उल्फ़ा में फूट के संकेत

अरबिंद राजखोवा
Image caption राजखोवा ने उल्फ़ा के एक वरिष्ठ नेताओं को रिहा करने की अपील की है

भारत में प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फ़ा) के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सरकार से बातचीत शुरू करने के संकेत दिए हैं लेकिन कट्टरवादी गुट ने बिहु त्योहार के दौरान अलगाववादियों को दिए गए सुरक्षित आवाजाही के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है.

असम में बिहु का ये त्यौहार जनवरी में मनाया जाएगा.

इससे पूर्वोत्तर राज्य में प्रमुख अलगाववादी संगठन में टूट की संभवनाएँ नज़र आ रही हैं.

कट्टरवादी गुट के प्रवक्ता ने सोमवार को कहा कि बातचीत की वे परवाह नहीं करते और वे अपना संघर्ष जारी रखेंगे.

असम में तेल, प्राकृतिक गैस का भंड़ार है और वह पनबिजली में समृद्ध है. यहां सबसे ज़्यादा चाय की खेती होती है लेकिन पिछले तीस सालों से यहां हो रहे विरोध प्रदर्शनों और हिंसात्मक गतिविधियों के कारण यहाँ कोई निवेश नहीं कर रहा है.

असम की आज़ादी की मांग को लेकर उल्फ़ा का गठन 1979 में हुआ था.

सरकार का प्रस्ताव ठुकराया

उल्फ़ा के 'प्रचार सचिव ' अरुणोदय धहोटिया का कहना है कि, '' हम भी बिहु का त्यौहार अपने परिवारवालों के साथ मनाना चाहते है और सरकार हमें सुरक्षित आवाजाही का प्रस्ताव भी दे रही है लेकिन सरकार इस प्रस्ताव के ज़रिए हमें उससे बातचीत के लिए दबाव बना रही है लेकिन हमनें सरकार के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है.''

धहोटिया को उल्फ़ा के सैन्य विंग के प्रमुख परेश बरूआ का क़रीबी माना जाता है.

उनका कहना है कि जब तक सरकार बातचीत के एजेंडें में असम की संप्रभुता का मुद्दा नहीं शामिल करेगी तब तक वे बातचीत नहीं करेंगे.

असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने नए साल की शुभकामनाएँ देते हुए उल्फ़ा अलगाववादियों को अपने परिवारवालों के साथ बिहु त्यौहार मनाने के लिए सुरक्षित आवाजाही का भरोसा दिलाया था.

तरूण गोगोई ने अपने संदेश में कहा था, ''हम सभी अलगाववादियों को बातचीत के लिए एक टेबल पर लाना चाहते है ताकि सभी मुद्दों का हल बातचीत के ज़रिए निकाला जा सके, न कि बंदूक से. ''

इसी सप्ताहंत उल्फ़ा के अध्यक्ष अरबिंद राजखोवा की रिहाई हुई थी, राजखोवा पर छह मामलों में मुक़दमा चल रहे थे लेकिन सरकार ने उनकी ज़मानत की अर्ज़ी का विरोध न करके उनकी रिहाई को आसान कर दिया था.

शर्त

वर्ष 2009 में राजखोवा को बांगलादेश ने अपने यहाँ गिरफ़्तार करके असम सरकार के हवाले कर दिया था.

राजखोवा ने भारत सरकार को ये संकेत दिए थे कि यदि उनकी कुछ शर्ते मान ली जाती है तो बातचीत शुरू की जा सकती है.

राजखोवा ने अपनी रिहाई के बाद जेल में बंद उल्फ़ा के एक वरिष्ठ नेताओं को रिहा करने की अपील की है.

अपनी रिहाई के बाद उन्होंने कहा है, ''मैं चित्रभान हज़ारिका और साश चौधरी को, जो गुवाहाटी के जेल में बंद हैं, रिहा करने की अपील करूंगा. मैं चाहूँगा कि बांग्लादेश में अपनी सज़ा पूरी कर चुके हमारे पूर्व महासचिव अनूप चेतिया को भारत बुला लिया जाए. अगर हमारी ये मांग पूरी हो जाती है तो हम इस इस बात का आश्वासन देते है कि हम शांति प्रकिया को आगे ले जाएंगें. ''

लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि उल्फ़ा की केंद्रीय समिति का दोबारा गठन करना होगा जो इस बात के साफ़ संकेत देता है कि वह उल्फ़ा के कट्टरपंथी गुट को दरकिनार कर सरकार से बातचीत दोबारा शुरू करना चाहते है.

पूर्व खुफ़िया ब्यूरो प्रमुख और शांति वार्ताकार पीसी हलदर का कहना है कि राजखोवा के नेतृत्व वाले और उल्फ़ा के उदारवादी गुट से जल्द ही वार्ता शुरू होगी.

राजखोवा की रिहाई के बाद हलदर ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, ''उल्फ़ा के साथ बातचीत दो से तीन हफ़ते के भीतर शुरू हो जाएगी. जो भी दिक्कतें आ रही थी वह ख़त्म हो गई है और अब बातचीत का समय आ गया है.''

पीसी हलदर ने इससे पहले राजखोवा से 17 दिसंबर वर्ष 2010 में मुलाक़ात कर वार्ता के लिए रूपरेखा तैयार की थी.

राजखोवा की रिहाई से पहले उल्फ़ा के उपाध्यक्ष प्रदीप गोगोई, प्रचार सचिव मीथिंगा डाइमेरी, राजू बरूआ, राजनैतिक सलाहकार भीमकांता बरूहगोहन, सांसकृतिक सचिव प्रनति डेका, रामु मेक्क को ज़मानत पर रिहा किया गया था ताकि इस उदारवादी धड़े को बातचीत के लिए तैयार किया जा सके.

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