मालेगाँव का दर्द 2

शब्बीर के भाई जमील और पिता मसीउल्लाह

(नूर-उल-हुदा, शब्बीर मसीउल्लाह बैटरीवाला, रईस अहमद रज्जाब अली, डॉक्टर सलमान फ़ारसी, डॉक्टर फ़ारोघ मक़दूमी, मोहम्मद आसिफ़ जुनैद, मोहम्मद अली, मौलाना मोहम्मद ज़ाहिद, अबरार अहमद गुलाम अहमद...ये नाम हैं उन लोगों के जो 2006 मालेगाँव धमाके मामले में जेल में बंद हैं. कुछ दिन पहले दिल्ली स्थित एक पत्रिका में स्वामी असीमानंद का मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गए इक़बालिया बयान छपा. इसमें असीमानंद ने कहा कि मालेगाँव धमाकों में हिंदू चरमपंथियों का हाथ हैं. ये बयान महाराष्ट्र पुलिस की तहकीकात और जाँच के बिल्कुल विपरीत है जिसके तहत नौ मुसलमान नौजवान जेल में बंद हैं. हमारे संवाददाता विनीत खरे पहुँचे मालेगाँव जेल में बंद लोगों के परिवारों से मिलने.

शब्बीर बैटरीवाला के 72 वर्षीय पिता मसीउल्लाह को आंख से कम दिखाई देता है और कान से भी कम सुनाई देता है.

पिछले पाँच वर्षों में जब भी वो मीडिया में अपने बेटे के 2006 मालेगाँव धमाके के संबंध में रिपोर्ट पढ़ते या सुनते हैं, तो बहुत तकलीफ़ होती है.

वो कहते हैं, ''मैं अगर खड़ा भी हूँ, और अगर मेरे लड़कों ने देख भी लिया, तो पूछते हैं, अब्बा क्यों खड़े हो. मेरा बहुत ख़्याल रखते हैं. इन बच्चों ने कभी किसी से कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं किया. शब्बीर को सालों हो गए हैं अंदर रहते हुए. पता नहीं कैसे ज़िंदगी गुज़रेगी,'' ये कहते हुए वो फफक कर रो पड़ते हैं.

मीडिया में शब्बीर को धमाकों का मुख्य षड्यंत्रकारी बताया गया, लेकिन परिवार वाले कहते हैं ये सब झूठ है.

परिवार का कहना है कि स्थानीय पुलिस तीन अगस्त, 2006 को सुबह तीन बजे के आसपास शब्बीर के घर पहुँची और उन्हें पकड़कर ले गई, यानि परिवार के मुताबिक जब आठ सितंबर को मालेगाँव में धमाका हुआ तो शब्बीर पुलिस की हिरासत में थे.

एटीएस का डर

वो इस बारे में किसी भी एटीएस (एंटी टेरर स्क्वैड) के अधिकारी से बात करते हुए भी डरते हैं, ''एक एटीएस अधिकारी ने कहा, तुमको हम गिरफ़्तार किए क्या? नहीं तो क्या तुमको ग़िरफ़्तार नहीं कर सकते हम? ज़्यादा होशियार बनेगा तो तुम्हें भी कर देंगे.''

पास ही चारपाई पर बैठे अभियुक्त बनाए गए फ़रोग़ मक़दूमी के पिता इक़बाल कहते हैं, ''वकीलों ने मना किया था कि पुलिस के पास कोई युवक जाना नहीं चाहिए.''

सत्तर के दशक में मसीउल्लाह सऊदी अरब गए जहाँ सिलाई की दुकान शुरू की. वो वहाँ कई साल रहे. जूडो कराटे के शौकीन और ब्लैक बेल्ट ले चुके शब्बीर भी वहाँ कुछ वक़्त बिताने के बाद मालेगाँव वापस आ गए और गज़ल नाम से एक जनरल स्टोर की शुरुआत की.

दो साल पहले शब्बीर ने मछली बाज़ार इलाके में बैटरी इन्वर्टर का कारोबार शुरू किया.

मालेगाँव में घंटों बिजली गुल रहती है इसलिए ये कारोबार चल निकला.

दसवीं कक्षा तक पढ़े शब्बीर के बड़े भाई जमील के मुताबिक धमाके से पहले पुलिस ने ऐसा माहौल बना था कि जैसे कुछ न कुछ होने वाला है.

वो घाटकोपर क्राइम ब्रांच में तैनात एक अफ़सर यूके राठौर का बार-बार जिक्र करते हैं जिन्होंने कथित तौर पर उन्हें भरोसा दिलाया था कि शब्बीर जल्द छूट जाएंगे.

फिर पुलिस ने कथित तौर पर ये कहा कि पुलिस ने शब्बीर को इतने दिन रखा है, इसलिए अगर अगर ऐसे ही छोड़ दिया तो मीडिया का दबाव आएगा. इसलिए एक मामूली सा केस बना रहे हैं.

भरोसा उठा

वो कहते हैं, ''कभी ऐसा नहीं लगा कि शब्बीर को इतनी देर रोककर रखेंगे. लगा कि दो-तीन महीनों में जाँच अच्छे से हो जाएगी. बिना किसी सुबूत के वो ज़्यादा दिन शब्बीर को रोककर नहीं रख पाएंगे. हम यही बात घरवालों को बताते रहे. देखते-देखते चार साल से ऊपर हो गए.''

जमील कहते हैं उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ जब शब्बीर का नाम मालेगाँव धमाकों से जोड़ दिया गया.

वो कहते हैं, ''सभी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई कि ये क्या हो गया. पुलिस की ज़्यादती सामने आ गई. मालेगाँव में सभी लोग सहम से गए कि कहीं उनका भी नाम न ले लिया जाए.''

पिछले चार साल से ज़्यादा के वक़्त में शब्बीर के केस पर 12 से 15 लाख का खर्च हो चुका है. उन्हें अपने जवाहरात और ज़मीन के टुकड़े बेचने पड़े.

पत्नी क़मर जहाँ कुछ ही दिन पहले उनसे जेल में मिल कर आई हैं.

वो कहती हैं, ''वो बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ा महसूस करते हैं. उनका इतना नार्को टेस्ट करवाया गया है कि उनके सिर में बहुत दर्द रहता है. हाथ पैर में भी दर्द रहता है. उन्हें बहुत ज़्यादा तक़लीफ़ें दी गई हैं. उन्हें बहुत कमज़ोरी आ गई है. वो कहते हैं कि नज़र में कमज़ोरी महसूस करता हूँ. जिस तरह से पुलिस का कहना है कि वो पाकिस्तान और दूसरी जगह गए, मैं तो क्या दूसरा कोई भी ये बात नहीं मानता.''

शब्बीर के चार बच्चे हैं. बेटी असरा अंजुम और मुजाहिद भी उनसे मिलकर आए हैं. असरा सहमी से अपनी माँ के बगल में बैठी थीं. कहती हैं अब्बू जल्दी आ जाएंगे.

मुजाहिद बताते हैं, ''अब्बू ने पढ़ाई के बारे में पूछा, और छोटे भाई-बहनों का ख़्याल करने को कहा.''

जमील कहते हैं कि ऐसे हालात में बच्चे पढ़ने में कमज़ोर हो जाते हैं और लगता है कि उन्हें जो भी पढ़ाया जाता है, वो उसे पकड़ नहीं पा रहे हैं.

जमील का कहना है कि वो मामले का राजनीतिकरण नहीं चाहते, लेकिन ये ज़रूर चाहते हैं कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ये जानने की कोशिश करें कि उनका पूरा तंत्र किस तरह से चल रहा है.

(ये इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी है)

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