पुरोहिताई को लेकर जंग

पुष्कर

भारत में हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थ स्थल पुष्कर में पुरोहिताई को लेकर उठे विवाद में पुश्तैनी तौर पर पुरोहिताई कर रहे पंडितों को राहत मिल गई है.

पुष्कर के निकटवर्ती इलाक़ों से आकर वहां पुरोहित का काम कर रहे पंडितों के एक समूह ने इस काम पर अपना हक़ जताते हुए अजमेर की एक अदालत में दावा दायर किया था.

मगर अदालत ने 'आयलड़' यानि 'बाहर से आए हुए' इन पंडितों को राहत नहीं दी है.

पुष्कर में ये विवाद तब उठा जब पुश्तैनी तौर पर पुरोहिताई कर रहे पंडितों ने हाल के वर्षों में समीपवर्ती क्षेत्रों से आए पंडितों के पुरोहित की भूमिका निभाने पर आपत्ति की और उन्हें 'आयलड़' कहते हुए इस काम से दूर कर दिया.

इसके ख़िलाफ़ 'आयलड़' पंडितों ने अदालत में गुहार लगाई और तीर्थ पुरोहित संघ के विरुद्ध अंतरिम राहत की प्रार्थना की. मगर अदालत ने ये राहत देने से इनकार कर दिया.

बाहर से आए पंडितों को राहत नहीं

तीर्थ पुरोहित संघ ने इन पंडितों को 'आयलड़'नाम दिया क्योंकि के वे हाल के वर्षों में अवतरित हुए हैं.

पुरोहित संघ ने अपनी बात के पक्ष कई इतिहासकारों के मत पेश किए, उनमे अंग्रेज साहित्यकार जेम्स टोड का लेखन भी शामिल था.

पुरोहित संघ के अध्यक्ष लड्डूलाल कहते हैं, "हमने पुराने समय का रिकॉर्ड पेश किया. ये भी दलील दी कि इलाहाबाद, कुरुक्षेत्र और बदरीनाथ में भी पुश्तैनी पंडित ही पुरोहिताई करवाते हैं. रियासत काल के दौरान के फ़रमान और कार्रवाई का हवाला भी दिया ताकि ये साबित हो सके कि हम लोग परंपरा के तौर पर पुश्तैनी रूप से ये काम कर रहे है."

युवा तीर्थ पुरोहित संघ के अध्यक्ष गोविन्द पाराशर कहते है कि पुष्कर में उन्हीं पंडितों को पुरोहिताई का हक़ है जो सदियों से यहीं आबाद है और वंश परम्परा के तहत ये काम संपन्न कराते रहे है. अदालत ने भी कहा कि अगर कोई रूढ़ी क़ानून के ख़िलाफ़ नहीं है तो उसे जारी रखा जा सकता है.

इस संघ का दावा है कि पुष्कर के पुरोहित उनके सदस्य है. पुष्कर में हर रोज़ पांच हज़ार से ज़्यादा तीर्थ यात्री पुष्कर आते हैं और पूजा अर्चना करते है.

इन तीर्थ यात्रियों को कौन पूजा कराए और धार्मिक रस्मों रिवाज़ सम्पन्न कराए, इसे लेकर तीर्थ पुरोहित संघ और पंडितों के एक समूह में कई माह से विवाद चल रहा था.

अभी उसका पटाक्षेप भले न हुआ हो, मगर इसमें एक अहम मोड़ ज़रूर आया है.

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