सात जन्मों के साथ को लगी आंच

Image caption कामना तो सुखद वैवाहिक जीवन की ही होती है

भारत में इस वक़्त शादियों का मौसम है, एक एसा समय जो ज्योतिष कहते है लंबे और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए अच्छा है.

भारत में परंपरा रही है कि शादियां दो परिवार मिलकर आपस में तय कर लेते है और समाज का दबाव इतना रहता है कि लोगो के मन में तलाक़ का ख़याल आसानी से नहीं आता.

पर जैसे जैसे लोग ज़्यादा कमाने लगे है, पुराने नियमों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. अब आप कह सकते है कि इस साल शादी के बंधन में बंधने वाले जोड़े जीवनभर साथ रहे उसकी गारंटी नहीं.

डॉ गीतांजली शर्मा, गुड़गांव में विवाह सलाहकार है, उन्होंने बीबीसी को बताया – ‘‘यहां बहुत बड़ा बदलाव आया है, इतना बड़ा -- कि तलाक़ की दरें बढ़ रही हैं. पिछले पांच सालों में ही तलाक़ की दर में 100 फीसदी इज़ाफा हुआ है.’’

जिन लोगों का तलाक़ हो रहा है वो ज़्यादातर भारत के उच्च मध्यमवर्ग से है जिनका जीवन आर्थिक उन्नति की वजह से तेज़ी से बदला है और जिनकी जीवन से अपेक्षाएं अपने माता पिता और दादा दादी से अलग है.

और दिल्ली से सटे हुए गुड़गांव में इस बदलाव को देखा जा सकता है. गुड़गांव दो दशकों पहले तक एक गांव था. ..यहां के सरसों के खेत और खेतो में विचरती भैंसो ने शॉपिंग मॉल्स, कॉफी शॉप्स और बहुराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी को जगह दे दी है. हाल में गुड़गांव को दिल्ली से 25 किलोमीटर लंबी एक चमचमाती नई मेट्रो सेवा से जोड़ा गया है.

भारत में दुनिया भर की तलाक़दर के मुक़ाबले, तलाक़ लेने वालों की संख्या काफी कम है. यहां लगभग हर 1000 में एक शादी नहीं चल पाती. पर अब अदालतों में तलाक़ की इतनी अर्ज़ियां आ रहीं है कि सरकार ने दूसरे देशों की तरह ही तलाक़ देने को आसान बनाने का प्रस्ताव रखा है.

फिलहाल तलाक़ लेने में सालों लग जाते है.

बदलती मानसिकता

मोहित, एक आईटी कंपनी में काम करते है और अपनी पत्नी से आजकल केवल दिल्ली उच्च न्यायालय में ही मिल पाते है. दोनो का प्रेम किशोरावस्था में हुआ, बीस साल की उम्र में दोनो ने शादी कर ली और तीन साल पहले दोनों अलग हो गए जब उनकी पत्नी ने घर छोड़ दिया.

मोहित कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहा है पर साथ ही इस सोच में भी डूबा है कि आखिर कहाँ क्या चूक हो गई.

उसने मुझे बताया, “मेरी ये बात समझ में आ गई कि प्यार करने और शादी करने में बहुत अंतर है, ज़मीन आसमान का फर्क है. हम बात बात पर झगड़ते थे. हमारी पहली लड़ाई तो हनीमून से लौटते ही हो गई थी.”

मोहित का कहना है कि उनके रिश्ते के तनाव की जड़ में पुरानी और नई मानसिकता थी. उनके सास ससुर को ये रिश्ता पसंद नहीं था. वहीं उनकी मां भी बहुत दखल देती थीं. साथ ही वो स्वीकार करते है कि वो भी कई बार इस बात को स्वीकार करने में दिक्क़त महसूस करते थे कि उनकी पत्नी का भी एक स्वतंत्र कैरियर हो सकता है.

Image caption शादी के कुछ दिन बाद ही विमुखता शुरू होते देखी गई है

वे कहते है, “आज का भारतीय पुरुष, पहले के मुक़ाबले ज़्यादा जटिल व्यक्तित्व रखता है. हम अपनी पत्नियों को आधुनिक और प्रगतिशील देखना चाहते हैं और इसलिए ही उनसे हम शादी करते हैं. पर साथ ही हम चाहते है कि हमारी बीवियां हमारे लिए खाना बनाएं. हम चाहते है कि जब हम घर पहुंचे तो वे हमें घर पर मिलें.’’

स्वरुपा का दिसंबर में तलाक़ हो गया. उन्होंने भी अपने पति को छोड़ दिया. और उनका कहना है कि ये उन्हीं महिलाओं के लिए संभव है जो खुद कमाती है और जो वित्तीय रुप से सक्षम है या फिर जिनके परिवारों का साथ उनके साथ हो. विगत में तलाक़ लेने के बारे में सोचना भी असंभव था. स्वरुपा का मानना है कि अब तलाक़ की स्वीकार्यता समाज में बढ़ी है.

वह कहती हैं, “निजी तौर पर मैं लोगो को बताने से नहीं डरती कि मेरा तलाक़ हो गया है पर अब भी इसके खिलाफ़ सामाजिक धारणाएं अजीब अजीब अंदाज़ में नज़र आता है. मै अपने पूर्व पति के घर के पास घर ढ़ूंढ़ रही थी पर आपको पता है कि लोगो अकेली औरत को घर देने से कतराते है इसलिए इसमें काफी दिक्क़त आती है. ’’

पर ये तय है कि तलाक़ की दर बढ़ गई है और कुछ लोगों के लिए ये एक अच्छी ख़बर है.

जैसे विवेक पाहवा जो मुम्बई में रहते है और तलाक़शुदा लोगो के लिए एक शादी की वेबसाइट चलाते है, सेकंडशादी.कॉम.

उनका दावा है कि उनकी वेबसाइट पर 4,000 नए उपभोक्ता रोज़ आते है.

उनका कहना है, “हमारी नई वेबसाइट है, पर तीन सालों में, जब से हमने ये शुरु की है हमने लोगों की सोच में एक बड़ा परिवर्तन देखा है. और ये परिवर्तन दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगरों तक सीमित नहीं. धंधा अच्छा चल रहा है.’’

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