जैतापुर पर जागी कांग्रेस

सरकोज़ी और मनमोहन सिंह
Image caption फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी की भारत यात्रा के बाद इस संयंत्र पर सहमति बनी थी

महाराष्ट्र कांग्रेस ने जैतापुर परमाणु बिजली कांप्लेक्स को लेकर हो रहे विरोध को देखते हुए इलाके में छह सदस्यीय समिति भेजने का फ़ैसला किया है.

वहाँ के स्थानीय लोग और कई पर्यावरणविद इस संयंत्र का विरोध कर रहे हैं और पार्टी के इस क़दम को विरोध को दबाने के तौर पर देखा जा रहा है.

9,900 मेगावाट का ये परमाणु बिजली कांप्लेक्स सरकारी कंपनी न्यूक्लियर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया और फ्रांस की कंपनी अरेवा के बीच सहयोग से बनना है.

इस संयंत्र को काफ़ी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि क्योंकि भारत ने दूसरे न्यूक्लियर सप्लायर्स को साथ जो समझौते किए हैं,ये संयंत्र इन समझौतों के बाद बनने वाला पहला संयंत्र होता.

दोनों कंपनियों के बीच आख़िरी समझौते पर हस्ताक्षर अगले वर्ष की पहली छमाही में होने हैं.

उधर पर्यावरणविद् और स्थानीय लोग इस संयंत्र के बनने का कड़ा विरोध कर रहे हैं.

पर्यावरणविदों का कहना है कि जिस इलाके में इस परमाणु संयंत्र को बनाया जाना है वहाँ का पर्यावरण काफ़ी संवेदनशील है. ये इलाका मैनग्रोव्स और अपनी जैवविविधता के लिए जाना जाता है.

जैतापुर संयंत्र के अलावा यहाँ कई दूसरी परियोजनाएं बननी हैं और इससे पर्यावरणविदों में काफ़ी चिंता है.

विरोध

इलाक़े में हफ़्तों से कई विरोध प्रदर्शन जारी हैं. उनकी कई शिकायते हैं.

उनका कहना है कि इस संयंत्र से इलाक़े को ख़तरा है ,उनकी शिकायत इस संयंत्र से निकलने वाले कचरे को लेकर है. उनकी शिकायत ज़मीन की सरकारी ख़रीद-फ़रोख्त को लेकर भी है.

वो कहते हैं कि अरीवा का सेफ्टी रिकॉर्ड काफ़ी ख़राब है और ये सब विदेशी दबाव के कारण किया जा रहा है.

बीबीसी से बातचीत करते हुए कांग्रेस नेता अनंत गाडगिल ने कहा कि कमेटी की कोशिश ये जानने की होगी कि क्या विरोध प्रदर्शन को भड़काया जा रहा है.

उनके मुताबिक ये रिपोर्ट क़रीब 15 दिनों में सरकार को सौंप दी जाएगी.

भारत में जितनी बिजली पैदा होती है, परमाणु बिजलीघर उसका मात्र 2.9 प्रतिशत ही पैदा करते हैं. सरकार की कोशिश है वर्ष 2020 तक इसे छह प्रतिशत तक बढ़ाना.

सरकार का तर्क है कि परमाणु ऊर्जा कोयले या तेल से पैदा की जाने वाली ऊर्जा से ज्यादा साफ़ होती है और अगर भारत की अर्थव्यवस्था को अगले दशक में नौ प्रतिशत की रफ़्तार की बढ़ना है तो ऊर्जा उत्पादन में हर वर्ष क़रीब सात प्रतिशत की बढ़ोत्तरी ज़रूरी है.

पिछले कुछ वर्षों मे देश में बड़ी परियोजनाओं से पर्यावरण को लेकर होने वाले ख़तरे पर कई बहस होती रही हैं.

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