जवानों के परिजन जंगल में

परिवारजन
Image caption पांचों पुलिसवालों के परिवार बेहद परेशान हैं और लगता है उन्हें सरकार से उम्मीद नहीं है

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले से अगवा किए गए पांच पुलिस के जवानों के परिजन अब अपने लोगों को मुक्त कराने के लिए माओवादियों से खुद ही खुद मिलने जंगल की तरफ निकल पड़े हैं.

नारायणपुर के एसपी मयंक श्रीवास्तव ने बीबीसी से बातचीत में इस बात की पुष्टि की है. श्रीवास्तव का कहना है कि जवानों के परिजन अपने स्तर से भी प्रयास कर रहे हैं ताकि वह सकुशल वापस लौट आएं.

उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि हम भी अपनी कार्रवाई कर रहे हैं लेकिन इस मामले में एहतियात बरतना बहुत ज़रूरी है. वैसे हमारे लिए संतुष्टि की बात है कि सभी जवान सुरक्षित हैं.’’

इन सभी पांच जवानों और एक ग्रामीण का अपहरण माओवादी छापामारों नें 25 जनवरी को नारायणपुर के अबूझमाड़ के जंगलों से तब किया था जब यह सभी लोग यात्री बस में स्वर होकर जिला मुख्यालय आ रहे थे.

यह घटना नारायणपुर-ओरछा मार्ग की है और यह सभी जवान इसी रास्ते में स्थित धनुरा कैंप में तैनात थे. बाद में शनिवार देर शाम माओवादियों ने अगवा किए गए ग्रामीण मूलचंद पटेल को रिहा कर दिया था.

चूँकि माओवादियों की तरफ से इस बारे में कोई बयान जारी नहीं किया गया इस लिए जवानों के परिजनों का रो रो कर बुरा हाल है. सभी जवानों के परिजन नारायणपुर ज़िला मुख्यालय में ही कैंप लगाए हुए हैं.

सोमवार की देर शाम एक स्थानीय माओवादी नेता चन्द्र ने नारायणपुर के पत्रकारों को एक बयान जारी कर सभी के सुरक्षित होने की बात कही है. हांलाकि चन्द्र के बयान की अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है.

सोमवार की सुबह से माओवादियों नें नारायपुर से ओरछा जाने वाली सड़क की नाकेबंदी कर दी है जिसके कारण वाहनों का आवागमन पूरी तरह ठप्प पढ़ गया है. खबरें हैं कि माओवादियों नें इस रास्ते पर जगह जगह पेड़ काट कर डाल दिए हैं ताकि सड़क पर वाहनों का आवागमन ना हो सके. नाकेबंदी के बावाजूद जवानों के परिजन उस इलाके में पहुँच गए हैं जहाँ से जवानों को अगवा किया गया था.

Image caption रघुनंदन ध्रुव समेत कई पुलिस जवान माओवादियों की गिरफ़्त में है

एक ऐसे ही जवान रामाधार पटेल के साले मोहन नें बीबीसी को बताया, ‘‘सभी परिजन माओवादियों से अपील करने जंगल गए हैं. हम यही कह रहे हैं कि जवान सिर्फ नौकरी कर रहे हैं. हम ग़रीब लोग हैं. हमारे लोगों को मारकर क्या मिलेगा. माओवादी अगर चाहते हैं तो हमारे लोग पुलिस की नौकरी से इस्तीफ़ा दे देंगे."

मोहन कहते हैं, ‘‘अगवा जवानों के परिजन अबूझमाड़ के जंगलों की ख़ाक छान रहे हैं ताकि उनके लोगों का कोई सुराग मिल जाए. मेरे जीजाजी परिवार का एकमात्र सहारा हैं. बेटी अपाहिज है और उनके पिता लक्वाग्रस्त हैं. इसलिए हम माओवादियों से अपील करते हैं कि वह मानवीय दृष्टिकोण से उन्हें रिहा कर दें."

जहाँ से जवानों का अपहरण किया गया है वह इलाका माओवादियों के आधार वाला क्षेत्र है जहाँ इनकी सामानांतर सरकार चलती है. इस इलाके को अभूझमाड़ के नाम से भी जाना जाता है जो चालीस हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है.

पुलिस के लोग इस इलाके को माओवादियों की राजधानी के रूप में चिन्हित करते हैं. हाल ही में सेना ने इस इलाके में अपना प्रशिक्षण केंद्र खोलने की भी घोषणा की है.

इस घोषणा के बाद माओवादी इसका विरोध कर रहे हैं. एक बयान में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य विशेष जोनल कमिटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी नें कहा है कि सेना के ‘‘प्रशिक्षण केंद्र के बहाने सरकार सदियों से माड़ के क्षेत्र में रहते आ रहे माड़ आदिम जनजाति के लोगों को वहां से विस्थापित’’ करना चाहती है.

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