कश्मीर में घट सकते हैं सैनिक

जीके पिल्लै
Image caption गृह सचिव का कहना है कि दस हज़ार अर्धसैनिक बल वापस बुलाए जा सकते हैं.

केंद्र सरकार कश्मीर से दस हज़ार अर्धसैनिक बलों को वापस बुलाने की योजना में है.

केंद्र सरकार के गृह सचिव जीके पिल्लइ ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा कि गृह मंत्रालय का ऐसा मानना है कि कुछ स्थानों में सैनिकों की संख्या में कमी की जा सकती है.

उनका कहना था, ‘‘कश्मीर में पर्याप्त संख्या में सैन्य बल हैं और यहां केंद्रीय बलों में कमी की जा सकती है.’’

पिल्लइ ने विवादित सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम (एएफपीएसए) का ज़िक्र करते हुए कहा कि इसमें संसोधन की की गुंजाइश है और उम्मीद है कि कश्मीर के कुछ हिस्सों में इस क़ानून को हटाया जा सकेगा.

यह पूछे जाने पर कि कितने सैनिकों को कश्मीर से हटाया जा सकता है तो उनका कहना था, ‘‘सरकार ने 2009 में दस बटालियन (दस हज़ार सैनिक) हटाए थे. पिछले साल सैनिक नहीं हटाए गए क्योंकि जून से सितंबर तक आंदोलन चलता रहा.’’

उनका कहना था, ‘‘इस साल मुझे लगता है कि हम आसानी से दस बटालियन तो हटा ही सकते हैं. दस बटालियनों का कोई बड़ा असर नहीं होगा. ’’

इस समय कश्मीर में 70 बटालियनें हैं जबकि भारत के सात नक्सल प्रभावित राज्यों में अर्धसैनिक बलों की 62 बटालियनें हैं.

पिल्लइ का कहना था कि वो कोशिश करेंगे कि वो अधिक से अधिक संख्या में कश्मीर से सैनिकों को हटाने की कोशिश करेंगे.

एएफपीएसए के बारे में पिल्लइ का कहना था कि इसको हटाने की मांग कश्मीर में होती रही है लेकिन इस बारे में जो भी फ़ैसला होगा वो राजनीतिक होगा.

उनका कहना था, ‘‘इसमें संशोधन की कोशिश हो रही है. अगर नहीं भी संशोधन होता है तो हम कश्मीर के कुछ हिस्सों को शांत करार दे सकते हैं ताकि उन स्थानों पर यह क़ानून वैध न हो.’’

एएफपीएसए उन्हीं जगहों पर लागू होता है जो सरकार के अनुसार अशांत क्षेत्र होते हैं. पिल्लइ का कहना था कि अगर क़ानून में बदलाव नहीं हुआ तो कश्मीर के कुछ हिस्सों को शांत घोषित किया जाएगा ताकि यह क़ानून वहां लागू न हो.

एएपीएस में संशोधन का प्रस्ताव इस समय कैबिनेट की सुरक्षा कमिटी के पास है.

गृह सचिव ने इन आशंकाओं को भी खा़रिज़ किया कि कश्मीर घाटी में फिर हिंसा भड़क सकती है. उनका कहना था, ‘‘सर्वदलीय बैठक हुई है. वार्ताकार हैं, जम्मू कश्मीर टास्क फोर्स की रिपोर्ट है, जम्मू लद्दाख टास्क फोर्स की रिपोर्ट है. रोज़गार कमिटी की रिपोर्ट हैं. चीज़ें धीरे धीरे बदल रही हैं. उतनी तेज़ी से नहीं जितनी हम चाहते थे. कुछ लोग हैं जो हर जगह दिखते हैं. हमें कश्मीर के लोगों से मिलना चाहिए और उनसे बात करनी चाहिए.’’

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