बिहार में 'सवर्णों' को आरक्षण?

नीतीश कुमार (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption बिहार की नीतीश सरकार ने राज्य में एक और जाति आधारित आरक्षण चाहती है

बिहार की नीतीश सरकार ने राज्य में एक और जाति आधारित आरक्षण की संभावना जगा दी है. लेकिन इस बाबत फिर जातीय विवाद बढ़ने की आशंका भी उभरने लगी है.

राज्य मंत्रिपरिषद ने हाल ही में किए एक निर्णय में कहा है कि ऊंची जातियों से जुड़े ग़रीबों के हित संबंधी सुझाव देने के लिए जल्दी ही 'सवर्ण आयोग' का गठन किया जाएगा.

ये भी कहा गया है कि ये आयोग सवर्ण ग़रीबों के आर्थिक और शैक्षणिक हालात का पता लगाकर उन्हें विशेष मदद के लिए ज़रूरी उपाय सुझाएगा.

जो बात अभी खुलकर नहीं कही गई है, वो ये है कि ग़रीब सवर्णों के लिए राज्य की सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रतिशत क्या हो, आयोग की सिफारिशें आ जाने पर ये तय होगा.

लेकिन राज्य सरकार की ऐसी मंशा के शुरुआती ऐलान पर ही जो तीखे हमले होने लगे हैं, वे विवाद और विरोध के भावी उग्र रूप की झलक दिखा रहे हैं.

कुछेक का मानना है कि इसके पीछे राज्य की जातीय राजनीति से जुड़े विरोध या समर्थन की मानसिकता काम कर रही है लेकिन ऐसा मामला नीति और नीयत में छिपे छद्म का संकेत देता रहा है.

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव सत्ता में आने पर सवर्ण ग़रीबों को सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के वादे बार-बार कर रहे थे.

इसी के असर या दबाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी ऐलान करना पड़ा था कि दोबारा उनकी सरकार अगर बनी तो सवर्ण आयोग गठित करके वो इस आरक्षण का कोई रास्ता ज़रूर निकालेंगे.

इसलिए जब भारी बहुमत के साथ उनकी सत्ता बरक़रार रह गई और इसमें सवर्ण मतदाताओं के ख़ास योगदान की चर्चा होने लगी तो उन्होंने अपने वादे पर अमल शुरू कर दिया.

अपनों का विरोध

अब विपक्ष की कौन कहे, यहाँ सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड के ही एक विधायक और चर्चित कथाकार प्रेम कुमार 'मणि 'इस बाबत मुख्यमंत्री पर खुलकर हमला बोल रहे है.

उनका कहना है, "मैं समझता हूँ कि ग़रीबी दूर करने संबंधी सरकारी योजनाओं की कोई कमी नही है और इसमें जाति कहीं से आड़े नहीं आती. फिर इस सवर्ण आयोग का क्या मतलब है? मैं पूछता हूँ कि क्या स्वस्थ लोगों के लिए अस्पताल बना रहे हो नीतीश कुमार? भूमि सुधार आयोग और सामान्य स्कूल शिक्षा प्रणाली आयोग की सिफारिशों को तो आपने ठंडे बस्ते में डाल रखा है. फिर सवर्ण आयोग की घोषणा करके आप लोगों की आँखों में धूल क्यों झोंकना चाहते हैं?"

उधर प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता प्रेमचंद्र मिश्र भी नीतीश कुमार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं. वो कहते हैं, "सवर्ण आयोग वाला ये निर्णय एक छलावा है. नीतीश कुमार उन सवर्णों को झूठी दिलासा दे रहे हैं जिनके वोट से ये दूसरी बार सत्ता में आये है. दरअसल ये लोग सवर्ण विरोधी मानसिकता वाले नेता हैं लेकिन उनके पक्षधर होने का ढोंग रचाना भी खूब जानते हैं."

और भी कई तल्ख़ प्रतिक्रियाएं प्राय हर रोज़ आ रही हैं. आरक्षण का मामला है ही ऐसा कि जात पात से जुड़ी राजनीति के कान इस पर फ़ौरन खड़े हो जाते हैं.

नीतीश सरकार की साझीदार भारतीय जनता पार्टी इस सवर्ण आरक्षण वाले मामले को पूरी तरह अपने हक़ में मानती है. लेकिन ये सचाई हर कोई जानता है कि जातिगत आरक्षण के मामले में प्राय हरेक दल 'सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे ' वाली रणनीति अपनाता है. वोटों के नफ़ा - नुक़सान की इसमें मुख्य भूमिका होती है.

वैसे, आम जनता में शामिल सवर्ण समाज के ग़रीबों में नीतीश सरकार के इस फ़ैसले ने राहत भरी उम्मीद ज़रूर जगा दी है. लेकिन इस उम्मीद को बहस और विवाद के कितने आघातों से अभी गुज़रना होगा, कहा नहीं जा सकता.

सवाल है कि आर्थिक और शैक्षणिक आधार पर सवर्ण समाज का आकलन कितने न्यायसंगत नज़रिए से हो पाएगा.

ये सवाल इसलिए है क्योंकि सत्ता राजनीति की नज़र वोट बैंक बढाने पर बहुत ज़्यादा और लोगों के हालात सुधारने पर बहुत कम हुआ करती है.

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