सुर्खियों में रहा छत्तीसगढ़

माओवादी हमला (फाइल फोटो)
Image caption छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने साल में कई हमले किए हैं.

भारत के इतिहास के सबसे बड़े नक्सली हमले, प्रदेश की पैदाइश के दस साल और रायपुर की एक अदालत द्वारा नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता बिनायक सेन को देशद्रोह के लिए उम्रक़ैद की सज़ा सुनाए जाने को लेकर छत्तीसगढ़ वर्ष 2010 में सुर्ख़ियों में बना रहा.

छह अप्रैल को दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में माओवादियों नें घात लगाकर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी के सीआरपीएफ के 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था.

इसके बाद से लगातार माओवादी हिंसा में इजाफा होता रहा और आंकड़े बताते हैं कि एक साल में नक्सली हिंसा में 372 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी जिसमें सुरक्षा बलों और आम नागरिकों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा.

इसी वर्ष 29 जून को नारायणपुर में माओवादियों ने 29 जवानों की भी घात लगाकर हत्या कर दी थी.

राज्य में एक के बाद दूसरी हिंसक वारदातें होती रही जिसने सूबे के बस्तर संभाग की ज़मीन को रक्त रंजित बना दिया. इस प्रदेश के एक बड़े इलाके में रहने वाले खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं. सुरक्षा बलों और माओवादी छापामारों में में चल रही आर पार की लड़ाई में पिछले एक साल के दौरान 129 लोग भी मारे गए हैं.

विकास

यह कहा जाता था कि खनिज सम्पदा से भरपूर छत्तीसगढ़ का इलाका अविभाजित मध्य प्रदेश में उपेक्षा का शिकार रहा. विकास में इस इलाके की वह भागेदारी नहीं थी जो बाक़ी के मध्य प्रदेश की थी. इसी लिए वर्ष 2000 के नवम्बर माह में मध्य प्रदेश से 16 ज़िलों को काट कर अलग छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ.

आज इस नए राज्य में 18 जिले हैं. कुछ नहीं से शुरू हुआ सफ़र अब एक दशक के बाद बहुत कुछ तक आ पहुंचा है. बकौल छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री रमन सिंह, जब अलग राज्य बना था तो यहाँ प्रति व्यक्ति आय मात्र दस हज़ार रूपए थी जो अब बढ़कर 38 हज़ार हो गई है.

उसी तरह अंकों की अगर बात की जाए तो छत्तीसगढ़ का विकास दर भी 11 .48 तक पहुँच गया है.

Image caption केंद्रीय बलों के दबाव के बावजूद छत्तीसगढ का बस्तर इलाक़ा माओवादियों के प्रभुत्व वाला ही माना जाता है.

चौबीस घंटों की आबाध्य बिजली की आपूर्ति, चौड़ी सड़कें, सस्ते मूल्य पर ग़रीबों को अनाज और एक बेहतर स्वस्थ्य व्यवस्था, यह सब कुछ उपलब्धियां है पिछले दस सालों की,जिसको लेकर छत्तीसगढ़ की सरकार ज़ोर से डंका बजा रही है.

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले दस सालों में रायपुर शहर का स्वरुप ही बदल गया है. चार लेन वाली सड़क, बड़े बड़े शापिंग माल और कांक्रीट का जंगल - बहुत तेज़ी से राजधानी का विकास हुआ है.

लेकिन यह तमाम सुविधाएं सिर्फ राजधानी तक ही महदूद हो कर रह गई हैं. रायपुर के बाहर विकास की रफ़्तार उतनी तेज़ नहीं है.

यूँ कहा जा सकता है कि राजधानी और ग्रामीण इलाकों का वही फर्क है जो इण्डिया और भारत का. ख़ास तौर पर उत्तरी और दक्षिणी छत्तीसगढ़ में अभी तक विकास की किरणें नहीं पहुँच पाई हैं जिसकी उम्मीद राज्य के गठन के बाद की जा रही थी.

रमन सिंह भी इस बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं, '' जिस तरह इन इलाकों का विकास होना चाहिए था नहीं हो पाया है. यहाँ मूलतः नक्सली समस्या की वजह से विकास का पहिया धीरे धीरे घूम पा रहा है.''

मगर सवाल उठता है कि अगर छत्तीसगढ़ की विकास दर बढ़ी है, अगर यहाँ के लोगों की प्रतिव्यक्ति आय बढ़ी है, अगर यहाँ धान का उत्पादन बढ़ा है तो फिर ग़रीबी की रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या क्यों बढ़ी ?

छत्तीसगढ़ के निर्माण के समय ग़रीबी की रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या 17 लाख थी जो अब बढ़कर 36 लाख हो गई है. छत्तीसगढ़ विधान सभा में विपक्ष के नेता रविन्द्र चौबे कहते हैं कि अभी भी सरकारी तंत्र सही तरीके से विकास योजनाओं को अमली जामा पहनाने में नाकामयाब रहा है.

रविन्द्र चौबे कहते है:" जहाँ तक जनवितरण प्रणाली का सवाल है इस पर सरकार के दावे खोखले हैं. इस प्रदेश में सात लाख बोगस राशन कार्ड धारी हैं. उनका चावल किसकी जेब में जा रहा है ? उसको कौन लोग अपनी कमी का जरिया बना रहे है ? इसका जवाब सरकार नहीं दे पा रही है. सरकार लोक लुभावन बातें करती है मगर आज भी छत्तीसगढ़ के जनवितरण प्रणाली में सर्वाधिक भ्रष्टाचार है."

वहीँ वरिष्ट पत्रकार जोज़फ जॉन कहते हैं कि विकास किसी एक दल की उपलब्धि नहीं है.

वो कहते हैं, ‘‘मैं समझता हूँ जब राज्य का गठन हुआ था तो इसकी नीव अजीत जोगी के समय पड़ी थी. बाद में जो भी सरकारें आईं उन्होंने काम को आगे बढ़ाया".

जोज़फ मानते हैं कि चिकित्सा, कानून व्यवस्था और आधारभूत संरचना में छत्तीसगढ़ नें काफी मेहनत की है.

दूसरी तरफ साहित्यकार गिरीश पंकज का कहना है सिर्फ योजनायें लाना ही उपलब्धि नहीं हो सकती.

वो कहते हैं कि योजनाओं का क्रियान्वयन सबसे महत्वपूर्ण है. वो मानते हैं कि अभी भी सरकार का तंत्र सुचारू ढंग से इन योजनाओं का क्रियान्वयन करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है.

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