यह न्याय की विफलता है: अमर्त्य सेन

बिनायक सेन

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन को देशद्रोह के आरोप में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाए जाने के अदालत के फ़ैसले को 'न्याय की विफलता' बताया है.

साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई है कि छत्तीसगढ़ की अदालत ने देशद्रोह के मामले में जो सज़ा सुनाई है वह देश के उच्च न्यायालयों में नहीं टिक सकेगी.

इस बीच छत्तीसगढ़ में बिलासपुर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फ़ैसले को चुनौती देने वाली बिनायक सेन की याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है.

उन्हें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक अदालत ने कथित रुप से नक्सलियों का सहयोग करने के आरोप में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दुनिया भर में व्यापक प्रतिक्रिया हुई है.

सवाल

डॉ बिनायक सेन पर लिखी एक किताब के विमोचन समारोह में अमर्त्य सेन ने आदिवासी इलाक़ों में उनके महत्वपूर्ण कार्यों का ज़िक्र करते हुए कहा कि इस फ़ैसले से भारतीय लोकतंत्र, न्याय प्रणाली और बराबरी के मुद्दे पर भारतीय नज़रिए पर भी सवाल खड़े हो गए हैं.

उन्होंने कहा कि हालांकि मामला न्यायालय में लंबित है इसलिए इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि बिनायक सेन को 'अन्यायपूर्ण ढंग से सज़ा सुनाई गई है'.

बिनायक सेन को चिट्ठी पहुँचाने के आरोप में सुनाई गई सज़ा पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा, "कल अगर कोई मुझे चिट्ठी लेटर बॉक्स में डालने के लिए देता है तो उसमें लिखी गई सामग्री के लिए मुझे भी देशद्रोह की सज़ा हो सकती है."

उनका कहना था कि ये कहीं साबित नहीं होता कि बिनायक सेन ने हिंसा का समर्थन किया.

उन्होंने अरूंधति राय के ख़िलाफ़ भी देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज किए जाने का ज़िक्र किया और कहा, "लोकतंत्र में यह ज़रूरी नहीं है कि हर कोई देशभक्ति की ही बात करे. कुछ लोग इसे नहीं समझते...यह लोकतंत्र के बुनियाद का मामला है."

मशहूर वकील सोली सोराबजी ने भी इस कार्यक्रम में बिनायक सेन के ख़िलाफ़ सुनाई गई सज़ा पर चिंता ज़ाहिर की, ख़ासकर फ़ैसले की भाषा पर.

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