आधी-अधूरी क्रांतियों का युग

मिस्र में अख़बार इमेज कॉपीरइट BBC World Service

आँखें काहिरा के तहरीर चौक की फोटो देख रहीं थी. लेकिन कानों में इक़बाल बानो की अदभुत आवाज गूँज रही थी.

"हम देखेंगे ... लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है जो लौह-ए-अज़ल में लिखा है"

एक क्षण के लिये मन अटका. जरूर इक़बाल बानो की आवाज़ का जादू रहा होगा कि पहले कभी पलटकर सोचा ही नहीं. क्या वाकई जिस दिन का वादा था वो दिन "लौह-ए-अज़ल" में लिखा है?

क्रांति इस दुनिया का शाश्वत नियम है? काहिरा की 'बेला-चमेली' क्रांति (अंग्रेज़ी में इसे जैस्मीन रेवोल्यूशन कहा जा रहा है) ने यह सवाल पूछने पर मजबूर किया है.

बेशक काहिरा से इस्कंदरिया तक जनता जनार्दन का उभार क्रांति के पुराने सपने को जगाता है.

पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि फैज़ अहमद फैज़ की यह मशहूर ग़ज़ल हमारे उपमहाद्वीप ही नहीं पूरी दुनिया में तानाशाही के ज़ुल्मो-सितम के ख़िलाफ़ लड़ने वालों के लिए प्रेरणा गीत बन चुकी है.

शायद लोकतंत्र की क़ीमत भारत से ज्यादा पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल के लोग समझते हैं, चूंकि उन्होंने तानाशाही झेली है.

होस्नी मुबारक के सत्ता छोड़कर भाग जाने पर काहिरा में किसी न किसी के होंठो पर तो फैज़ के बोल आए होंगे:

"जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गराँ, रुई की तरह उड़ जाएँगे"

मन फिर पहाड़ और रुई के इस रूपक पर अटकता है. कौन नहीं जानता कि मुबारक की तानाशाही के सर पर दुनिया भर को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले अमरीका और उसके यूरोपीय दुमछल्लों का वरदहस्त था.

तानाशाह के रुख़्सत होने पर इसराइल की चिंता और फ़लस्तीनियों का उल्लास मिस्र, इसराइल और अमरीका के हुक्मरानों के नापाक रिश्तों का खुलासा करता है.

अगर आप पिछले दस दिन से तेल के दाम का खेल देख रहे हों तो आप समझ जाएंगे कि धरती के नीचे खनिज होना धरती पर रहने वाले मनुष्यों के लिए श्राप हो सकता है.

आँख की किरकिरी

पहले ट्यनीशिया और फिर मिस्र में जो हुआ उसे पहाड़ के रुई की तरह उड़ जाने की बजाए कठपुतली के धागे कटने की संज्ञा देना बेहतर होगा.

अरब जगत में अमरीका की नाक के बाल होस्नी मुबारक अब उसकी आँख में किरकिरी बन गए थे.

विचार श्रृंखला फिर टूटती है. गज़ल अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई है:

"सब ताज उछाले जाएँगे सब तख़्त गिराए जाएँगे"

ये रिकॉर्डिंग लाहौर की है, उस वक़्त जब पाकिस्तान जिया उल हक़ की तानाशाही तले पिस रहा था. ग़ज़ल के इस मोड़ पर श्रोताओं की भावनाओं का विस्फोट होता है.

इक़बाल बानो की आवाज़ तालियों की गड़गड़ाहट और तानाशाही विरोधी नारों में डूब जाती है. एक क्षण के लिए भय का साम्राज्य ढह जाता है. ठीक वैसे ही जैसे तहरीर चौक पर पर पहले दिन महज़ दो सौ बहादुर लोगों के खड़े होने से हुआ था.

ताज उछलते और तख़्त गिरते देखकर मन फिर फैज़ के कलाम के साथ बह निकलता है:

"जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाए जाएँगे"

लेकिन तभी राजनीति की हकीकत कविता को विराम देती है. ट्यूनीशिया में तख़्त तो पलटा लेकिन मसनद पर बहिष्कृत समाज नहीं बैठा. पुराने सत्ताधीशों का एक और गुट फिर सिंहासन पर काबिज़ हो गया.

मिस्र में अंततः क्या होगा यह नहीं कहा जा सकता. लेकिन फ़िलहाल तो मसनद पर वही बैठे हैं जिनके हाथ में बन्दूक है, जो कल भी बंदूक़ के मालिक थे.

मुबारक भले ही उठा दिए गए हों, सच के मंदिर से झूठ के पुतले उठने की कोई सूरत दिखाई नहीं देती.

अगर क्रांति की चिंगारी जल्द ही बुझ न गई तो यह संभव है कि सत्ता का हस्तांतरण फ़ौज के हाथों से चुनी हुई सरकार के पास आ जाएगा.

लेकिन मिस्र के शासक जिस अंतरराष्ट्रीय निज़ाम के हाथ में मोहरा हैं, वह नहीं बदलेगा. तेल, पूँजी और सत्ता का रिश्ता नहीं टूटेगा.

मेरे मन की भटकन से बेख़बर इक़बाल बानो आगे बढ़ती जा रही थीं:

"और राज करेगी ख़ल्क-ए-ख़ुदा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो"

लेकिन अब फैज़ के कलम से बुना यह सपना हक़ीक़त को और भी मैला किए दे रहा था.

संयोग बना सपना

दिमाग़ आगे जाने की बजाए पीछे मुड़कर देख रहा था. क्रांति के आधुनिक विचार का जन्म 18वी सदी में फ़्रांस की राज्य क्रांति से हुआ. उन्नीसवीं सदी आते आते यह संयोग एक सपना बन गया.

क्रांति सिर्फ़ तख्ता पलट की बजाए सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन का पर्याय बन गई.

बीसवीं सदी में इस सपने को हकीकत के धरातल पर उतारने की अनेक कोशिशे हुईं- रूस, चीन और ईरान की क्रांतियों की चर्चा किए बिना बीसवीं सदी का इतिहास नहीं लिखा जा सकता.

इन क्रांतियों ने राज्य सत्ता और शासक वर्ग का चेहरा बदला, समाज और अर्थनीति में दूरगामी बदलाव किए. लेकिन बीसवीं सदी के ये प्रयोग उन्नीसवीं सदी के सपने से बहुत दूर ही रुक गए.

क्रांतियाँ तो हुईं लेकिन जिन लोगों और जिस विचार के नाम पर ये क्रांतियाँ हुई थीं, वो जल्द ही हाशिए पर चले गए.

इक्कीसवीं सदी आते आते क्रांति का संकल्प थक चुका था, ये हसीन सपना एक चालू मुहावरे में बदल चुका था.

हमारे यहाँ हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की तर्ज़ पर दुनिया भर में नाना किस्म की क्रांतियों की बात चल निकली. एक बार फिर क्रांति शब्द का अर्थ सिमट कर तख़्ता पलट हो गया.

पूर्व सोवियत संघ के देशों में 'मख़मली क्रांति', फिर यूक्रेन में 'नारंगी क्रांति' और अब मिस्र में बेला-चमेली क्रांति. जैसे जैसे क्रांति के विचार पर रंग और रूप मढ़े जाने लगे, वैसे-वैसे क्रांति का विचार फीका और गंधहीन होने लगा.

इक़बाल बानो की आवाज़ थम गई थी. सामने अख़बार पड़ा था. मुखपृष्ठ पर एक आंदोलनकारी की छवि थी जो फ़ौजी अफ़सर को गले लगा रहा था.

अचानक छवि तरल हो गई और एक प्रश्नचिन्ह बनकर तैरने लगी. क्या इक्कीसवीं सदी में क्रांति के विचार का पुनर्जन्म होगा? हम देखेंगे?

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