फ़ैज़ में जितना प्रेम उतनी क्रांति भी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बहुत से लोग सोचते हैं कि बँटवारे के बाद फ़ैज़ पाकिस्तान चले गए. अगर देखें तो सच यह है कि वे तो थे ही पाकिस्तान के. लाहौर के. विभाजन के बाद दरअसल लाहौर पाकिस्तान में चला गया.

कलाओं और संस्कृतियों के बारे में जो बात है और यह बात भारत के बारे में भी अच्छी और गर्व करने लायक है कि राजनीतिक विभाजन भले ही हो जाए, कला और संस्कृति का विभाजन नहीं होता. रहमत अली, रेशमा, ग़ुलाम अली से लेकर नूरजहाँ तक सब हमें अपने लगते हैं जैसे लता मंगेशकर उन्हें उतनी ही अपनी लगती हैं.ये बात सिर्फ़ पाकिस्तान के साथ नहीं है. बांग्लादेश के साथ भी है. रवीन्द्रनाथ दुनिया के अकेले ऐसे कवि हैं जिन्होंने दो देशों के राष्ट्रगान लिखे हों.

अगर आज फ़ैज़ हमें प्रासंगिक लगते हैं तो इसका श्रेय भारत की संस्कृति को जाता है और लोगों को जाता है जिन्होंने राजनीतिक विखंडन को सांस्कृतिक विखंडन नहीं बनने दिया. मुझे याद आता है कि जब महात्मा गांधी की हत्या हुई थी तो फ़ैज़ चार्टर्ड विमान से दिल्ली आए थे और लौटकर उन्होंने अपने अख़बार के लिए विशेष संपादकीय लिखा था.

फिर एक बड़ा कारण फ़ैज़ की शख़्सियत भी थी. उनका संबंध प्रगतिशील धारा से था इसलिए उन्हें भारत ने कभी पाकिस्तान का शायर माना ही नहीं. मुझे याद आता है कि भोपाल में एक कार्यक्रम हुआ था, जश्न-ए-फ़ैज़ और उसमें शिवमंगल सिंह सुमन ने कहा था कि जो (सांप्रदायिक) लोग सब कुछ को ले जाना चाहते हैं वो ले जाएँ लेकिन वो फ़ैज़ को नहीं ले जा सकेंगे.

ऐसी शख़्सियत और ऐसे शायर को कौन खोना चाहेगा?

प्रेम और क्रांति साथ-साथ

ये बात सही है कि फ़ैज़ की रचना में जितना प्रेम दिखता है उतनी ही क्रांति भी है, विद्रोह भी है.

मुझे लगता है कि रचनाधर्मिता की एक दुनिया होती है. उसका शायद अपना एक व्याकरण होता है. जो बात एक पाठक के तौर पर कठिन दिखती है वह बात रचनाकार के लिए शायद उतनी कठिन नहीं होती. रवीन्द्रनाथ, निराला, नजरुल, तमिल कवि श्रीश्री से लेकर दिनकर तक ये बात साफ़ दिखाई देती है कि जो कवि जितना क्रांतिकारी है, उसने प्रेम की कविता भी उतनी ही अच्छी लिखी है. नज़रुल इसका उदाहरण हैं. निराला एक समय 'बादल राग' लिख रहे थे तो 'प्रिय यामिनी...' भी उन्होंने ही लिखी. दिनकर ने भी आख़िर-आख़िर में 'उर्वशी' लिखी.

आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने एक शब्द दिया है, महाराग. ये महाराग देश और समाज के लिए भी फूटता है और अपने लिए भी. जब यह बाह्यमुखी होता है तो क्रांति और समाज की बात करता है और जब अंतर्मुखी हो जाता है तो प्रेम और श्रृंगार की बात करता है. लेकिन इस दृष्टि से फ़ैज़ उर्दू के सबसे उल्लेखनीय कवि हैं. वो प्रेम और क्रांति दोनों के महान कवि हैं. प्रेम और क्रांति की कविताओं में उनके जो प्रतीक हैं वो ऐसे हैं कि आप जब चाहें उनकी अदला-बदली कर सकते हैं.

जब वे 'मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरे महबूब न मांग' लिखते हैं तो लगता है कि इसमें एक विरोधाभास सा है. और जब वे 'कुए यार से चले सूए दार को चले' लिखते हैं तो लगता है कि ऐसा वे ही लिख सकते थे.

फ़ैज़ की एक नज़्म है 'रक़ीब से'. फ़िराक़ ने अपने एक लेख में लिखा है कि यह नज़्म ऐसी है कि इससे मेरे दिल का चोर निकलता है. वे कहते हैं कि ये चोर यह है कि काश ये नज़्म मैं लिखता. उस नज़्म में रक़ीब का पूरा तसव्वुर ही फ़ैज़ ने बदल दिया. आमतौर पर रक़ीब दुश्मन की तरह देखा जाता है लेकिन फ़ैज़ ने रक़ीब को इतना विस्तार दिया कि जो बात उसे समझाई जा सकती है वो किसी और को समझाई नहीं जा सकती, 'जुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूं'.

लेकिन प्रेम और क्रांति के अलावा मुझे लगता है कि निराशा की जो अभिव्यक्ति जो अपनी ग़ज़लों में की हैं वो बिलकुल अलग हैं.

करो कच कुलाह सरे कफ़न मेरे क़ातिलों को गुमाँ न हो कि ग़ुरुर इश्क का बाँकपन पशे मर्ग हमने भुला दिया

निराशा के गीत नवीन ने गाए थे, 'आज खड्ग की धार कुंठता, आज रक्त तुणीर हुआ...' जब ऐसा लगने लगा था कि आंदोलन असफल हो गई. इसी तरह जब दुनिया में कम्युनिस्ट क्रांति असफल होती दिखी तो फ़ैज़ ने कुछ बहुत अच्छी नज़्में लिखी हैं.

प्रासंगिकता

ये अहम सवाल है कि क्या आने वाले समय में भी फ़ैज़ उतने ही प्रासंगिक बने रहेंगे जितने वे आज हैं. मै चाहता तो इस सवाल का आसान सा जवाब दे सकता था कि हाँ वे प्रासंगिक बने रहेंगे लेकिन लेकिन हमारे देश में जो वातारवण है, जो ख़तरे हैं, उनको नज़र अंदाज़ भी नहीं किया जाना चाहिए.

जिस संस्कृति ने फ़ैज़ को अलग नहीं होने दिया, ग़ालिब को अपना बनाए रखा, उस संस्कृति के विरोधी लोग भी यहाँ मौजूद हैं.

अब राजनीति और संस्कृति अलग-अलग चीज़ें हो गई हैं. बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि आने वाले समय में हमारे देश की राजनीतिक कैसी होगी.

इन सबका असर पड़ सकता है. लेकिन मैं ऐसे किसी भविष्य की कल्पना भी नहीं कर पाता जिसमें फ़ैज़ के प्रेमी इस देश में नहीं रह जाएँगे.

संबंधित समाचार