नहीं हो सके.

किताब में पीवी नरसिंह राव की सरकार के बारे में कहा गया है कि नेहरू-गांधी परिवार के बाहर पहली बार कोई शख्स लगातार पांच साल तक प्रधानमंत्री रहा और आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाना उस सरकार की उपलब्धि रही.

किताब में उत्तर प्रदेश और कुछ राज्यों में चुनाव के दौरान राहुल गांधी की पहल की भी तारीफ़ की गई है. लेकिन दिलचस्प तथ्य ये है कि इसमें बिहार चुनाव का जिक्र नहीं है.

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