चार सौ साल पुराने सत्याग्रह की याद में...

सत्याग्रह की घटना का मंचन इमेज कॉपीरइट BBC World Service

राजस्थान में नाट्यकर्मियों ने पुरानी जोधपुर रियासत में कवियों के राजसत्ता के ख़िलाफ़ सत्याग्रह की शताब्दियों पुरानी एक घटना का मंचन किया है.

वर्ष 1586 की इस घटना में जब सत्याग्रह के बावजूद तत्कालीन राजा ने उनकी बात नहीं सुनी थी तब 185 कवियों ने एक-एक कर अपनी जान दे दी थी.

इतिहासकर बताते हैं कि राजस्थान में कवियों के धरने और प्रदर्शन के कई उदारहण मिलते हैं.

जोधपुर के नाट्यकर्मियों ने अपनी संस्था 'रम्मत' के ज़रिए कवियों के इस सत्याग्रह को याद किया है.

शब्दों और ध्वनि के ज़रिए वो दर्शकों को चार सदी पीछे मानो उस मक़ाम पर ले गए जहाँ प्राचीन मारवाड़ रियासत में कवियों ने धरना सत्याग्रह किया. मारवाड़ रियासत का आऊआ वो ठीकाना था जहाँ कवि धरने पर बैठे थे.

स्वायत्ता ख़त्म होने पर सत्याग्रह

आऊवा के लोग इन कवियों की हिमायत में खड़े थे जबकि जोधपुर के राजा उदय सिंह कवियों से नाराज़ थे. राजस्थान में इतिहास धरोहर परिषद के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद ओंकार सिंह लखावत उस घटना के बारे में कहते हैं, "दरअसल ये सत्याग्रह जोधुपर की तत्कालीन सता के विरुद्ध था. इसमें कवि आऊवा में जमा हुए. इन कवियों के राजा उदय सिंह से असहमत होने के बाद राजा ने उनके गाव ज़ब्त करने का फ़रमान सुनाया था. ये गांव रियासत में होने के बावजूद ख़ुद मुख़्तियार यानी स्वायत्त थे."

ओंकार सिंह कहते हैं, "ये ऐसा सत्याग्रह था जिसमें कवियों ने राजा को क्षति नहीं पहुंचाई, बल्कि ख़ुद अपने प्राणों की भेंट चढ़ा दी. ये प्राचीन धरनों में से एक धरना है. वर्ष 1586 की ये घटना ये साबित करती है भारत में राजशाही के दौर में भी सत्याग्रह की परंपरा रही है.

आऊवा वाले ना केवल जोधपुर के राजा से लड़े बल्कि अंग्रेज़ हुकूमत से भी लोहा लेते रहे.

इस सत्याग्रह नाटक के रचियता अर्जुन देव चारण कहते हैं, "ये सत्य के लिए संघर्ष था. आज के आधुनिक युग में ये मुश्किल हो गया है क्योंकि दुनिया बहुत ख़ुदगर्ज़ हो गई है. आज कोई ये सोच भी नहीं सकता कि कोई व्यक्ति सत्य के जीवन मूल्यों के लिए अपनी जान कुर्बान कर सकता है."

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