ये शीला और मुन्नी अलग हैं

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Image caption दोनों बहनें फ़ेंसिंग यानि तलवारबाज़ी की खिलाड़ी हैं.

ये मुन्नी नाम कमाने जा रही है और उसकी बहन शीला भी. दोनों चाहती हैं कि वे देश का नाम रोशन करें.

और हां, वे यह भी चाहती हैं कि उन्होंने ब्याज पर जो कर्ज़ लिया है, उसकी वापसी का भी कोई इंतजाम हो जाए.

हम बॉलीवुड की बदनाम मुन्नी और जवानी वाली शीला की बात नहीं कर रहे हैं. ये मुन्नी और शीला सगी बहने हैं.

दोनों बहनें छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में अपनी मज़दूर मां के साथ रहती हैं और अब तलवारबाज़ी के एशियन चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए बैंकाक जा रही हैं.

मुन्नी देवांगन और शीला देवांगन की मां रुक्मणि मज़दूरी करती हैं और घर उसी से चलता है. मुन्नी और शीला का एक छोटा भाई भी है.

हौसला

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Image caption ग़रीबी के बावजूद इन बहनों से हिम्मत नहीं हारी है.

पिछले साल जब शीला ने तलवारबाज़ी की राष्ट्रीय स्पर्धा में रजत पदक हासिल किया, उसी समय ये तय हो गया था कि वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करेंगी.

राष्ट्रीय स्पर्धाओं में अपना जौहर दिखा चुकी शीला की छोटी बहन मुन्नी को भी उनकी प्रतिभा के कारण इस साल ये अवसर मिला है.

ग्यारहवीं में पढ़ने वाली शीला बताती हैं कि कोई चार साल पहले जब उन्होंने स्कूल में तलवारबाज़ी की एक स्पर्धा देखी तो उनको लगा कि ये कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन शीला का हौसला ग़रीबी के आगे नहीं टिक सका.

दिहाड़ी मज़दूरी करने वाली उनकी मां के लिए ये संभव नहीं था कि एक कमरे वाले घर का किराया देने और रोटी-दाल के बाद इतने पैसे बचा सकें कि शीला के खेल के लिये तलवार खरीद सकें.

शीला से छोटी मुन्नी की पढ़ाई इसलिए छुड़ा दी गई क्योंकि उसकी फ़ीस जमा कर पाना संभव नहीं था. परिवार ने तय किया कि मुन्नी घर में ही रह कर अपनी आगे की पढ़ाई करे.

शीला बताती हैं, “मैंने तय कर लिया था कि तलवारबाज़ी करनी है तो करनी है. मैंने अपने स्पोर्ट्स टीचर की मदद ली और तलवार की जगह डंडे से ही अभ्यास शुरु किया.”

शीला का जुनून देख कर कुछ लोग आगे आए और फिर उनकी मदद से शीला को पहली बार तलवार हासिल हुई.

जिले और राज्य की स्पर्धाओं में तलवारबाजी में अपना झंडा गाड़ने वाली शीला ने पहली बार ही राष्ट्रीय स्पर्धा में अपनी जगह बना ली. इस बीच मुन्नी ने भी बड़ी बहन की देखा-देखी तलवारबाज़ी शुरु की.

संघर्ष

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Image caption अगले महीने शीला और मुन्नी एशियन चैंपिनयशिप में हिस्सा लेने बैंकॉक जाएंगीं.

पिछले साल जब राष्ट्रीय स्पर्धा में शीला को रजत पदक मिला तो बधाई देने वालों का तांता लग गया. लोगों ने मदद के ढ़ेरों आश्वासन दिए. परिवार को लगा कि अब शायद उनके दिन बदलने वाले हैं लेकिन सारे आश्वासन कोरे साबित हुए.

शीला और मुन्नी की मां रुक्मणि कहती हैं, “मेरे लिये दो जून की रोटी मुश्किल होती है. गरीबी रेखा का कार्ड तक नहीं बन सका. ऐसे में जब शीला और मुन्नी के विदेश जाने की बात आई तो मैं कुछ सोच नहीं पाई. ”

परिवार के चारों सदस्यों ने मिल-बैठ कर तय किया कि एशियन चैंपियनशिप में दोनों बहनें अगर नहीं जाती हैं तो उनकी पिछले चार साल की मेहनत बेकार जाएगी. कौन जाने, इस स्पर्धा के बाद शायद घर की दशा सुधर ही जाए !

पासपोर्ट और दूसरे ख़र्चों के लिए कहीं से कर्ज़ लेने की बात तय हुई लेकिन मज़दूरी करने वाले परिवार को आखिर उधार कौन दे? अंत में शीला और मुन्नी के कोच और तलवारबाज़ी संघ के सचिव डीआर साहू की ज़मानत पर उन्हें पाँच प्रतिशत की ब्याज दर पर 20 हजार रूपए का कर्ज़ मिला.

उनके कोच डीआर साहू कहते हैं, “सरकार अगर थोड़ी सी मदद करे तो ये दोनों बहने दुनिया भर में अपनी तलवारबाज़ी की धूम मचा दें. लेकिन गरीबी इनके लिए सबसे बड़ा अभिशाप है.”

फिलहाल चार से 12 मार्च तक बैंकॉक में आयोजित एशियन चैंपियनशिप से पहले पटियाला के कैंप के लिये रवाना हो रही शीला और मुन्नी की सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर उन्हें सरकार की कोई मदद नहीं मिली तो कर्ज़ कैसे चुकेगा.

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