शीतलहर में पान की फ़सल चौपट

पान भारतीय खानपान का एक प्रमुख तत्व है. पान होठों पर लाली लाकर मुख की शोभा बढ़ाता है और पाचन क्रिया में भी मदद करता है.

आयुर्वेद की कई दवाओं में भी पान का इस्तेमाल होता है. लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों से उत्तर भारत में चल रही शीतलहर से उत्तर प्रदेश और सीमावर्ती मध्य प्रदेश में पान की खेती चौपट हो गई है.

बुंदेलखंड का महोबा नगर पान की एक प्रमुख मंडी माना जाता है. यहां का देसावरी पान न केवल हिंदुस्तान बल्कि अरब एवं दूसरे देशों में भी निर्यात होता है.

लेकिन शुक्रवार को महोबा पान मंडी सुनसान थी.

'बुरा हाल है, कुछ न पूछिए'

कोई किसान पान बेचने आया ही नहीं. एक प्रमुख पान विक्रेता लालता प्रसाद चौरसिया ने फ़ोन पर बातचीत में कहा, " दो हफ्ते से यही हाल है. अगर एक किसान पान लेकर आ जाता है तो मंडी के कई-कई व्यापारी उसके पीछे लग लेते हैं. इसलिए दाम भी तिगुने चैगुने बढ़ गए हैं."

लालता प्रसाद कहते हैं पान की खेती का बहुत बुरा हाल है, कुछ न पूछिए.

पान के एक अन्य व्यवसायी प्रेमचंद चौरसिया कहते हैं कि सत्तर से अस्सी फ़ीसदी फ़सल ख़राब हो गई है.

दरअसल पान एक बहुत ही नाज़ुक फ़सल है.

नाज़ुक फ़सल

उसे न ज्यादा गरमी बर्दाश्त है और न ज्यादा सर्दी. हाल में ज़्यादा कोहरा और पाला पडा उससे पान के पत्ते काले पड़कर सूख गए हैं और इसकी बेलें भी बेजान हो गई हैं. किसान अपना माथा ठोंक रहे हैं.

जो हाल महोबा के किसानों का है कमोबेश वही हाल सीमावर्ती मध्य प्रदेश के पान किसानों का भी बताया जाता है.

महोबा के अलावा उत्तर प्रदेश के ललितपुर, बांदा, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली , हरदोई , सीतापुर , कानपुर , जौनपुर और आज़मगढ़ में भी पान की खेती होती है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर में पान के एक व्यापारी सुभाष चौरसिया ने फोन पर बातचीत में बताया कि वहां सर्दी में तापमान घटकर दो डिग्री तक रह गया था जिससे लगभग साठ फ़ीसदी पान गल गया.

'कोई ध्यान नहीं देता'

पान उत्पादक संघर्ष समिति के एक पदाधिकारी विवेक चौरसिया के हवाले से कहा गया है कि इस साल करीब दस हज़ार एकड़ में पान की खेती की गई थी.

एक अनुमान के अनुसार इन सभी ज़िलों में कुल मिलाकर करीब अस्सी करोड़ रूपए की पान की फ़सल बर्बाद हो गई है. पान विक्रेता अब मुख्यतः पश्चिम बंगाल औक दूसरे इलाक़ों से आने वाले पान पर निर्भर हैं.

पान उत्पादक किसानों की शिकायत है कि सरकार पान किसानों की तरफ़ कोई ध्यान नही देती और न ही उन्हें फ़सल बीमा जैसी योजनाओं का कोई लाभ दिया जाता है.

संबंधित समाचार