देवास और एंट्रिक्स का क़रार ख़त्म

सैटेलाइट
Image caption इसरो का कहना है कि क़रार ज़रुर हुआ था लेकिन देवास ने अब तक सैटेलाइट का प्रयोग नहीं किया है

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानि इसरो ने देवास मल्टीमीडिया के साथ हुए विवादित स्पेक्ट्रम समझौते को ख़त्म करने की घोषणा कर दी है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में हुई मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति (सीसीएस) की बैठक में इसरो की व्यावसायिक शाखा एंट्रिक्स और देवास के बीच हुए समझौते को ख़त्म करने का फ़ैसला लिया गया.

सरकार ने कहा है कि सामरिक कारणों से वह यह समझौता ख़त्म कर रही है और इसके लिए वह मुक़दमा झेलने के लिए तैयार है.

देवास मल्टीमीडिया और इसरो की वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स के बीच दुर्लभ 'एस-बैंड स्पेक्ट्रम' के लिए हुए समझौते पर पिछले दिनों मीडिया में कई गंभीर सवाल उठाए गए थे.

मीडिया में इसरो की शाखा एंट्रिक्स और देवास के बीच हुए समझौते से सरकार को दो लाख करोड़ के घाटा होने की ख़बरें आई थीं.

हालांकि भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने दावा किया है कि वर्ष 2005 में एंट्रिक्स और देवास मल्टीमीडिया के बीच हुए क़रार से सरकार को कोई वित्तीय हानि नहीं हुई है.

ग़ौरतलब है कि देवास मल्टीमीडिया को इसरो के एक पूर्व अधिकारी ने शुरू किया था.

इस समझौते में इसरो ने अपने दो उपग्रहों पर स्थित सभी ट्रांसपोंडरों के 90 प्रतिशत अधिकार देवास को देने का क़रार किया था.

ग़लती

मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की बैठक के बाद केंद्रीय क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने पत्रकारों से कहा, "एंट्रिक्स कॉर्पोरेशन और देवास मल्टीमीडिया प्राइवेट लिमिटेड के बीच 28 जनवरी, 2005 में हुए समझौते को ख़त्म करने का फ़ैसला किया गया है."

यह पूछे जाने पर कि क्या समिति की बैठक में इस समझौते को ख़त्म करने के बाद की परिस्थितियों पर भी विचार किया गया, उन्होंने कहा, "हमने पूरे मामले पर विचार किया और इस नतीजे पर पहुँचे कि समझौते के प्रावधानों के तहत और क़ानून के अनुसार हम इसे ख़त्म कर सकते हैं."

इस समझौते के तहत एंट्रिक्स ने 30 करोड़ डॉलर (यानी लगभग 1350 करोड़ रुपए) के बदले अपने दो सैटेलाइट्स के ट्रांसपोंडरों के 90 प्रतिशत अधिकार 12 वर्षों के लिए देवास को दे दिए थे.

बुधवार को ही देवास ने चेतावनी दी थी कि यदि सरकार इस समझौते को ख़त्म करती है तो वह अदालत का दरवाज़ा खटखटाएगी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार देवास की इस चेतावनी पर पूछे गए सवाल के जवाब में क़ानून मंत्री मोइली ने कहा, "यदि वे अदालत जाते भी हैं तो वे नहीं जीत सकते."

जबकि रक्षा मंत्री एके एंटनी ने पत्रकारों से हुई बातचीत में स्वीकार किया है कि बिना सेना से सलाह लिए एस बैंड के लिए एंट्रिक्स और देवास के बीच समझौता एक भूल थी.

उन्होंने कहा कि एस बैंड सामरिक कार्यों के लिए उपयोग में आता है जिस पर सेना के तीनों अंगों का अधिकार है.

इससे पहले बुधवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि यह समझौता कभी लागू नहीं हुआ.

उन्होंने इस बात का खंडन किया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने कभी देवास से चर्चा की है. उनका कहना था कि सरकार इस समझौते को ख़त्म करने जा रही है और इसमें हो रही देर सिर्फ़ प्रक्रिया में हो रही देरी है.

संबंधित समाचार