कैसे हो बीमार सड़कों का इलाज?

विद्यानगर मंदिर मार्ग
Image caption विद्यानगर मंदिर मार्ग अब एक खुशहाल सड़क है, जिस पर सरपट गाड़ियां दौड़ती हैं और पानी नहीं भरता.

ये कहानी है हुबली की एक ऐसी सड़क की, जिसकी 25 साल लंबी बीमारी का एक अनोखा इलाज ढूंढ़ा हुबली के डॉक्टर एमसी सिंधूर ने.

हुबली के रिहायशी इलाके विद्यानगर को नेशनल हाइवे-4 से जोड़ने वाली ये सड़क पिछले 25 साल से बदहाल थी. इस सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे थे, इसके किनारे टूट गए थे और जगह-जगह धँसाव था.

डॉक्टर सिंधूर के घर से उनके नर्सिंग होम तक जाने वाली ये सड़क आम लोगों के लिए मुसीबत बन गई थी और स्कूली बच्चों के लिए एक ख़तरा थी.

साल दर साल स्थानीय प्रशासन से शिकायतें करने के बाद भी जब सड़क की मरम्मत नहीं की गई तो डॉक्टर सिंधूर ने ख़ुद ही कुछ करने का फैसला किया.

इलाक़े के लोगों से बातचीत के दौरान उन्हें सूझा कि क्यों न इस सड़क का बीमा कराया जाए और बीमे की रकम से ही सड़क की मरम्मत कराई जाए.

मुहिम

Image caption डॉक्टर एमसी सिंधूर (बांए से दूसरे) इस मुहिम को देश के सभी शहरों तक पहुंचाना चाहते हैं.

डॉक्टर सिंधूर ने बीमा संबंधी नियमों की जानकारी ली और जाना कि बीमे के लिए सड़क के गुणवत्ता सर्टिफिकेट की ज़रूरत है. इसके लिए वो स्थानीय प्रशासन के पास पहुंचे.

उन्होंने बताया, ''किसी भी वस्तु का बीमा उस पर मालिकाना हक़ रखने वाले व्यक्ति या संगठन की रज़ामंदी के बग़ैर नहीं हो सकता. सड़क एक सार्वजनिक संपत्ति है जिस पर प्रशासन का मालिकाना हक़ है. प्रशासन की ज़िम्मेदारी थी कि वो हमें गुणवत्ता सर्टिफिकेट दे और इसके लिए उन्होंने तुरंत सड़क की मरम्मत कराई.''

सड़क की शुरुआती मरम्मत के बाद भी लोगों ने बीमा कराने का फ़ैसला नहीं बदला. बीमे की काग़ज़ी कार्रवाई के लिए हुबली नगर पालिका की ओर से अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी एनओसी की भी ज़रूरत थी.

नागरिकों की जागरुकता को देखते हुए जल्द ही एनओसी मिल गया और 2007 में 303 रुपए के सालाना प्रीमियम पर ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी के ज़रिए सड़क का दो लाख का बीमा हो गया.

ये भारत का पहला ‘सड़क बीमा’ है. यानी भारत की पहली ऐसी सड़क जिसकी मरम्मत की ज़िम्मेदारी अब बीमा कंपनी पर है. इस बीमे के तहत सड़क को होने वाले किसी भी तरह के नुक़सान के लिए मरम्मत का पैसा कंपनी को देना होगा.

सड़क की टूट-फूट संबंधी किसी भी शिकायत का मुआयना कंपनी के इंजीनियर करते हैं और मरम्मत का पैसा सीधे नगर पालिका के खाते में जमा करा दिया जाता है.

ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी के हुबली प्रभाग के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, ''नई पॉलिसी के तहत किसी भी तरह के प्राकृतिक नुकसान के लिए नुकसान के अनुपात में छह लाख तक का हर्जाना दिया जा सकता है. 2007 से अब तक हुई एक बार की मरम्मत में 4 हज़ार का खर्च आया है.''

पारदर्शिता

विद्यानगर मंदिर मार्ग अब एक खुशहाल सड़क है, जिस पर सरपट गाड़ियां दौड़ती हैं और पानी नहीं भरता.

डॉक्टर सिंधूर के मुताबिक़ पहले जहाँ सरकारी और निजी कारणों से की जाने वाली खुदाई के बाद सड़क टूटी पड़ी रहती थी, वहीं अब बीमा कंपनी के डर से सड़क की मरम्मत का काम तुरत-फुरत हो जाता है.

नागरिकों को उपलब्ध जानकारी के चलते मरम्मत का काम भी लाल फ़ीताशाही के मकड़जाल में नहीं फंसता.

Image caption 2011 के लिए इलाके के बच्चों ने अपने जेबखर्च से पॉलिसी का प्रीमियम भरा है.

डॉक्टर सिंधूर कहते हैं, ''भारत में सड़कों की बदहाली एक आम समस्या है. सड़कें बनने में ही सालों लग जाते हैं तो उनकी मरम्मत की सुध कौन लेगा. ऐसे में बीमा के ज़रिए धन की कमी की समस्या को आसानी से हल किया जा सकता है.''

सड़क के बीमे का एक फ़ायदा यह भी है कि बीमा कंपनी और आम आदमी को सड़क बनाने और उसकी मरम्मत के लिए इस्तेमाल किए जा रहे कच्चे माल की गुणवत्ता की पूरी जानकारी रहती है.

हथियार

डॉक्टर सिंधूर की मानें तो ये पैसे के सही इस्तेमाल और सरकारी कामकाज पर नज़र रखने का एक हथियार है.

डॉक्टर सिंधूर इस मुहिम को ज़्यादा से ज़्यादा शहरों और रिहायशी इलाकों तक पहुंचाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने सारी जानकारियों सहित एक ब्लॉग की शुरुआत की है.

हैरत नहीं कि इस मुहिम की वजह से 2011 के लिए इलाके के बच्चों ने अपने जेब ख़र्च से पॉलिसी का प्रीमियम भरा है.

डॉक्टर सिंधूर कहते हैं, ''प्रशासन साथ दे और आम लोग आगे आएं तो भारत की हर सड़क का बीमा हो सकता है. भारत सरकार नई सड़कें बनाने के लिए एक लाख करोड़ खर्च करने की योजना बना रही है."

उन्होंने कहा कि इस पैसे के बहुत छोटे हिस्से से अगर सड़कों का बीमा करा दिया जाए तो सड़कें हमेशा तंदरुस्त रह सकती हैं.

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