भुला दिया बटुकेश्वर दत्त को

किताब का कवर
Image caption बटुकेश्वर दत्त पर ये पहली किताब है जिसे अनिल वर्मा ने लिखा है.

भारत में स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों की उपेक्षा आम बात है और इसी श्रेणी में बटुकेश्वर दत्त का भी नाम लिया जा सकता है.

नवंबर 2010 में बटुकेश्वर दत्त की जन्म शताब्दी थी लेकिन इस दौरान किसी ने शायद ही बटुकेश्वर दत्त को याद किया होगा.

बटुकेश्वर दत्त पर न तो कोई डाक टिकट ही जारी हुआ है और न ही बड़े क्रांतिकारियों में ही उनका नाम शुमार किया जाता है.

भगत सिंह को छोड़ दें तो अधिकतर क्रांतिकारियों का यही हश्र हुआ है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए अनिल वर्मा ने बटुकेश्वर दत्त पर एक किताब लिखी है.

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यह पुस्तक बटुकेश्वर दत्त पर लिखी पहली पुस्तक है.

पेशे से मजिस्ट्रेट अनिल वर्मा विस्मृत क्रांतिकारियों पर पहले भी लिख चुके हैं और राजगुरु पर उनकी किताब काफी चर्चित रही थी.

वो बताते हैं, ‘‘राजगुरु पर शोध के दौरान ही मुझे लगा कि बटुकेश्वर दत्त पर काम होना चाहिए. कई तथ्य पता लगे जो नए थे तो मैंने काम शुरु कर दिया. उनकी बेटी से मुलाक़ात की जो पटना के एक कॉलेज में पढ़ाती हैं.’’

बटुकेश्वर दत्त ने भगत सिंह के साथ मिलकर 1929 में तत्कालीन ब्रितानी संसद में बम फेंका था और उसके साथ पर्चे भी. दोनों क्रांतिकारी वहां से भागे नहीं और गिरफ़्तारी भी दी.

अनिल वर्मा बताते हैं, ‘‘बटुकेश्वर दत्त का सबसे बड़ा काम यही कहा जा सकता है. आगरा में एक बम फैक्ट्री स्थापित की गई थी जिसमें बटुकेश्वर का बड़ा हाथ रहा. बम फेंकने के लिए उन्हें काला पानी की सज़ा दी गई. इससे पहले लाहौर में बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह और यतींद्र नाथ ने 144 दिनों की हड़ताल की. इस दौरान यतींद्र नाथ की मौत हो गई.’’

बटुकेश्वर दत्त देश की आज़ादी देखने के लिए बचे रहे लेकिन सारा जीवन उन्हें उपेक्षा में ही बिताना पड़ा.

अनिल वर्मा बताते हैं, ‘‘बटुकेश्वर दत्त को कोई सम्मान नहीं दिया गया स्वाधीनता के बाद. निर्धनता की ज़िंदगी बिताई उन्होंने. पटना की सड़कों पर सिगरेट की डीलरशिप और टूरिस्ट गाइड का काम करके बटुकेश्वर ने जीवन यापन किया. उनकी पत्नी मिडिल स्कूल में नौकरी करती थीं जिससे उनका घर चला.’’

अनिल बताते हैं कि एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे तो इसके लिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया. परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने पेशी हुई तो कमिश्नर ने उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लाने को कहा.

हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर जी से माफ़ी मांगी थी.

बटुकेश्वर जी का बस इतना ही सम्मान हुआ कि पचास के दशक में उन्हें एक बार चार महीने के लिए विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया.

अनिल वर्मा बताते हैं कि बटुकेश्वर दत्त का जीवन इसी निराशा में बीता और 1965 में उनकी मौत हो गई.

आज़ादी के साठ साल बाद बटुकेश्वर दत्त को एक किताब के ज़रिए याद तो किया गया लेकिन न जाने कितने ऐसे क्रांतिकारी हैं जिन पर अभी तक एक पर्चा भी नहीं लिखा गया है.