माओवादी हिंसा से अधिक प्रभावित सुरक्षाबल

माओवादी

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में जो रिपोर्ट पेश की है उसके अनुसार वर्ष 2010 में माओवादी हिंसा से सम्बंधित कुल 1918 घटनाएं हुईं जिनमें 268 सुरक्षाकर्मी मारे गए जबकि मुठभेड़ों में 175 माओवादी छापामार भी मारे गए हैं.

मंत्रालय के यह आंकड़े सभी नक्सल प्रभावित राज्यों को मिलाकर हैं.

लेकिन मध्य भारत का छत्तीसगढ़ राज्य माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच चल रहे संघर्ष का केंद्र बना हुआ है.

बड़े पैमाने पर चल रहे नक्सल विरोधी अभियान यानी ‘आपरेशन ग्रीनहंट के बावजूद पिछले साल छत्तीसगढ़ राज्य में माओवादी हिंसा में सबसे ज्यादा सुरक्षा बलों को ही नुकसान उठाना पड़ा है.

ऑपरेशन ग्रीनहंट

पिछले एक साल से छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश में माओवादियों के खिलाफ सघन अभियान चल रहा है जिसे आपरेशन ग्रीनहंट के नाम से जाना जाता है.

इस अभियान में पचास हज़ार से ज्यादा सुरक्षा बलों के जवान माओवादी छापामारों से लोहा लेने का काम कर रहे हैं. मगर इस अभियान के बावजूद छह अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा के ताद्मेतला में माओवादी छापामारों नें केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 75 जवानों को घात लगाकर मौत के घाट उतार दिया था.

यह देश में अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला था. इसके बाद बस्तर संभाग के नारायणपुर में भी दो जुलाई को माओवादियों नें उसी तरह केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 27 जवानों को मारा दिया.

लेकिन पुलिस अधिकारियों का दावा है कि 2010 में माओवादी हिंसा में कमी आई है. उनका तर्क है कि नक्सली हिंसा की वारदातें 2009 में ज्यादा रही हैं.

आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर नई दिल्ली में मंगलवार को मुख्यमंत्रियों की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में हो रही नक्सली हिंसा पर चिंता जताई.

हालाँकि उनका कहना है कि वर्ष 2009 की तुलना में 2010 में नक्सली हिंसा में कमी आई है. मगर हालात अब भी चिंताजनक बने हुए हैं.

छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन मानते हैं कि कुछ घटनाओं को छोड़ कर 2010 में नक्सलियों को ज्यादा क्षति का सामना करना पड़ा है.

वह कहते हैं, "अगर दंतेवाड़ा के ताड़मेटला और नारायणपुर की घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो 2010 में सुरक्षा बलों को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है. अलबत्ता नक्सलियों को ही ज्यादा नुक़सान झेलना पड़ा है. हमारे आंकड़ों की हिसाब से पिछले साल छत्तीसगढ़ में लगभग 70 से 80 नक्सली मारे गए हैं. मगर नक्सलियों से बरामद दस्तावेज़ बताते हैं कि उन्हें इससे भी ज्यादा क्षति हुई है. ताड़मेटला और नारायणपुर की घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो एक साल में छत्तीसगढ़ में सिर्फ 19 पुलिसकर्मी मारे गए हैं."

आपरेशन ग्रीन हंट को लेकर वैसे ही विवाद शुरू हो गया है. सामाजिक संगठन मानते हैं कि इस अभियान के केंद्र में सिर्फ वही इलाके हैं जहाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ खनिज संपदा का दोहन करना चाहती हैं.

आंदोलनकारी

समाज शास्त्री शशिभूषण पाठक कहते हैं, "यह अभियान उसी इलाके में ज्यादा सघन है जहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए ज़मीन के अधिग्रहण का काम चल रहा है. वहां यह कर क्या रहे हैं कि जो लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों या ज़मीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, उन्हें माओवादी कहकर बंद कर दिया जा रहा है."

मगर छत्तीसगढ़ के पुलिस माहानिदेशक इस से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि ग़ैर खनन वाले इलाकों में भी माओवादियों के साथ सुरक्षा बल जम कर संघर्ष कर रहे हैं.

Image caption माओवादियों के कुछ धड़ों में फूट भी देखी गई है

उन्होंने बस्तर का उदहारण देते हुए कहा, "आज नक्सलियों के पास 14 मिलिट्री कम्पनियाँ हैं. इसमें से 11 या 12 कंपनियों को उन्होंने दंडकारण्य में झोंक रखा है. उसी तरह से उनके पास पचास से ज्यादा मिलिटरी प्लाटून हैं जिन्हें उन्होंने छापामार युद्ध में प्रशिक्षित किया है. इनमे से 36 दंडकारण्य में तैनात हैं. उनपर इसी इलाके में सबसे ज्यादा दबाव पड़ रहा है इस लिए उन्होंने भी इसी इलाके में अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.

वहीँ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी के प्रवक्ता गुड्स उसेंडी का आरोप है कि आपरेशन ग्रीन हंट देखने से तो माओवादियों के खिलाफ नज़र आता है मगर इसके तहत सरकार की नीतियों की आलोचना करने वालों को ही शिकार बनाया जा रहा है.

पहले से रिकार्ड किए गए बयान में उन्होंने कहा, "चूँकि हमारी पार्टी इनकी कॉरपारेट लूट, तमाम जनविरोधी नीतियों और घोटालेबाजों की राह में सबसे बड़ी बाधा बनी है इसी लिए इसे रास्ते से हटाने के लिए आज आपरेशन ग्रीन हंट चलाया जा रहा है. इस आपरेशन के तहत देश के एक बड़े हिस्से में सरकारी आतंक का नंगा नाच जारी है."

'केवला दिखावा है'

गुड्स का आरोप है कि ऊपर से देखने पर भले ही यह हमला माओवादियों पर केंद्रित नज़र आ रहा है लेकिन "वास्तव में यह हमला सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले हर व्यक्ति या संगठन" पर हो रहा है.

अगर पुलिस और सरकार पर ज्यादतियों के आरोप लग रहे हैं वहीँ माओवादियों पर भी अपने सिद्धांत से भटकने के भी आरोप लगे हैं.

यह बात सही है कि माओवादियों के आंदोलन में काफी बदलाव आया है और लेवी द्वारा इकठ्ठा किये गए पैसों के लिए उनकी आलोचना भी हो रही है.

इन सवालों पर पाठक का कहना है, "इस पर गहरे विचार की ज़रुरत है. जो बुर्जुवा पूँजी या यूँ कहें कि दलाल पूँजी का जो प्रभाव है वह माओवादियों के यहाँ भी पड़ ही रहा है. माओवादी भी कोई आसमान से टपके हुए लोग नहीं हैं. अब जैसे पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है, उनका भी प्रभावित होना स्वाभाविक है.

लेकिन पुलिस और माओवादी चाहे जो कहें, वर्ष 2010 में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच हो रहे संघर्ष का सबसे ज्यादा दंश झेला आम नागरिको ने.

आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल 877 आम नागरिक इस संघर्ष में मारे गए जो पिछले दो वर्षों की तुलना में काफी ज्यादा है. मंगलवार को मुख्यमंत्रियों की बैठक में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसपर चिंता जताई है.

मगर छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन का तर्क कुछ अलग है.

वह कहते हैं, "अमरीका में गृह युद्ध दास प्रथा को लेकर हुआ था. और उस युद्ध में जो लोग मरे थे वह अमरीका के ही लोग थे, मंगल गृह से वहां उतारकर लोग नहीं लड़ रहे थे. लेकिन अगर इस बात के लिए लड़ाई बंद कर दी जाती कि लोग मर रहे हैं तो क्या कभी दास प्रथा को समाप्त किया जा सकता था?"

हालाँकि इस संघर्ष का अंजाम क्या होगा किसी को नहीं मालूम. लेकिन सामाजिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर सरकार और माओवादियों के बीच वार्ता होती है तो इससे मामले का हल निकल सकता है.

शशि भूषण पाठक का सुझाव है, "यह एक ऐसा समय है जब इसमें राजनीतिक ऐक्शन कम दिख रहा है और माओवादियों के एक आधे धड़े का अपराधीकरण भी हुआ है. झारखंड जैसे इलाके में माओवादियों में फूट भी देखी जा रही है. यह सिर्फ दलाल पूँजी, स्टेट रेप्रेशन और राजनीतिकरण की कमी की वजह से है”.

बातचीत ही एकमात्र रास्ता

उनका कहना है, “लेकिन यह सिर्फ एक दौर है जो बीत जाएगा. 1967 से शुरू हुआ आंदोलन इतने दिनों तक चला. इसको बिलकुल से ख़त्म कर देना सरकार के लिए संभव नहीं है. सरकार के पास एक रास्ता है जो हम लोग भी बार बार कहते रहे हैं कि आप माओवादियों के साथ वार्ता कीजिए”.

“वार्ता करके सरकार और माओवादी अपने अपने माडल को लेकर जनता के बीच जाएँ. यह पूरी छूट होनी चाहिए सरकार को भी और माओवादियों को भी कि वह अपने अपने माडलों के साथ जनता के बीच में जाएँ और उन्हें रखें और इस पर 'रेफ़रेंडम' करा लें."

तो सवाल उठता है कि क्या कभी सरकार और माओवादियों के बीच गंभीरता से वार्ता संभव हो पाएगी.

निकट भविष्य में इसके आसार कम नज़र आ रहे हैं. दोनों तरफ से अपनी अपनी शर्तें हैं. और इन सब के बीच आम आदमी इंतज़ार कर रहा है कि आखिर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा.

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