माइक्रोफ़ाइनेंस पर आरबीआई की रिपोर्ट

आरबीआई का लोगो
Image caption आरबीआई की रिपोर्ट

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने माईक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों या एमएफ़आई के कामकाज पर एक रिपोर्ट जारी की है.

माइक्रोफ़ाईनेंस कंपनियां दरअसल गाँवों में या अन्य पिछ़ड़े इलाकों में गरीबों को आसान किश्तों पर छोटे ऋण देती हैं.

भारत में माईक्रोफ़ाईनेंस उद्योग में पिछले साल उस वक्त दिक्कतें शुरू हुईं जब आंध्र प्रदेश में कुछ लोगों की आत्महत्या की ज़िम्मेदारी इन कंपनियों पर डाल दी गई,हालांकि कंपनियों ने इससे इंकार किया.

अधिकारियों का आरोप था कि इन कंपनियों ने जिस तरह से अपना कर्ज़ा वापस लेने के लिए कर्ज़दार पर दबाव बनाया वो गलत था और कर्ज़ों पर ब्याज़ दर बहुत ज़्यादा थी जिसकी वजह से गरीब लोगों ने आत्महत्या की.

इसके बाद ऐसे कई वाकये सामने आए जिनमें कई कर्ज़दारों का कहना था कि वो कर्ज़ वापस करने में असमर्थ हैं.

बैंकों ने माइक्रोफ़ाईनेंस कंपनियों को धन देना बंद कर दिया.रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने एक कमेटी का गठन किया जिसने अपनी रिपोर्ट दे दी है.

कमेटी की रिपोर्ट

कमेटी ने कहा कि कर्ज़ देते वक्त कंपनियाँ किसी ऐसी ज़मानत या कोलैटरल की मांग नही करें जिसे वो कर्ज़ नहीं चुका पाने की स्थिति में उसे अपने नियंत्रण में कर सकें.

साथ ही सिफ़ारिश की गई है कि ब्याज़ दर को 24 प्रतिशत पर रखा जाए, एक व्यक्ति को 25 हज़ार से ज़्यादा का कर्ज़ नहीं दिया जाए, दो माइक्रोफ़ाईनेंस कंपनियाँ एक ही आदमी को कर्ज़ नहीं दें और प्रोसेसिंग फ़ीस कर्ज़ के एक प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो. पहले ये एक से दो प्रतिशत के बीच में थी.

रिपोर्ट का कहना है कि ऐसी संस्थाएँ जो इस तरह के छोटे ऋण देती हैं, उन्हें एक अलग वर्ग में रख दिया जाए जिसे एनबीएफ़सी-एमएफ़आई का नाम दिया जाए ताकि उन्हें नियंत्रित करना आसान हो सके.

इन सिफ़ारिशों में कहा गया है कि जिन कंपनियों का व्यापार 100 करोड़ तक का है, वो ऋण की लागत से 10 प्रतिशत से ज़्यादा का मुनाफ़ा नहीं कमा सकती हैं. जिन कंपनियाँ का व्यापार 100 करोड़ से ज़्यादा है वो अपनी ऋण की लागत से 12 प्रतिशत से ज़्यादा का मुनाफ़ा नहीं कमा सकते.

कमेटी ने एक अकेले व्यक्ति के बजाए एक ग्रुप को कर्ज़ देने पर बल दिया क्योंकि ऐसा करने से धन के सही इस्तेमाल और उससे आमदनी पैदा करने की संभावना ज़्यादा होती है.

हालांकि कुछ माइक्रोफ़ाईनेंस कंपनियों का कहना है कि इन कदमों से उनके विकास और फ़ैलाव पर असर पड़ेगा और कोई भी कंपनी 10 प्रतिशत के मार्जिन कैप या मुनाफ़े पर काम नहीं कर सकती, देश की सबसे बड़ी कंपनी एसकेएस माईक्रोफ़ाइनेंस ने इस कदम का स्वागत किया है और कहा है कि इससे इस क्षेत्र में अच्छा विकास संभव हो पाएगा.

इस क्षेत्र को नियंत्रण करने की मांग उस वक्त और ज़्यादा तेज़ हो गई थी जब एसकेएस माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनी की अगस्त 2010 में लिस्टिंग हुई जिसमें करीब 1650 करोड़ रुपए की उगाही की थी.

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