'रेलवे को गधे की तरह लादा जा रहा है'

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रेलवे बजट पर रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अशोक भटनागर की राय:

मेरा मानना है कि रेलवे की दृष्टि से ये बेहद निराशाजनक बजट है, रेलवे की त्रृटियों की ओर इसमें कोई ध्यान नहीं दिया गया है.

बजट में रेलवे की कार्यप्रणाली की समीक्षा की जाती है लेकिन इस बजट में ऐसा कुछ नहीं हुआ.

रेलवे में जो कमियाँ हैं, उनके निराकरण के संबंध में कोई बात नहीं हुई है.

मैं एक उदाहरण देता हूँ कि पिछले साल माल की ढुलाई का लक्ष्य था तीन करोड़ 70 लाख टन लेकिन 31 जनवरी तक रेलवे दो करोड़ 50 लाख टन माल की ढुलाई कर पाया.

इस लक्ष्य में इतनी भारी कमी क्यों आई, इसकी कोई समीक्षा नहीं हुई.

दरअसल रेलवे की जो परियोजनाएँ होती हैं, वे लंबी अवधि की होती हैं.

यदि उनकी नींव आज नहीं पड़ी तो उनका फल पाँच साल बाद नहीं मिलेगा, उस पर रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कुछ नहीं कहा.

जहाँ तक किराये और माल भाड़े में वृद्धि न करने की बात है तो वो यात्री की दृष्टि से तो ठीक है लेकिन रेलवे की दृष्टि से नहीं क्योंकी आपके खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं.

रेल मंत्री महोदया ने भी माना है कि उन्होंने वित्त मंत्री से 42 हज़ार करोड़ रुपए मांगे थे लेकिन मिले लगभग 20 हज़ार करोड़ रुपए, इससे सवाल उठता है कि रेलवे को धन की आवश्यकता क्यों पड़ी.

मेरा मानना है कि रेलवे को गधे की तरह लादा जा रहा है और एक दिन ये गधा बैठ जाएगा.

मेरा मानना है कि रेलवे की दृष्टि से इस रेल बजट में कोई सकारात्मक बात नहीं है.

यात्री और माल भाड़े में कोई वृद्धि नहीं की गई है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि रेलवे की परियोजनाओं के लिए धन कहां से आएगा.

( रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अशोक भटनागर से बीबीसी संवाददाता आशुतोष चतुर्वेदी ने बातचीत की)

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