विधवाओं का विद्रोह

महिलाएं

राजस्थान में विधवा महिलाओं ने मेंहदी लगाई और खुशियां मनाईं

भारत में आज भी विधवा महिलाएं अभिशप्त जीवन जीने को विवश है. उन्हें मनहूस माना जाता है लेकिन अब परित्यक्त और विधवा औरते संगठित हो रही है.

एकाकी जीवन जी रही इन महिलाओं ने अपना 'एकल नारी शक्ति संगठन' बनाया और अपने हक़ के लिए स्वर मुखरित किए.

बेवाओ के लिए मेहंदी, रंगीन कपड़े और श्रृंगार वर्जित है मगर इन महिलाओं ने सामूहिक तौर पर ऐसे प्रतिबंधो को तोड़ा और हिम्मत के साथ खड़ी हो गईं.

ये एक साथ जयपुर में जमा हुईं. अपनी मुक्ति के गीत गाए, नारे बुलन्द किए और हाथो पर मेहंदी रचाई.

उनके माथे पर मुद्दत बाद बिंदिया उतरी तो ऐसे लगा गोया वो सदियों पुरानी दासता और दमन के विरुद्ध औरत का बयां हो.

पिछले दिनों जयपुर में इन महिलाओ के समागम में विधवा महिलाओं ने एक दूसरे को हौसला दिया और हालात को बदलने का संकल्प लिया.

इनमें झालावाड की कमल पथिक भी थीं.

1982 में पति की मौत हुई तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा.बीस साल तक न बिंदी लगाई और ना मेहँदी.रहने को अब भी कच्ची झोंपड़ी है ,बारिश में सांप आ जाते है.बाजार में निकले तो लोग हमें देख कर रास्ता बदल लेते है,हमें किसी शुभ मौके पर नहीं बुलाया जाता. हमारा कसूर क्या है

गोपी बाई

कमल पथिक को नियति ने दोहरा दर्द दिया. पहले परित्यक्ता का जीवन और फिर वैधव्य! कमल कहने लगीं कि विधवाओं की हालत बहुत दर्दनाक है.

वो कहती हैं, ‘‘पति की मौत होने के बाद छह महीने तक मुंह ढंक कर रखना पड़ता है. रंगीन कपड़े नहीं पहन सकते, रातों रात उनकी जिन्दगी नारकीय हो जाती है. मैं बीस साल से ये ही सब देख रही हूँ. मेरा किसी ने साथ नहीं दिया. अब इस संगठन में आने के बाद हम में हिम्मत आई है.’’

कमल कहती है पहले फब्तियों से डर लगता था. अब सब एक साथ है तो जीवन बेहतर हुआ है.

जिनी श्रीवास्तव पली बढ़ी कनाडा में मगर अब भारत ही उनका घर है.

जिनी पिछले एक दशक से महिलाओ का संबल और सहारा हैं. जिनी कहती हैं कि भारत में कोई पांच करोड़ विधवाएं हैं मगर मुझे दुःख है कि उनकी जीवन दशा में कोई सुधार नहीं आया है.

पति का देहांत हुआ तो ससुराल से निकाल दी गई.फिर अपने दो बच्चों के साथ पीहर आ गई.पिताजी ने हिममत दी मगर भाभी ने घर ने निकाल दिया.अब बमुश्किल गुजर बसर कर रहे हैं.कदम कदम पर हम पर ताने कसे जाते है.ऐसे आयोजन में आकर सुख दुःख बाँट लेते है

कचरी बाई, विधवा महिला

उनका कहना था, ‘‘समाज का नजरिया नहीं बदला है. उन्हें अब भी मनहूस समझा जाता है. उन्हें ससुराल और पीहर दोनों स्थानों में जगह नहीं है. ये ही सोच कर हमने संगठन बनाया क्योंकि एक तनहा औरत का जीवन दुश्वार होता है. सब के एक साथ खड़े होने से सरकार और समाज दोनों पर दबाव बनता है.

चेहरों पर चिपका हुई उदासी का आलम टूटा और इस समागम में नाच गाने हुए. वक़्त की मार से खुरदरे हुए हाथ अरसे बाद मेहंदी से सुर्ख़ हुए.

बांसवाड़ा की कचरी बाई को भी इस समागम ने जीने का हौसला दिया. पति की मौत के बाद कचरी के जीवन में मुकम्मल पतझड़ आ गया था.

वो कहती हैं, ‘‘पति का देहांत हुआ तो ससुराल से निकाल दी गई. फिर अपने दो बच्चों के साथ पीहर आ गई. पिताजी ने हिममत दी मगर भाभी ने घर ने निकाल दिया. अब बमुश्किल गुज़र बसर कर रहे हैं. क़दम क़दम पर हम पर ताने कसे जाते हैं. ऐसे आयोजन में आकर सुख दुःख बाँट लेते है.’’

माथे से सुहाग की लकीर मिटते ही समाज सारी विडंबनाएँ और अनहोनी बेवा के नाम लिख देता है.

उदयपुर के गोगुन्दा की गोपी बाई का गला आपबीती सुनाते सुनाते रुंध जाता है.

वो कहती हैं, ‘‘1982 में पति की मौत हुई तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. बीस साल तक न बिंदी लगाई और ना मेहंदी. रहने को अब भी कच्ची झोंपड़ी है, बारिश में सांप आ जाते है. बाजार में निकले तो लोग हमें देख कर रास्ता बदल लेते है. हमें किसी शुभ मौके पर नहीं बुलाया जाता. हमारा क़सूर क्या है.’’

गोपी बाई कहती है संगठन ने उन्हें ताक़त दी है. वर्ना घुट घुट कर जी रहे थे. कानून ने उसे बराबर का हक़ दिया है. मगर कभी कोई जाति पंचायत उसकी क़िस्मत का फ़ैसला लिखती है. कभी कोई मर्द उसका मुक़द्दर तय करता है. क्योंकि वो औरत है. औरत का कोई देश नहीं होता. उसकी तो देह होती है. पर अब वो हालात के मुकाबिल हौसले से खड़ी है. शायद समाज अब बदलेगा.

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