'केदारनाथ का प्रेम कुछ अलग है'

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केदारनाथ अग्रवाल हिन्दी की प्रगतिशील काव्य-धारा के पुरोधा कवि हैं. उनकी कविताओं में प्रगतिशील आंदोलन की शुरूआत से पहले ही भाषा और विषय दोनों ही मोर्चों पर दलितों, वंचितों और उपेक्षितों को भावबोध के स्तर पर तरजीह मिलने लगी थी. आगे चलकर जब उनका सम्पर्क मार्क्सवाद से हुआ तो इस भावबोध को एक ठोस दार्शनिक आधार और दिशा मिली. लेनिन का 'संज्ञान का सिद्धान्त' (Theory of Cognition) उनकी कविता का पाथेय बना.

कविता के बारे में उनकी पुष्ट धारणा बनी कि संज्ञान की कलात्मक अभिव्यक्ति ही कविता है.

केदारनाथ अग्रवाल की कविता का मुख्य भाव प्रेम है. लेकिन यह प्रेम सामान्य अर्थों वाला, प्रेमी - प्रेमिका, पति-पत्नी, या वात्सल्य भाव तक सीमित प्रेम नहीं है. यह एक ऐसा प्रेम है जिसमें पूरी सृष्टि समाई हुई है. प्रकृति, मनुष्य, पशु, पक्षी, नदी, नाला, पोखर, पहाड़, खेत-खलिहान, बाग़-बगीचे आदि सभी उनके प्रेम के पात्र हैं.

प्रेम के साथ ही रचनात्मक, सकारात्मक और बेहतर बदलाव के अर्थ में यदि क्रांति को लें, तो श्रम और संघर्ष पुष्ट क्रांति भी उनकी कविता में बड़ी शिद्‌दत के साथ मौजूद है. बकौल डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी क्रांति बिना प्रेम के संभव नहीं है.

पाब्लो नेरूदा इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. इसीलिए यह आकस्मिक नहीं है कि सभी विदेशी कवियों में पाब्लो नेरूदा केदारजी के सबसे प्रिय कवि हैं.

केदारजी ने कई विदेशी कवियों की कविताओं के अनुवाद किए हैं पर सबसे अधिक 30 कविताओं के अनुवाद पाब्लो नेरुदा की कविताओं के हैं.

केदारजी का प्रेम संवेदनशील और कर्तव्य बोध से आप्लावित, श्रमशील और ज़िम्मेदार प्रेम है - 'गया ब्याह में युवती लाने, प्रेम ब्याह कर संग में लाया.' प्रेम को वह 'ब्याह' कर लाते हैं. हमारे यहां ब्याह में दोनों पक्ष एक दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारी की वचन-बद्धता दोहराते हैं.

उनका प्रेम केवल काम प्रेरित और दैहिक आकर्षण-बद्ध प्रेम नहीं है - है यह भी, पर बहुलता पूरी कायनात को समेटने वाले इसके पार वाले प्रेम की ही है, मनुष्यता के प्रेम की है - 'मैं उसे खोजता हूं / जो आदमी है /और अब भी आदमी है/ तबाह होकर भी आदमी है/ चरित्र पर खड़ा / देवदारू की तरह बड़ा.'

यह प्रेम का ही उदात्तीकरण है कि उनकी कविता के दलितों, वंचितों में जहां एक ओर कहीं-कहीं एक ओर बेबसी है, लाचारी है, अवसाद है, वहीं दूसरी ओर अधिकांशतः श्रम और संघर्ष का दर्प तथा स्वाभिमान का सूर्य ही दमकता है.

यदि हम प्रेम का सीमित अर्थ लें तो उनके समकालीनों - नागार्जुन और शमशेर की प्रेम कविताओं की अपनी-अपनी ख़ासियतें हैं.

केदारजी का प्रेम गहन ऐंद्रिकता से पुष्ट, तृप्त, दायित्वशील, यथार्थ और सघन प्रेम है. मार्क्सवादी दर्शन से लैस उनका प्रेम, भाव से रूपांतरित होकर चेतना बन जाता है.

पत्नी की मृत्यु के उपरांत लिखी उनकी दर्जनों कविताएं इसकी साक्षी हैं. प्रेम की यह उदात्त चेतना ही, पत्नी की चिता की लपटों में 'कुबलय कुमुद खिला' देखती है - 'चिता जली/ तो मैंने देखा/दहन दाह में / कंचनवर्णी पंखुरियों का/ कुबलय कुमुद खिला/ रज को/राग पराग मिला.'

नागार्जुन का प्रेम ऐंद्रिकता से पुष्ट तो है, यथार्थ और सघन भी है पर मन के किसी दबे छुपे कोने में कहीं कहीं अतृप्ति भी छिपी हुई है. शमशेर जी का प्रेम अतृप्त प्रेम है और कल्पना का भव्य शिखर है.

प्रतिबद्ध मार्क्सवादी

केदारनाथ अग्रवाल मृत्यु पर्यंत मार्क्सवाद को समर्पित रहे - पूरी आस्था और निष्ठा के साथ जबकि बाकी दोनों साथी कवियों में विचलन की प्रवृत्ति दिखाई देती है.

केदारनाथ अग्रवाल यथार्थ के कवि हैं इसीलिए उनकी कविताएं अपने समय का दस्तावेज़ हैं. पर वह जितना अपने समय की तात्कालिकता को समेटती हैं उतनी ही अपने समय की सीमा को फलांग कर कालजयी भी बनती हैं.

उनकी कविताएं स्थानीयता से लबरेज हैं पर स्थानीय नहीं हैं. वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हैं. स्थानीयता उन्हें प्रामाणिक बनाती है. आज से 50-60 साल पहले लिखी उनकी तात्कालिक संदर्भों की कविताएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि उस समय थीं.

जब तक संसार में शोषण, दमन, अनाचार, हिंसा, युद्ध, साम्राज्यवाद आदि मनुष्य और मनुष्यता विरोधी शक्तियां कायम रहेंगी, उनके विरूद्ध चेतना फैलाने वाली और संघर्ष करने वाली केदारजी की कविताएं प्रासंगिक रहेंगी ही रहेंगी.

उनकी कविताएं कालजयी हैं क्योंकि वे 'मृत्यु पर जीवन के जय की घोषणा', 'अनास्था पर लिखे आस्था के शिलालेख' तथा 'संगमरमर के भीतर जल रहे दिये' की मानिंद प्रकाश की कविताएं हैं.

केदार जी की कविता धूप की, हवा की, बादल की, नदी की, धरती की, श्रम के सौंदर्य की, किसानों-मजदूरों की तथा प्रतिरोध की कविताएं हैं. जब तक इनका अस्तित्व है, केदारजी की कविताएं रहेंगी और खुदा-न-खास्ता यदि इनका भौतिक अस्तित्व न भी रहा, तो भी केदारजी की कविताओं में तो ये जिंदा रहेंगे ही क्योंकि कला या कविता का एक काम मर्त्य को अमर्त्य बनाना भी है.

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