हंसी के फ़व्वारे

'कॉमिक कॉन'

दुनियाभर में कॉमिक्स के दीवाने हर साल सैन डियागो में मिलते हैं और अपने पसंदीदा कॉमिक किरदारों को क़रीब से जानते समझते हैं.

इस तर्ज पर भारत की राजधानी दिल्ली में भी एक कॉमिक कन्वेंशन, 'कॉमिक कॉन' मनाया गया.

ये मौका था इन नायाब किरदारों को गढ़ने वाले कलाकारों और इन किरदारों के मुरीद हो चुके बच्चे, बूढ़े और नौजवानों को साथ लाने का.

कॉमिक्स उद्योग किस तेज़ी से बदल रहा है और क्या कुछ नया हो रहा है इस अजूबे संसार में आइए देखते हैं.

चाचा चौधरी!

आज भले ही देशी विदेशी कॉमिक किरदारों की भीड़ हो लेकिन एक समय था जब लोटपोट कॉमिक्स के चाचा चौधरी और साबू ही घर-घर में नज़र आते थे.

चाचा चौधरी का शातिर दिमाग़, ज्यूपिटर से आए साबू की ताक़त और बिन्नी चाची का भोलापन बच्चों को वाकई लोटपोट कर देता है. मुहल्ले भर में चाचा चौधरी की धाक है लेकिन वो चाची से डरते हैं.

यहां तक की उनका कुत्ता रॉकेट भी, जो शायद दुनिया का एकमात्र शाकाहारी कुत्ता है!

बुरा न मानो

कॉमिक कॉन में हर तरफ़ मस्ती और हंसी का खेल नज़र आया. एक स्टॉल ऐसा भी था जिसपर रोज़मर्रा ज़िंदगी की चीज़ें एक अलग ही रंग में ढली थीं.

हमने देखा ऐसा मेज़पोश जो दिल्लीवालों की आरामतलबी और दरियादिली पर चुटकी लेता था, चाय के प्याले जिन पर चीनी की मात्रा बताने के लिए बने से थे एक चीनी, दो चीनी और तीन चीनी व्यक्ति.

...और ये कोस्टर जो आम जिंदगी के मुहावरों की रंगबिरंगी भाषा बोलते हैं!

थोड़ी मस्ती

कॉमिक्स के कई दीवाने इस उत्सव में खुद कॉमिक किरदार बन कर आए.

सबसे पहले हम मिले, आंखों पर काली पट्टी चढ़ाए ‘कैटो’ से जो अपने साथी ‘ग्रीन होरनेट’ के बजाय ‘रॉरशॉक’ बने समीर के साथ नज़र आए.

भूरा कोट, भूरा हैट और काली स्याही वाले मुंह ने ‘रॉरशॉक’ को नौजवानों की पहली पसंद बनाया है.

‘अलादीन द सेलर’ के जाफ़र बने धनेष का तो जवाब नहीं. काला लिबास, लाल साफ़ा, मैजिक स्टिक के साथ ये अलादीन का वो दुश्मन है जो उससे उसका चिराग़ और राजकुमारी जेसमिन को छीनना चाहता है.

किरदार भले ही अलग-अलग कहानियों के हों लेकिन फोटो खिंचवाने का शौक सभी को साथ ले आया!

उफ़ ये दीवानगी

बात कॉमिक्स की दीवानगी की हो तो बच्चे ही नहीं बड़े-बूढ़े भी खुद को रोक नहीं पाते.

कॉमिक कॉन में हमारी मुलाक़ात दिल्ली के डेंज़िल डिसूज़ा से हुई जो बचपन से 'फैंटम' के दीवाने हैं.

ली फॉक का बनाया ये किरदार उन्हें इतना भा गया कि उन्होंने फैंटम सीरीज़ कि सभी कॉमिक्स का ख़ज़ाना जुटा लिया.

भारत में फैंटम कि शुरुआत 1964 में हुई और उसके बाद कॉमिक्स ही नहीं इस पर कई टेलीविज़न सीरियल भी बने.

डेंज़िल पेशे से शिक्षक हैं और अपने छात्रों के पसंदीदा टीचर, क्यूंकि पढ़ाई के अलावा बच्चों को फैंटम कि कहानियाँ सुनाना उनका शौक है...

खुद बने कार्टून!

कार्टून में ज़िंदगी के रंग और अपनी ज़िंदगी में कार्टून को ढालने वाले क्षिराज तेलंग चार साल की उम्र से कार्टून बना रहे हैं.

उनके स्टॉल पर पहुंचे तो देखा कि वो खुद अपना ही कार्टून लिए खड़े हैं.

क्षिराज ही नहीं उनकी पत्नी स्वाति और उनका कुत्ता वाकॉम भी अब एक कार्टून सीरीज़ का हिस्सा बन चुके हैं.

क्षिराज की मानें तो कार्टून बनकर रंगबिरंगी ज़िंदगी जीने का मज़ा ही कुछ और है. अगर आप भी कुछ ऐसा करना चाहते हैं तो बेझिझक मिलिए क्षिराज से.

बदलाव के लिए

कॉमिक्स सिर्फ हँसने-हँसाने के लिए हों ये ज़रूरी नहीं. अब इनका एक मकसद लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाना भी है.

‘वर्ल्ड कॉमिक्स इंडिया’ नामक संस्था ने दूर-दराज़ गाँव में कार्टून के ज़रिए बदलाव और जागरूकता की मुहिम शुरु की है.

इस संस्था से जुड़े शोएबल ने बीबीसी को बताया कि किस तरह ‘वर्ल्ड कॉमिक्स इंडिया’ ने इनका इस्तेमाल एक सामाजिक मंच के तौर पर किया है.

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