गोमती मैली की मैली

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एशिया का सबसे बड़ा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट दो हफ़्ते से चालू है, लेकिन शहर में गोमती की सेहत पर कोई ख़ास असर अभी तक नही पड़ा है.

अठारह बड़े नाले अब भी गोमती में गंदगी गिरा रहे हैं और भैंसा कुंड के पास बने बैराज ने नदी का बहाव रोककर उसका गला घोट रखा है.

अधिकारियों का कहना है कि मार्च तक जब शहर के सभी नाले मोड़कर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ दिए जाएँगे, तब गोमती शहर में भी साफ़ दिखेगी.

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट गोमती नगर से सटे भरवारा गाँव में क़रीब चार सौ एकड़ के विस्तार में बना है. यहाँ अभी मुख्यतः हैदर कैनाल और कुकरैल का सीवेज आ रहा है.

इसके लिए गोमतीनगर के ग्वारी गाँव से क़रीब छह किलोमीटर लंबी पाइपलाइन डाली गई है. सीवेज को यहाँ तक लाने के लिए बड़े-बड़े पम्पिंग स्टेशन बनाए गए हैं.

प्रक्रिया

ज़मीन से क़रीब बीस फुट की ऊंचाई पर बने टैंक में जहाँ यह सीवर गिरता है, वहाँ भयंकर बदबू और फ़ेना है. वहाँ से सीवर दूसरे टैंक में आता है, जहां मशीनों से ठोस कचरा छाना जाता है.

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Image caption नदी में प्रदूषण के बावजूद कुछ लोग अभी भी इसके पानी को पूजनीय मानते हैं.

इसके बाद सीवर दूसरे टैंक में जाता है जहां पर ऐसे बैक्टीरिया पैदा होते हैं, जो बिना ऑक्सीजन के पानी में ज़िंदा रहकर सीवर का कचरा और गंदगी खाकर उसे खाद में बदल देते हैं.

यहाँ से स्लज या खाद और बाक़ी गंदा पानी अलग हो जाते हैं. यही पर मिथेन गैस बनाने की व्यवस्था है, जिससे आगे चलकर बिजली बनाई जा सकती है.

इस ट्रीटमेंट प्लांट को चलाने के लिए क़रीब दो हजार किलोवाट बिजली चाहिए. अधिकारियों का कहना है प्लांट सही से और पूरी क्षमता से चले तो प्लांट चलाने के लिए पर्याप्त बिजली बन सकती है.

अधिकारियों का कहना है कि चूँकि इस ट्रीटमेंट प्लांट में मुख्यतः घरेलू सीवर ही आता है, इसलिए यहाँ के स्लज से बनने वाली खाद खेती के कम आएगी.

गंदगी और स्लज छानने के बाद सीवर के पानी को एरिएशन टैंक से गुज़ारते हैं, ताकि उसमे थोड़ा ऑक्सीजन आ जाए. इसके बाद पानी को बड़े-बड़े तालाब में ले जाते हैं, जहां दो दिनों में वह हवा से और ऑक्सीजन सोखता है.

इसके बाद क्लोरीन मिलाकर डेढ़ किलोमीटर लंबी पाइप लाइन के ज़रिए गोमती नदी में बहा दिया जाता है.

परियोजना

ट्रीटमेंट प्लांट के साथ बनी प्रयोगशाला के इंचार्ज बबलू उपाध्याय का कहना है कि प्लांट पूरी तरह ठीक काम कर रहा है और सफ़ाई प्रक्रिया के अंत में जो पानी निकलता है वह मानक के अनुरूप है. उनके मुताबिक़ घुला हुआ ऑक्सीजन लगभग पांच मिलीग्राम प्रति लीटर आ रहा है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने नगर विकास और पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन कहते हैं, "यह एशिया का सबसे बड़ा ट्रीटमेंट प्लांट है. जितने भी प्रमुख नाले गोमती में गिर रहे थे, वह अब गोमती में नही गिरेंगे. अब डाइवर्ट होकर उनका ट्रीटमेंट हो जाएगा. इससे गोमती के प्रदूषण में बहुत फ़र्क पड़ जाएगा. 17 नाले बचते हैं, लेकिन उनमे बहुत कम डिस्चार्ज है. यह 17 नाले भी हैदर कैनाल कुकरैल नाले से जोड़ते हुए मार्च तक इसमें आ जाएँगे.''

गोमती नदी गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी है. भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने आठ साल पहले वर्ष 2003 में गोमती की सफ़ाई के लिए 263 करोड रूपए की परियोजना स्वीकृत की थी, जिसमें 70 फ़ीसदी धन केंद्र सरकार को और शेष 30 फ़ीसदी राज्य सरकार को लगाना था.

ट्रीटमेंट प्लांट के इस मॉडल में ज़मीन बहुत ज़्यादा लगती है और ज़मीन अधिग्रहण में देरी के कारण प्लांट को तैयार होने में चार साल का विलम्ब हुआ.

नियमों के मुताबिक़ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नगर निगम लखनऊ को बनाना और चलाना था. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इसका काम जल निगम को सौंप दिया, जो सीधे राज्य सरकार के नियंत्रण में काम करता है.

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Image caption आलोक रंजन को फ़र्क पड़ने की उम्मीद है

जल निगम ने मुंबई की एक प्राइवेट कंपनी के ज़रिए इस प्लांट का निर्माण कराया. अधिकारियों के अनुसार प्लांट के बनाने में लगभग 170 करोड़ रूपए ख़र्च हुए.

ठेके की शर्तों के मुताबिक़ अभी एक साल तक तो प्लांट को चलाने की ज़िम्मेदारी प्राइवेट कंपनी की है. इसके बाद प्लांट नगर निगम को सौंप दिया जाएगा.

इस पूरे प्लांट को चलाने के लिए लगभग 60 कर्मचारी और छह करोड़ रूपए सालाना की ज़रूरत होगी. समस्या यह है कि नगर निगम के पास इतने संसाधन नही हैं.

लखनऊ के मेयर डॉक्टर दिनेश शर्मा कहते हैं, "अभी एक साल तक तो यह कार्य ठेकेदार ही करेंगे. एक साल बाद यह नगर निगम को हैंडओवर होगा. तब भी यह ठेकेदार ही संचालित करेंगे. क्योंकि न हमारे पास मशीन है न तकनीकी कर्मचारी. छह करोड़ का जो हमारे ऊपर व्यय भार पडेगा, उसको भी हम यूजर चार्ज लगाकर पूरा कर सकते हैं."

शहर में नदी फिर भी गंदी

इस नए बने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में अभी तक मुख्य रूप से दो बड़े नालों का सीवर जा रहा है. इनमे पहला है हैदर कैनाल, जो लखनऊ के एक बड़े हिस्से की गंदगी लाकर गोमती बैराज के बाद अंबेडकर स्मारक के सामने गोमती में गिरता है.

हैदर कैनाल नाले का सीवर डाइवर्ट होने से अब मुख्यमंत्री मायावती के ड्रीम प्रोजेक्ट अम्बेडकर स्मारक और पार्क के सामने गोमती में गंदगी कम हो गई है.

इसी तरह कुकरैल की गंदगी पम्प होकर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में जाने से भैंसाकुंड श्मसान घाट के सामने की गंदगी में कुछ कमी आई है. लेकिन शहर के बाक़ी 18 नालों की गंदगी अब भी नदी में गिरती है.

इसकी वजह से शहर के बीचो-बीच बह रही गोमती अब भी साफ़ नही दिखाई देती.

निशातगंज पुल के बगल स्थित नए हुनमान मंदिर में रहने वाले पुजारी अमित मिश्र और उनका परिवार इसके भुक्तभोगी हैं. इन लोगों का कहना है कि सामने गिरने वाले नाले की बदबू बर्दाश्त से बाहर है.

लेकिन इतनी गंदगी के बावजूद गोमती मैया में लोगों की आस्था कम नही हुई. फ़ैजुल्लागंज निवासी अशोक सिंह घर में पूजा के लिए यहीं से वैसे ही बोतल में पानी भर कर ले गए, जैसे लोग हरिद्वार से गंगा जल लाते हैं.

अशोक सिंह कहते हैं, "गंदगी है तो क्या हुआ. गोमती का पानी है तो वह साफ़ ही है. भगवान की पूजा में लगेगा. हमारे पुरखे भी इसी पानी से पूजा करते थे. क्या किया जाए. कुछ कर नही सकते.''

मेडिकल कॉलेज के पास रस्तोगी घाट भी नदी में गंदगी से सने पड़े हैं. यहाँ रहने वाले कहते हैं कि अब लोग नहाने नहीं आते.

कई साल पहले पुराने लखनऊ के दौलतगंज में साढे चार करोड़ लीटर प्रतिदिन की क्षमता का एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया गया था. इसमें नगरिया, गऊ घाट, सरकटा और पाटा नाले का सीवर साफ़ होने आता है.

लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि अक्सर बिजली न आने से प्लांट कम करना बंद कर देता है.

मेयर डॉक्टर दिनेश शर्मा यह भी याद दिलाते हैं कि गोमती की ऊपरी धारा में शराब और चीनी कारखानों की गंदगी गिरती है और सरकार को उसकी रोकथाम भी करनी होगी.

लखनऊ के सभी नालों में बहुत बड़े पैमाने पर ठोस कूड़ा कचरा, पॉलीथिन बहकर आता है, जो ट्रीटमेंट प्लांट में भी रुकावट पैदा कर देता है.

ठेका

सरकार ने गोमती के किनारे से कूड़ा-कचरा उठाने के लिए लाखों रुपयों का ठेका दे रखा है. इससे नदी के मुख्य घाटों पर कचरा थोड़ा कम दिखाई देता है, लेकिन सफ़ाई में लगे एक कर्मचारी रमेश कहते हैं कि शहर के लोग जब तक कूड़ा-कचरा यहाँ-वहाँ फेंकने की आदत बंद नही करते, सफ़ाई हो पाना असंभव है.

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Image caption लखनऊ के मेयर का कहना है कि एक साल ये काम ठेकेदार देखेंगे

वहीं कुछ लोगों ने यह भी शिकायत की कि ठेकेदार पूरे कर्मचारी नहीं लगाते.

गोमती नदी पीलीभीत में माधो टांडा के पास एक झील से निकलकर बनारस के पास गंगा में मिलती है. लखनऊ से पहले जंगलों के कम होने और गन्ने की खेती के लिए पानी की अधिक खपत के चलते गोमती में पानी लगातार कम होता गया है.

फिर भी लखनऊ से पहले आम तौर पर गोमती साफ़ रहती है. इसीलिए गऊ घाट वाटर वर्क्स से प्रतिदिन लगभग 25 करोड़ लीटर साफ़ पानी लखनऊ शहर के पेयजल और दूसरी ज़रूरतों के लिए निकाला जाता है.

लेकिन बदले में लखनऊ क़रीब 40 करोड़ लीटर मल मूत्र और सीवर गोमती नदी में डाल देता है. इसका ख़ामियाज़ा गोमती की निचली धारा में रहने वालों को तरह-तरह की बीमारियों के रूप में भुगतना पड़ता है.

उम्मीद है अब भरवारा ट्रीटमेंट प्लांट पूरी तरह चालू होने के बाद एक बड़ी आबादी का कष्ट कुछ कम होगा.

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