एक टुकड़ा ज़िंदगी...

भारत में आज भी माहवारी जैसे विषयों पर बातचीत को वर्जित और शर्मनाक माना जाता है.

एक ताज़ा सर्वे के मुताबिक भारत में 70 फ़ीसदी से ज़्यादा महिलाओं को माहवारी के दौरान इस्तेमाल के लिए साफ कपड़े या नैपकिन उपलब्ध नहीं.

सर्वे के मुताबिक पश्चिमी भारत में स्थिती सबसे खराब है जहां 83 फ़ीसदी महिलाओं के पास इन दिनों के लिए कोई सुरक्षित साधन नहीं और वो कपड़े के साफ टुकड़ों की भी मोहताज हैं.

अनुसंधान क्षेत्र से जुड़े संगठन एसी नेलसन और गैर सरकारी संस्था प्लान इंडिया के ये आंकड़े भारत के लिए शर्मनाक हैं. सिंगापुर और जापान में जहां 100 फ़ीसदी, इंडोनेशिया में 88 फ़ीसदी और चीन में 64 फ़ीसदी महिलाओं को ये सुविधा प्राप्त है वहीं भारत में केवल 12 फ़ीसदी महिलाएं ही माहवारी के दौरान साफ-सुथरे नैपकिन का इस्तेमाल करने में सक्षम हैं.

ग्रामीण इलाकों में माहवारी के दौरान महिलाएं आज भी घर के सबसे गंदे कपड़े, टाट-पट्टी यहां तक की रेत और राख का इस्तेमाल कर रही हैं.

भारत के कई इलाकों में माहवारी जैसे विषयों पर बातचीत को आज भी वर्जित और शर्मनाक माना जाता है. ग्रमीण इलाकों में निरक्षरता के चलते महिलाओं के लिए मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं.

एक कड़वा सच

गांव में इतनी ग़रीबी थी कि कपड़े के छोटे से छोटे टुकड़े के लिए हमें जद्दोजहद करनी पड़ती थी. जब पहनने के कपड़ा नसीब नहीं तो माहवारी के लिए कहां से मिलेगा. मैंने पोलीथीन का इस्तेमाल किया है और कालीन के पुराने टुकड़ों का भी. घाव हो जाते थे लेकिन बीमारी और गंदगी का कोई सवाल नहीं, क्योंकि हमारे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं.

रीता

कमाई के लिए तिलहर से अपना गांव छोड़कर दिल्ली आई रीता अब भी उन दिनों को याद कर सिहर जाती हैं.

वो बताती हैं, ''गांव में इतनी ग़रीबी थी कि कपड़े के छोटे से छोटे टुकड़े के लिए हमें जद्दोजहद करनी पड़ती थी. जब पहनने के कपड़ा नसीब नहीं तो माहवारी के लिए कहां से मिलेगा. मैंने पोलीथीन का इस्तेमाल किया है और कालीन के पुराने टुकड़ों का भी. घाव हो जाते थे लेकिन बीमारी और गंदगी का कोई सवाल नहीं, क्योंकि हमारे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं.''

सर्वे में यह बात भी सामने आई कि हर महीने इन दिक्कतों के चलते महिलाएं खुद को घर की चारदिवारी तक सीमित कर लेती हैं और किशोरियां स्कूल-कॉलेज का रुख नहीं करतीं.

कोयंबटूर के ए मुरुगननथम ने भारतीय महिलाओं की इन्ही परेशानियों का एक अनोखा हल भी ढूंढा है.

उन्होंने एक ऐसी मशीन बनाई जो कई तरह के कच्चे माल की मदद से ग्रामीण महिलाओं के लिए सस्ते नैपकिन तैयार करती है. ये नैपकिन बेहद स्वच्छ हैं और इनकी कीमत लगभग एक रुपए है.

जागरुकता

ए मुरुगननथम की यह खोज स्वंय सहायता समूहों के ज़रिए भारत के कई इलाकों तक पहुंच चुकी है लेकिन कई चुनौतियां अब भी बाकी हैं.

मुरुगननथम कहते हैं, ''ग़रीबी और उपलब्धता के अलावा समस्या ये भी है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में माहवारी को लेकर कई भ्रांतियां हैं. ग्रामीण महिलाओं के बीच साफ़-सुथरे नैपकिन के इस्तेमाल को ज़रूरत नहीं बल्कि विलासिता माना जाता है. सरकार इस अज्ञानता को दूर करने के लिए कुछ नहीं कर रही है.''

मुरुगननथम इस नैपकिन की खोज को ‘दूसरी श्वेत क्रांति’ मानते हैं और इसे घर-घर तक पहुंचाना चाहते हैं.

मुरुगननथम की मानें तो ‘दूसरी श्वेत क्रांति’ के रुप में वो इस खोज को घर-घर तक पहुंचाने की कोशिश में जुटे हैं. उनकी मशीनों से बने नैपकिन भारत के कई राज्यों में स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए महिलाओं तक पहुंच रहे हैं.

मुरुगननथम के अलावा गूंज और सेवा जैसी गैर सरकारी संस्थाओं ने भी वस्त्रदान के ज़रिए इकट्ठा किए गए पुराने कपड़ों के सस्ते सैनिटरी नैपकिन बनाने काम शुरु किया है. हालांकि ये कोशिशों फिलहाल सीमित दायरों में हैं.

बेहतर हो ज़िंदगी

हाल ही में भारत सरकार ने महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार और स्वच्छता अभियान के तहत ग्रामीण इलाकों में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने के लिए 2000 करोड़ की एक योजना बनाई है.

पुराने अनुभवों को देखें तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद से चलने वाली इस तरह की योजनाएं ग्रामीण इलाकों तक पहुंचने में कितनी कारगर होंगी ये भी अपने आप में एक सवाल है.

भारत में लाखों महिलाएं माहवारी को कुदरत का अभिषाप मानती हैं, और इस बात से अनजान हैं की ये प्रक्रिया इंसान की पैदाइश के लिये कुदरत का एक अनमोल तोहफा है.

ज़रूरी है कि समाज इन मुद्दों पर खुल कर सामने आए ताकि महिलाओं की जिंदगी कहीं बेहतर हो सकती है.

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