शीला और मुन्नी सब पर भारी

ये समय का फेर है या राजनीति की गिरती साख का सबब. शीला की जवानी और दबंग की मुन्नी बदनाम होकर भी पतंगों की दुनिया में नेताओं और क्रिकेट खिलाड़ियों पर भारी है.

भारत में मकर संक्रांति पर बड़े पैमाने पर पतंग उड़ने का चलन है.पतंग निर्माता अपनी पतंगों के मनभावन बनाने के लिए उन पर नेताओं और क्रिकेट सितारों की तस्वीर उकेरते रहे है.

मगर इस बार 'मुन्नी' और 'शीला' ने इन सबको पीछे छोड़ दिया है.

जयपुर पतंगबाजी और पतंगसाजी का बड़ा केंद्र है.

पिछली बार पतंगों के आवरण पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा छाए हुए थे. मगर इस बार पतंगों ने ओबामा का साथ छोड़ दिया है.

पतंगों के बाजार में कहीं कहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तस्वीरें नज़र ज़रूर आती है .

लेकिन पतंग निर्माता कहते है कि इस बार दबंग की मुन्नी (मलायका अरोड़ा) और शीला की जवानी (कटरीना कैफ़) की मांग सबसे ज्यादा है.

पतंग निर्माता गफ़ूर भाई पिछले तीन दशक से इस काम से जुड़े है. वे पहले राजनेताओं की तस्वीरें पतंगों पर उतारते रहे हैं, मगर इस बार उनकी पतंगों पर मुन्नी और शीला की जवानी शोभित है.

गफ़ूर भाई कहते है, ''इस बार तो इन की ही मांग है. नेताओं से लोग ऊब गए हैं, महंगाई के कारण भी नेताओं से मोहभंग हुआ है.पहले शहीदों, नेताओ और क्रिकेट सितारों की बहुत चाहत थी, अब नहीं है. अब तो मुन्नी बदनाम और शीला की जवानी के गानों की जैसे मांग है, वैसे ही पतंगों पर इनकी तस्वीरों की मांग हो गई है.''

मकर संक्रांति हिन्दू त्योहार है, पर पतंग बनाने और बेचने में मुसलमानों की बहुतायत है.

भाईचारे का पैगाम

पतंग बेजान ज़रूर होती है, मगर वो इन्सान की तरह कोई भेद नहीं करती, वो उड़ती है, गिरती है और अपने साथ भाईचारे का पैगाम भी ले जाती है.

पतंग निर्माता मोहम्मद शकील कहते है, ''ये मिलाजुला त्योहार है, बेशक ये हिन्दूओं का पर्व है, मगर खुशी तो साझा है. ये तो हमारे पुरखों ने मिलजुलकर रहने की सीख दी थी, हम तो सदियों से साथ साथ ऐसे ही त्योहार मानते रहे है.''

जयपुर में रियासत काल में पतंग उड़ाने का काम शुरू हुआ, राजाओं ने इसे प्रोत्साहित किया तो मुस्लिम कारीगरों ने इसे पोषित किया.

पतंग विक्रेता मोहम्मद हनीफ़ कहते है, ''पतंगों का काम तो राजाओं के दौर में शुरू हुआ, तब से इसमें बढ़ोत्तरी हुई है. वैसा ही जोशोखरोश है. समय के साथ ये और बढ़ा है, कम नहीं हुआ है.''

पतंगों के एक व्यापारी हुसैन इतिहास में और पीछे जाते हैं और कहते हैं, ''ये तो राजा महाराजा क्या हकीम लुकमान के ज़माने से शुरू हुआ है. इससे आँखों की रोशनी बढती है. हकीम ने बताया था कि पतंग उड़ाने से आँखों की रोशनी सलामत रहती है. कभी देखना पतंगबाज़ और कबूतरबाज़ की आंखे दुरुस्त मिलेगी.''

राजा गए,रहनुमा आए, जम्हूरियत पूरे परवान पर है. लेकिन पतंग अगर कोई पैमाना है तो भारत की राजनीति को ये ज़रूर सोचना होगा कि शीला की जवानी के आगे वो क्यों हार गई.

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