'वो सामने आता है तो रोना आता है'

Image caption इन मासूमों को बताया गया है कि उनके पिता मुंबई में नौकरी कर रहे हैं.

(नूर-उल-हुदा, शब्बीर मसीउल्लाह बैटरीवाला, रईस अहमद रज्जाब अली, डॉक्टर सलमान फ़ारसी, डॉक्टर फ़ारोघ मक़दूमी, मोहम्मद आसिफ़ जुनैद, मोहम्मद अली, मौलाना मोहम्मद ज़ाहिद, अबरार अहमद गुलाम अहमद...ये नाम हैं उन लोगों के जो 2006 मालेगाँव धमाके मामले में जेल में बंद हैं. कुछ दिन पहले दिल्ली स्थित एक पत्रिका में स्वामी असीमानंद का मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गए इक़बालिया बयान छपा. इसमें असीमानंद ने कहा कि मालेगाँव धमाकों में हिंदू चरमपंथियों का हाथ हैं. ये बयान महाराष्ट्र पुलिस की तहकीकात और जाँच के बिल्कुल विपरीत है जिसके तहत नौ मुसलमान नौजवान जेल में बंद हैं. हमारे संवाददाता विनीत खरे पहुँचे मालेगाँव जेल में बंद लोगों के परिवारों से मिलने.)

मालेगाँव में असीमानंद के नाम से अब ज़्यादातर लोग परिचित नज़र आते हैं. उर्दू अख़बारों में असीमानंद के बारे में जो भी निकलता है, लोग उसे पूरा पढ़ जाते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि वो राहत की सांस ले रहे हैं कि धमाकों में मालेगाँव के किसी भी मुसलमान व्यक्ति का हाथ नहीं था. वो बार-बार कहते हैं -- हम न कहते थे कि कोई मुसलमान मस्जिद या कब्रगाह में बम नहीं रख सकता.

पावरलूम कारखानों के इस मुस्लिम बहुल शहर में बड़ी संख्या में युवक बेरोज़गार हैं. अज़ान की आवाज़ के बीच हम पहुँचे इस्लामपुरा. सभी घरों के बाहर पानी का एक बड़ा ड्रम रखा हुआ था. किसी ने बताया यहाँ दो दिन में एक बार पानी आता है.

घुमावदार, तंग गलियों में डॉक्टर फ़रोग़ मक़दूमी के घर के बारे में आप किसी से भी पूछें, वो आपको सीधे उनके मकान तक छोड़कर आएंगे. जब से मीडिया में स्वामी असीमानंद के बयान के बारे में छपा है, तब से इस मकान में लोगों का आना जाना काफ़ी बढ़ गया है.

उनके पिता हैं इक़बाल मक़दूमी.

कहते हैं, “फ़रोग़ बेहद धार्मिक है. ऐसे मुसलमान लड़के किसी भी मस्जिद में कुछ नहीं करेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए.”

ये बात सिर्फ़ इक़बाल मक़दूमी नहीं बल्कि वो सभी लोग कहते है जिनके रिश्तेदार 2006 में हुए मालेगाँव धमाके के सिलसिले में जेल में हैं.

पास ही के एक स्कूल में 38 साल तक गणित के अध्यापक रहने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके 62-वर्षीय इक़बाल मक़दूमी कहते हैं, “लोग यही पूछते हैं कि जब एक आदमी ने अपने जुर्म को स्वीकार कर लिया है तो जो बेगुनाह बंद हैं उन्हें क्यों नहीं रिहा किया जा रहा.”

आंसू थमते नहीं

फ़रोग़ की माँ शमीम ने आखिरी बार उनसे दो साल पहले बात की थी.

शमीम कहती हैं, “वो सामने आता है तो रोना आता है.”

सैंतीस साल के फ़रोग़ पेशे से यूनानी डॉक्टर हैं और कुसुंबा रोड पर उनका क्लीनिक था.

मुंबई के तिब्बिया कॉलेज से उन्होंने बीयूएमएस यानि बैचलर ऑफ़ यूनानी मेडिसिन ऐंड सर्जरी का कोर्स किया.

बाद में उन्होंने मुंबई के सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल से डेंटल मेकैनिक का भी कोर्स किया था. पहले मुंबई में प्रैक्टिस की फिर वर्ष 2000 के आसपास मालेगाँव आ गए.

छह नवंबर 2006 को देर रात पुलिस फ़रोग़ के दवाखाने पहुँची जहाँ उनका घर भी था.

उनके पिता बताते हैं, “रात करीब एक बजे एक पुलिसवाला आया और बोला साहब ने बुलाया है. तुम्हारे लड़के के बारे में बात करनी है.”

कहते हैं कि थाने में किसी ने बताया कि एटीएस यानि आतंकवाद विरोधी दस्ते के लोग फ़रोग़ को पूछताछ के लिए ले जा रहे हैं.

उनका कहना था, “फ़रोग़ ने बताया कि दो दिन पहले भी पुलिसवाले पूछताछ के लिए आए गए थे और चिंता की कोई बात नहीं है. मुंबई में एटीएस अधिकारियों ने कहा कि चिंता की बात नहीं है. दो दिन बाद एटीएस दस्ते ने मालेगाँव दवाखाने का परीक्षण किया. आरडीएक्स के लिए जाँच भी की.”

इस बात को चार साल हो चुके हैं. अभी तक इस मामले में ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ है.

पढ़ा-लिखा परिवार

अपने बेटे के बारे में बताते हुए कहते हैं फ़रोग बचपन से ही शायरी के शौकीन रहे हैं और उनकी उर्दू बहुत अच्छी है.

इक़बाल मक़दूमी कहते हैं, “लाईब्रेरी से ज़्यादा हमारे यहाँ किताबें थीं. वो ग़ालिब को भी पढ़ता था, और मीर को भी. मौलाना आज़ाद की किताबें भी बहुत पढ़ता था.”

फ़रोग़ पास ही की एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ते थे क्योंकि उन्हें टोपी लगाना पसंद नहीं था और वहाँ नमाज़ पढ़ने के लिए टोपी लगाने की ज़रूरत नहीं थी.

Image caption डॉक्टर फ़रोग मकदूमी का परिवार

इक़बाल मक़दूमी ने अपने सभी सातों बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी. उनका एक बेटा कंप्यूटर इंज़ीनियर, एक बेटी स्त्रीरोग विशेषज्ञ, एक बेटे के पास एमडी यूनानी की डिग्री, एक बेटी एमएससी बीएड, एक बेटा कंप्यूटर इंज़ीनियर और सबसे छोटी बेटी बीएससी बीएड है.

आठ सितंबर 2006 को याद करते हुए वो कहते हैं कि फ़रोग़ पास ही स्थित मस्जिद से जब नमाज़ पढ़कर वापस निकला तो उसने धमाके की ख़बर सुनी.

कहते हैं, “फ़रोग़ ने कहा कि फ़रहान अस्पताल से फ़ोन आ रहा है कि वहाँ बहुत सारे घायल लोग पहुँचे हैं और उनकी ड्रेसिंग करनी है. इतना बोलकर वो चला गया. एक और बेटा जो एमडी यूनानी मेडिसिंस और एक बेटी स्त्रीरोग विशेषज्ञ है, वो देर रात तक लोगों की देखभाल करते रहे. वो बहुत रहमदिल था. कई लोगों को अपने पास से दवाईयाँ दे दिया करता था. क्या कोई ऐसा बच्चा कब्रिस्तान में विस्फ़ोट कर सकता है.”

फ़रोग़ की पत्नी आफ़िया हमेशा परेशान रहती हैं. उन्हें छोटी-छोटी बात पर गुस्सा आ जाता है. अपना ध्यान बटाने के लिए मदरसे में पढ़ाती है और उर्दू में बीए कर रही हैं. उनके दो छोटे बच्चे आएशा और हसन समझते हैं कि पापा मुंबई में नौकरी कर रहे हैं.

इक़बाल मकदूमी कहते हैं कि 2006 के बाद उनके परिवार को कोई भी लड़का टॉप नहीं कर पाया. पहले वो हमेशा टॉप किया करते थे. कोई भी काम करते हैं तो टेंशन में रहते हैं. ये कहते-कहते वो खामोश हो जाते हैं और नीचे ज़मीन की ओर देखने लगते हैं. आखों में आँसू भर आए. ज़बान पर शब्द नहीं आ रहे थे.

खुद को संभालते हुए वो कहते हैं कि मालेगाँव में नौकरियाँ कम हैं और लोग पैसों के लिए परेशान रहते हैं. मजबूरन लोग पुलिस के मुखबिर बन जाते हैं और जैसा पुलिस बोलती है वो वैसा ही करते हैं. वो कहते हैं कि पूरी साज़िश में पुलिस शामिल है और मुखबिरों के कहने पर फ़रोग को पुलिस ने फंसाया है.

इक़बाल से जब पूछा गया कि वो अब ये मामला किधर जाते हुए देख रहे हैं, तो उनका कहना था, “इस मामले में जब तक राजनीति चलती रहेगी, तब तक न्याय मुश्किल है. पूरा मामला वकीलों के हाथ में है. बेगुनाह या गुनाहगार साबित करना वकीलों के हाथ में है.”

(ये इस श्रृंखला की पहली कड़ी है)

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