तीखी बहस के बीच जेपीसी का गठन

Image caption जेपीसी सितंबर तक अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपेगी

लोकसभा में बुधवार को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने विपक्ष के साथ तीखी नोंकझोंक के बीच वर्ष 1998 से लेकर वर्ष 2009 तक चली दूरसंचार नीति की जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन की घोषणा की और इस बारे में प्रस्ताव रखा.

तीस सदस्यों वाली जेपीसी में 20 सदस्य लोकसभा और 10 राज्यसभा से होंगे. इसकी रिपोर्ट सितंबर तक दी जाएगी.

प्रणब मुखर्जी का कहना था, "सांसद होने के नाते ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपना काम करें. ये जेपीसी के गठन के बारे में हमारा अख़्खड़ रवैया नहीं था . हमारा मानना था कि 2जी स्पेक्ट्रम मामले की तह तक पहुँचने के लिए सभी क़दम उठाए जा रहे हैं. ऐसा नहीं कि हम इस मसले को सुलझाना नहीं चाहते थे.

लेकिन संसद के पिछले सत्र कोई भी काम न हो पाने पर कुछ गंभीर टिप्पणियाँ करते हुए प्रणब मुखर्जी ने कहा, "कई राज्यों की विधानसभाओं से भी सत्र सुचारु ढंग से न चलने की ख़बरें आती रहती हैं. जैसे-जैसे कार्यपालिका कमज़ोर होती है, वैसे वैसे कुछ अन्य संस्थाएँ ताकतवर होती जाती हैं. यदि कार्यपालिका और विधायिका को काम नहीं करने दिया जाता तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं. मैं ऐसा नहीं कहता कि भारत के संदर्भ में ऐसी परिस्थिति पैदा हो सकती है लेकिन ये लोकतंत्र के लिए गंभीर स्थिति है."

उधर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने अपने भाषण में सरकार पर तीखे प्रहार किए.

दायरा बढ़ाने का अनुरोध

उन्होंने प्रणब मुखर्जी के उस बयान पर आपत्ति जताई जिसमें उन्होंने विपक्ष के संसद सत्र न चलने पर कहा था कि यदि उन्हें 'संसद में विश्वास नहां तो वे माओवादियों से हाथ मिला लें.'

सुषमा स्वराज ने कहा, "माओवादी केवल बंदूक की भाषा जानते हैं. क्या संयुक्त संसदीय समिति की मांग एक हिंसक मांग है? "

उन्होंने उदाहरण दिया कि जब कांग्रेस विपक्ष में थी तब उसने भी कई दिन सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी थी और संसद के कामकाज का 77 घंटे का नुकसान हुआ था.

सुषमा स्वराज का कहना था, "जिनके अपने घर शीशे के हों उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए. यदि दो तरफ़ जाँच हो रही है तो मंत्री कैसे कह सकते हैं कि शून्य हानि हुई हैं. यदि ऐसा है तो पूर्व मंत्री जेल में क्यों हैं?"

सुषमा स्वराज ने कहा, "क्या सरकार अपने सीने पर हाथ रख कर कह सकती है कि उसने संवैधानिक संस्थाओं को स्वतंत्रता से काम करने दिया है. आपने संसद की अंदेखी की थी. य़दि संसद की सर्वोच्चता मानी गई होती तो ये स्थिति नहीं पैदा होती. आपने तीन बार विपक्षी नेताओं के साथ बैठक की पर सरकार ने कभी नहीं बताया कि जेपीसी क्यों नहीं होनी चाहिए."

भारत में स्थिति का ज़िक्र करते हुए उन्होंने दावा किया, "आज पूरे देश में लोकतंत्र के चारों स्तंभ लड़खड़ा रहे हैं. विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और प्रेस. राडिया टेप्स ने दिखाया है कि उद्योग जगत ने हमारे पूरे सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप किया है. ज़रूरी है कि जेपीसी में सभी एक साथ बैठक कर चिंतन करें, ये केवल दोषारोपण के लिए नहीं है."

सरकार पर तीखे प्रहार करते हुए सुषमा स्वराज का कहना था, "गठबंधन सरकार की मजबूरी राजनीतिक मुद्दों पर हो सकती है जैसे धारा 370 पर, लेकिन गठबंधन धर्म की आड़ बेईमानी को ढकने के लिए नहीं ली जा सकती है. देश को बहुत आशाएँ है इस जेपीसी से....परिस्थिति जटिल ही नहीं, विकट है. देश का आत्मबल कमज़ोर हो रहा है. ये समिति केवल 2जी स्पेक्ट्रम के लिए नहीं है बल्कि पूरे विश्लेषण, आत्म मंथन के लिए बनी है."

सिब्बल के कथन पर बवाल

उधर कांग्रेस के मंत्री कपिल सिब्बल ने तेहलका कांड का ज़िक्र किया और आरोप लगाया कि जब रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस की ओर से किसी आरवी पंडित के ज़रिए सीएजी के ख़िलाफ़ पेमफ़्लेट निकाला गया तो वह भी देश की संवैधानिक संस्था पर प्रहार था. उन्होंने ये भी कहा कि जब बेस्ट बेकरी केस में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि भाजपा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हिंदू विरोध मानती है और ये भी संवैधानिक संस्था पर प्रहार था.

कई बार कपिल सिब्बल के कथनों पर उनके और विपक्षी सासंदों के बीच तीखी बहस हुई.

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