काज़ीरंगा कीटनाशक मुक्त हो

चाय बागान

वन अधिकारियों ने मांग की है कि असम के प्रसिद्ध काज़ीरंगा अभ्यारण्य के आसपास के क्षेत्र को कीटनाशक मुक्त किया जाए.

हाल ही में काज़ीरंगा के पास स्थित चाय बागान में दो गर्भवती हथिनियों, कई जानवरों और चिड़ियों की मौत के बाद ये मांग की गई है.

इन जानवरों की मौत घास खाने की वजह से हुई है जिसमें कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है.

काज़ीरंगा एक सींग वाले गैंडे सहित कई जानवरों के लिए प्रसिद्ध है.

कीटनाशक की वजह से

Image caption काज़ीरंगा के जानवर अक्सर आसपास के चाय बागानों में खाने की तलाश में घुस जाते हैं

एक हथिनी की मौत पानबाड़ी में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 37 के पास स्थित 'एलिफ़ेंट कॉरिडोर' में हुई तो दूसरी की मौत 13 किलोमीटर दूर काज़ीरंगा अभ्यारण्य के लेंगरापहाड़ में हुई.

ये हथिनियाँ खाने की तलाश में दिफोलु चाय बाग़ान में घुस गई थीं जहाँ लाल चींटियों को मारने के लिए कीटनाशक का छिड़काव किया गया था.

वरिष्ठ वन्य अधिकारी अनुराग सिंह का कहना है, "इन दोनों हथिनियों की मौत की वजह से कीटनाशक का मुद्दा उठा है लेकिन इन चाय बागानों में कीटनाशकों के छिड़काव की वजह से वन्य प्राणियों को संकट का सामना करना पड़ रहा है."

उनका कहना है, "काज़ीरंगा अभ्यारण्य के चारों ओर सैकड़ों चाय बागान हैं. इन चाय बागानों के प्रबंधकों को चाहिए कि वे ऑर्गेनिक खेती शुरु करें और कीटनाशकों का छिड़काव बंद करें."

अनुराग सिंह का कहना है कि पिछसे कुछ हफ़्तों में इन बागानों में सैकड़ों चिड़िया मारी गई हैं और कुछ गायें जो इन बागानों में घास चरने के लिए चली गई थीं कीटनाशक की वजह से मारी गईं.

उनका कहना है, "दर्जनों गायें मारी गई हैं और इसके बाद उन मरी हुई गायों को खाने वाले गिद्धों की भी मौत हो गई है. आप कल्पना कर सकते हैं कि इन बागानों में उगाई जाने वाली चाय पीकर लोगों के स्वास्थ्य पर कैसा असर पड़ता होगा."

अधिकारी का कहना है कि वन विभाग उन बागानों के प्रबंधकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की तैयारी कर रहा है जिनके बागानों में घुसकर घास खाने की वजह से जानवर मारे जाएंगे, ख़ासकर अनुसूचित जानवर क्योंकि वे दुर्लभ प्रजातियों के रूप में दर्ज हैं.

जन-संगठनों का समर्थन

आसपास के जन संगठनों ने कीटनाशक पर रोक लगाने की इस मांग का समर्थन किया है.

काज़ीरंगा के पास मेरबिल साशोनी इलाक़े में काम करने वाली संस्था 'पीपुल्स कमिटी' के मोनी मानिक गोगोई का कहना है, "चाय बागानों को अब ऑर्गेनिक खेती करनी चाहिए और कीटनाशक का छिड़काव बंद कर देना चाहिए. इससे न केवल वे वन्य जीवों और जलजन्तुओं को ख़तरे में डाल रहे हैं बल्कि हमारा जीवन भी प्रभावित हो रहा है."

ये समिति इस इलाक़े में बड़े तालाब आदि बनाने की तैयारी कर रही है है जिससे कि इस इलाक़े में इको-टूरिज़्म को बढ़ावा दिया जा सके.

समिति चाहती है कि लोग चाय और तेल के अलावा पर्यटन से भी आजीविका कमा सकें.

चाय बागान इलाक़े में से भी कुछ ऑर्गेनिक खेती का समर्थन करते हैं.

काज़ीरंगा के पास एक चाय बागान गोसाईंबाड़ी के मालिक बिनोद सहारिया कहते हैं, "यदि चाय बागानों को ज़हर से मुक्त पेय बनाना है तो उन्हें ऑर्गेनिक खेती की ओर जाना ही होगा. यदि इन पत्तो को खाकर हाथी की मौत हो जाती है तो सोचिए कि हम अपने ग्राहकों को क्या दे रहे हैं?"

बिनोद सहारिया के बागान में सिर्फ़ प्राकृतिक खाद का उपयोग होता है जो गोबर और पशुवधशाला से निकले कचरे से तैयार होता है.

उनका कहना है कि अगर जल्दी ही ऑर्गेनिक खेती शुरु नहीं हुई तो वो ग्राहक दूर हो जाएंगे जो अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं.

लेकिन इससे सभी लोग सहमत नहीं हैं कुछ बागान वालों का कहना है कि यदि कीटनाशक का प्रयोग बंद किया गया तो उनके उत्पादन में कमी आ जाएगी.

उत्तरी असम के एक चाय कृषक एचएस सिद्धु कहते हैं कि ऑर्गेनिक खेती के लिए एक ऐसा मॉडल तैयार करना होगा जिससे कि उससे होने वाली आय नियमित बनी रहे.

उनका मत है कि चाय बागान वालों को कीटनाशक का प्रयोग छोड़ने के लिए राज़ी करना चाहिए लेकिन उन्हें इसके लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए.

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