मालेगाँव का दर्द 3

अबरार अहमद के 82 साल के पिता अहमद सईद के घर में ही एक मदरसा भी है जिसमें कई बच्चे पढ़ते हैं. हम जब शाम को उनके घर पहुँचे तो बच्चों की आवाज़ें पूरे घर में गूँज रही थीं.

उन्हें सबसे ज़्यादा दुख इस बात का है कि अबरार 2006 मालेगाँव धमाके मामले में सरकारी गवाह बन गए, लेकिन उनकी मानें तो अबरार को फंसाया गया और इसके पीछे उस समय नासिक के ग्रामीण इलाकों के पुलिस अधीक्षक ज़िम्मेदार हैं.

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वो कहते हैं, “हमारा खानदान स्वतंत्रता सेनानी परिवार है. हमको ये जानकर झटका लगा कि सरकारी गवाह बनकर अबरार ने बट्टा लगा दिया. हम उससे इतना नाराज़ थे कि उसका नाम भी घर में लेने को मना कर दिया था.”

दरअसल अबरार सरकारी गवाह तो बने लेकिन अप्रैल 2009 को दायर अपने हलफ़नामे में उन्होंने अपना बयान बदला और खुद को फंसाने के लिए पुलिस अधीक्षक राजवर्धन को ज़िम्मेदार बताया.

अपने हलफ़नामे में अबरार कहते हैं कि उन्होंने कुछ हिंदू लोगों को इस षडयंत्र के बारे में बात करते हुए सुना था और इसका ज़िक्र उन्होंने जब राजवर्धन से किया तो वो हैरान रह गए.

राजवर्धन ने कथित तौर पर अबरार से कहा कि उन्हें सूचना मिली है कि ये काम कुछ हिंदू और मुस्लिम लोगों ने मिलकर किया है. अबरार के मुताबिक राजवर्धन ने उन्हें एक मोबाइल फ़ोन भी दिया जिसका नंबर हलफ़नामे में दर्ज है.

अबरार के मुताबिक कुछ पुलिसवाले उन्हें और उनकी पत्नी जन्न्तुनिसा को नासिक और इंदौर जैसी जगहों पर ले गए, उनकी मुलाकात साधुओं से करवाई गईं, उनकी तस्वीरें भी ली गईं और बातचीत भी रिकॉर्ड की गई. अबरार के मुताबिक वो लगातार कथित तौर पर राजवर्धन के संपर्क में रहे और उनके किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया जाता था.

'सब ख़त्म नहीं हुआ'

Image caption अबरार 2006 मालेगाँव धमाके मामले में सरकारी गवाह बन गए

हलफ़नामे के मुताबिक अबरार की मुलाकात एंटी-टेरर स्क्वैड के वरिष्ठ अधिकारियों से भी करवाई गई, हिंदी, अंग्रेज़ी और मराठी में लिख दस्तावेज़ों पर उनकी मर्ज़ी के विरुद्ध कथित तौर पर हस्ताक्षर भी लिए गए.

हमने इस हलफ़नामे पर खुद राजवर्धन से संपर्क किया तो वो बार बार कहते रहे कि वो इस बारे में कुछ नहीं कहेंगे और हम इस बारे में जाँच एजेंसी सीबीआई से बात करें जो कि इस मामले की जाँच कर रही है.

इससे पहले हमने उस वक़्त राज्य के डीजीपी रहे पीएस पसरीचा से बात करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने भी कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया था.

अबरार के परिवार के मुताबिक उनकी पत्नी और साला भी इस साज़िश में शामिल थे और ये सब उन्होंने धन की लालच में किया.

अबरार के भाई और इस मामले में वकील जलील अहमद कहते हैं, “‘ये ज़रूरी हो जाता है कि अबरार अहमद के उस वक्त का मोबाईल रिकॉर्ड निकाला जाए, सभी बातें साफ़ हो जाएंगी कि इसमें राजवर्धन शामिल हैं या नहीं और अबरार अहमद के साथ क्या हुआ.”

धमाके के करीब छह महीने पहले ही अबरार कुछ मतभेदों के कारण अपने परिवार से अलग हो गए थे और ये पूरा वाकया परिवार की साख के लिए अच्छा नहीं था.

अबरार के पिता बताते हैं कि वो आज़ादी के सिपाही रहे हैं और उनके दादा को 1921 में फांसी दे दी गई थी. वो कहते हैं कि गुस्से में उन्होंने अबरार से सभी संपर्क तोड़ लिए थे.

अबरार चार भाइयों में सबसे छोटे थे, इसलिए वो सबसे लाडले थे. उन्होंने सिर्फ़ आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की लेकिन नज़र कमज़ोर होने के वजह से आगे नहीं पढ़ सके. वो परिवार के पावरलूम के कारोबार से जुड़े रहे.

जलील कहते हैं कि इस पूरे किस्से की सबसे महत्वपूर्ण बात ये रही कि बम धमाकों के दौरान शहर में कोई दंगा फ़साद नहीं हुआ और लोगों की एकता बरकरार रही.

इस बात को सुन रहे बगल में बैठे अहमद सईद की आंखों में जैसे चमक सी आ गई और वो धीरे से बोले, अब भी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है.

(कुछ दिन पहले दिल्ली स्थित एक पत्रिका में स्वामी असीमानंद का मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया इक़बालिया बयान छपा. इसमें असीमानंद ने कहा कि मालेगाँव धमाकों में हिंदू चरमपंथियों का हाथ हैं. ये बयान महाराष्ट्र पुलिस की तहकीकात और जाँच के बिल्कुल विपरीत है जिसके तहत नौ मुसलमान नौजवान जेल में बंद हैं. हमारे संवाददाता विनीत खरे पहुँचे मालेगाँव जेल में बंद लोगों के परिवारों से मिलने.

ये इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी है)

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