नमाज़ी और नास्तिक फ़लस्तीन पर एकजुट

Image caption ईरान में छोटी-छोटी बच्चियों को इसी तरह ढका हुआ देखकर यह लगता रहा कि रस्मो-रिवाज़ की ऐसी बंदिशों से उनकी कौन-कौन सी संभावनाएं खत्म हो रही होंगी.

भारत से गज़ा के लिए रवाना हुए कारवां की तैयारी में एक तरफ भारत के कुछ मुस्लिम नेता और संगठन लगे थे, तो दूसरी तरफ वामपंथी रूझान वाला एक मजदूर संगठन एनटीयूआई भी.

इनके बीच विचारधारा और तौर-तरीकों की खाई थी, लेकिन एक मक़सद साफ़ था कि फ़लस्तीनियों के साथ एकजुटता के लिए एशिया के देश कारवां की शक्ल में वहां पहुंचें.

इसलिए इस कारवां में पांच वक्त के नमाज़ी भी थे और मेरी तरह के नास्तिक भी.

मुस्लिम दुनिया फ़लस्तीन को अहम मुद्दा मानती है, लेकिन इस कारवां में काफी ग़ैर-मुस्लिम भी थे और यह बात हर देश में लोगों को छू भी रही थी.

आपस की वैचारिक विविधता से परे भी इस कारवां के सामने कई दुविधाएं थीं.

रास्ते में पड़नेवाले देशों में जो सरकारें या संगठन कारवां का इंतज़ाम कर रहे थे, वो न तो अनिवार्य रूप से शांतिप्रिय थे और न ही मानवाधिकारों को लेकर उनका रेकॉर्ड बेदाग था.

लेकिन सारी विसंगतियों के साथ ही चलना तय हुआ था और यह भी तय हुआ था कि रास्ते के पड़ावों के मुद्दों और मोर्चो में उलझने के बजाए कारवां अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ता रहेगा.

पता नहीं कैसे यह हो भी गया.

Image caption यह कारवां ईरान में जब पहुंचा तो मोहर्रम शुरू ही हुआ था. मस्जिदों में और मज़ारों पर लोगों की भीड़ थी और वहीं पर एक बुज़ुर्ग स्वयंसेवक चाय पिलाने में लगे हुए थे.

कारवां की महिलाओं को जगह-जगह, स्थानीय रिवाज़ों के मुताबिक, और भारत जैसे लोकतंत्र की ज़ुबान में कहें तो भेदभाव भी झेलना पड़ा,

हिंसा और अहिंसा

कुछ जगहों पर तो ऐसे संगठन मेज़बान थे जिन्हें पश्चिम के देश आतंकवादी करार दे चुके हैं, लेकिन हिंसा पर भरोसा रखने वाले लोग तो कारवां में भी थे.

एक तरफ गांधीवादी कार्यकर्ता संदीप पांडे साथ थे जो मैगसेसे सम्मान पा चुके हैं, तो दूसरी तरफ कई हिंदुस्तानी साथी ऐसे थे जो भारत के भीतर भी बिना हिंसा के रास्ते इंसाफ़ को संभव नहीं मानते.

राजघाट से गज़ा-भाग 1

पांच हफ़्ते रात-दिन साथ रह रहे दो अलग-अलग पीढिय़ों के भारतीय जब हिंसा के हिमायती दिखे तो मैं कुछ हक्का-बक्का रह गया.

ऐसे में सफ़र के बीच सीरिया में जब ख़बर आई कि हिन्दुस्तान में एक अदालत ने बिनायक सेन को राजद्रोह के आरोप में उम्रकैद दी है, तो कुछ लोग वहां भी फ़ैसले के ख़िलाफ़ एक दिन का धरना देना चाहते थे. लेकिन फिर बात यही तय हुई कि असल मक़सद से भटकना ठीक नहीं होगा.

कारवां में कट्टरपंथी, पक्के नास्तिक, अमन पसंद, हिंसा के हिमायती तो थे ही, कुछ लोग खुलकर बहस करते थे कि दुनिया में धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र किस तरह एक बकवास सोच हो गई है और वह कभी इंसाफ़ नहीं कर सकती.

ब्रिटेन से आए बांग्लादेशी मूल के दो नौजवान मानते थे कि धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र अल्पसंख्यकों के पूरी तरह खिलाफ़ हैं और उनके तन-मन पर पश्चिम में पाए ज़ख्मों की मिसालें थीं.

कारवां में विपन्न और संपन्न दोनों ही तबके के लोग थे और 20 साल के छात्रों से लेकर 70 पार कर चुके मजदूर नेता भी थे जो यह ज़िद करके गए थे कि वो तो फ़लस्तीन के साथ एकजुटता के लिए जाएंगे ही फिर चाहे वो मर जाएं तो उन्हें वहीं फेंक दिया जाए.

कारवां के तमाम लोग इस जानकारी के साथ जा रहे थे कि पिछली मई में ऐसे ही एक राहत-कारवां के जहाज़ पर इसराइल ने अंतरराष्ट्रीय समुद्र सीमा में हमला किया था और निहत्थे लोगों के जत्थे के 20 लोगों को मार डाला था जिसकी दुनिया भर में भारी निंदा हुई थी.

वैसे ही ख़तरे के साथ लोग भारत से रवाना हुए थे और यह हिम्मत की एक मिसाल है कि आख़िर तक कोई भी हिला नहीं. सच तो यह है कि जब सिर पर ख़तरे का कफ़न बांधकर लोग निकले तो हिंदुस्तान के जानकार साथी हैरान थे कि फ़लस्तीन के लिए जान देने हम क्यों जा रहे हैं.

मैंने तो इमरजेंसी के वक्त से जिस अख़बार में काम शुरू किया था, वह फ़लस्तीन का बड़ा हिमायती था, इसलिए मेरी सोच तो अपनी कम उम्र से ही ढली हुई थी.

जागरूक पीढ़ी

लेकिन बीस बरस के लड़के-लड़कियां जिस दमखम के साथ इस लंबे, कठिन और ख़तरनाक कारवां में थे, वह इस पीढ़ी की जागरूकता की एक तगड़ी मिसाल थी.

भारत से शुरू हुए कारवां के आधे लोग पाकिस्तान के लाहौर तक जा पाए और कुछ घंटों में वहां एक कार्यक्रम के बाद उन्हें वापस लौटना पड़ा क्योंकि वहां पर बहुत लंबे कार्यक्रम का माहौल नहीं था.

दिल्ली से पाकिस्तान तक पांच-छह सौ किलोमीटर का एक तरफ़ का बस का सफ़र लगभग दो बार तय करने के बाद लोग दिल्ली लौटे और वहां से कारवां विमान से तेहरान के लिए रवाना हुआ.

तमाम लोग सड़क के सफ़र के लिए उत्साहित थे लेकिन पाकिस्तान से रास्ता न मिलने की वजह से लोगों को विमान से यह हिस्सा पार करना पड़ा जहां इस पूरे सफ़र के सबसे गर्मजोश मेज़बान, ईरानी नौजवान मौजूद थे.

Image caption हिजाब और चादर में लिपटी और बुर्कों में छुपीं ईरानी महिलाएं भी बहुत खुलकर सड़कों पर प्रदर्शन में शामिल रहीं और कई ऐसे मौके आए जब युवतियां कारवां की बसों को विदा करते हुए हवाई चुंबन भी उछालती रहीं.

उनके साथ हिजाब और चादर से ढकी हुई युवतियां भी थीं जिनके पास दिल्ली से आई महिलाओं और लड़कियों के लिए हिजाब का तोहफ़ा था और ईरान का पूरा सफ़र इन सबको सिर को पूरी तरह ढककर ही तय करना था.

सब साथ-साथ

तेहरान से जहेदान नाम के शहर तक फिर एक उड़ान ली गई और आगे के पूरे हफ़्ते के सड़क सफ़र में भी दिखा कि किस तरह ईरान की पूरी सरकार, पूरा समाज फ़लस्तीन के मुद्दे के साथ है.

इसलिए यह कारवां उनकी सड़कों से तो गुज़र रहा था लेकिन इन सड़कों के किनारे पूरे ही वक्त उनके दिल भी बिछे दिख रहे थे.

ईरान में वहां की सरकार के साथ असहमत एक विपक्ष ज़रूर था लेकिन उस विपक्ष की भी कोई असहमति फ़लस्तीन के मुद्दे पर नहीं थी.

पूरी तरह इस्लामी संस्कृति और मुस्लिम आबादी वाला ईरान मज़हब की वजह से, इंसाफ़ के नज़रिए से तो फ़लस्तीनियों के साथ है ही, एक दूसरे नज़रिए से भी देखें तो अमरीका का करीबी साथी बना हुआ इसराइल ईरान को इस पूरे इलाके में अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है.

ऐसे में भारत से आए हुए कई धर्मों वाले इस कारवां की शक्ल में इसराइल और अमरीका के खिलाफ़ आक्रामक नारे लगाता हुआ एक ऐसा जत्था भी ईरान को मिला जिसकी सोच उसे अपनी सोच से मिलती नज़र आई.

इसलिए ईरान का साथ इस कारवां के लिए कल्पना से परे रहा और मेज़बानों के साथ कारवां के ऐसे गहरे इंसानी रिश्ते भी बने जो सफ़र पूरा होने के 10 दिन बाद भी इंटरनेट पर बिखरे हुए हैं और बढ़ते चल रहे हैं.

पूरे हफ़्ते हमारे कारवां को हाथों-हाथ लिया गया और स्वागत कुछ उसी तरह से हुआ जैसा किसी तीर्थयात्रा पर निकले हुए जत्थे की होती है.

हालांकि दो बातें इस पूरे दौर में मन में घूमती रहीं कि फ़लस्तीनियों का मुद्दा तो ठीक है लेकिन अपने देश के अंदर ईरान का मानवाधिकारों का रिकॉर्ड इतना अच्छा तो नहीं है कि उसे पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाए.

दूसरी बात यह भी कि आज तो यह तेज़ाबी सैलाब हमारे साथ है, लेकिन किसी दिन ऐसा कोई सैलाब हमारे खिलाफ़ रहा तो उस दिन हमारा क्या हाल होगा?

ईरान से तो ऐसा कोई ख़तरा है नहीं लेकिन जुनून से भरी हुई आक्रामकता को देखते हुए समझदार मन कुछ सहम ज़रूर जाता है.

(बाकी अगली किस्तों में)

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