होली की सुरीली महफ़िलें

Image caption पीढियों से चली आ रही होली गाने की परंपरा अब कुछ सिमटती नज़र आ रही है.

होली का त्योहार आने में अभी कुछ हफ्ते बाकी हैं लेकिन उत्तराखंड के कुमांऊ मंडल में होली की सुरीली महफ़िलें जमने लगी हैं.

अलमोडा-नैनीताल के इलाकों में होली का मतलब हुडदंग नहीं राग-रागिनियों के सुर हैं.

अगर ब्रज की होली रास-रंग के लिये मशहूर है और बरसाने की लठमार होली प्रसिद्ध है तो इन सबसे अलग कुमांऊ में होली गाने की अनूठी परंपरा है.

बसंत पंचमी के साथ ही घरों में होली की बैठकें आयोजित होने लगती हैं जिसमें लोकगीत,खमाज और ठुमरी शैली में होली के गीत गाए जाते हैं.

साथ ही फागुन महीने की एकादशी के दिन से खड़ी होली का सिलसिला शुरू हो जाता है. घर की बैठक या छत पर हारमोनियम, ढोल, तबले और मंजीरे के साथ लोग बैठ जाते हैं.

आंचलिक असर

आमतौर पर महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर आती हैं. अबीर और गुलाल का टीका लगाया जाता है और महफिल जम जाती है.

ऐसे कुछ गीतों में कुमाऊंनी संस्कृति का आंचलिक असर प्रमुखता से दिखता है-

“उडिगो छो अबीर-गुलाल हिमाला डन लाल भयो, केसर रंग की बहार-हिमाला डन लाल भयोया फिर “बांज बुरांश का कुमकुम मारों, डाना कान रंग दे बसंती नारंगी, पार्वती ज्यूं की झिलमिल चादर...”

कुछ महफ़िलों में नज़ीर जैसे शायरों के क़लाम भी सुनाई पड़ते हैं- “जब फागुन रंग झमकते हों, तो देख बहारें होली की……”

ये भी कम दिलचस्प नहीं कि होली की इन बैठकों के शुरू में इन पंक्तियों के साथ गणेश की स्तुति की जाती है-

“तुम विघ्न हरो महाराज होली के दिन में....”

होली गायन की परंपरा

और जब ये बैठकें खत्म होती हैं तो आर्शीवाद के बोल गाए जाते हैं और उर्दू में लिखी इस ठुमरी के साथ बैठक का समापन होता है- “मुबारक हो मंजरी फूलों भरी, ऐसी होली खेले जनाब अली..... ”

कुमांऊ में होली गायन की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई इसका कोई ऐतिहासिक लेखा-जोखा नहीं है.

जानकार मानते हैं कि इस पर ब्रज और उर्दू का प्रभाव है और मुगलों, राजे-रजवाड़ों के मेल-मिलाप से ये परंपरा बनी.

ब्रज में गाई जानेवाली मुख्य होली है- ‘’चंद्रबदन खोलो द्वार, कि हर मनमोहन ठाडे...."

होली गायकी को लोकप्रिय बनाने में नैनीताल के जनकवि स्वर्गीय गिर्दा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा. नैनीताल के रंगकर्मी ज़हूर आलम यहां प्रचलित होली के तीन भेद बताते हैं.

नई पीढ़ी का रूझान

वो कहते हैं, “बैठ होली बैठकों में शास्त्रीय ढंग से गाई जाती है, तो खड़ी होली में ढोल-नगाड़ा होता है और पूरा समूह झोंक के साथ नाचता है. महिला होली इन दोनों का मिला-जुला स्वरूप है. उसमें स्वांग भी है, ठुनक-मुनक भी है और गंभीर अभिव्यक्तियां भी हैं.”

लेकिन सबसे ज्यादा जो दिखता है वो है देवर भाभी का मज़ाक. “मेरो रंगीलो देवर घर ऐरों छो, कैं होणी साडी कैं होणी जंफर, मी होणी टीका लैंरो छो, मेरो रंगीलो देवर .....”

हांलाकि पीढियों से चली आ रही होली गाने की परंपरा अब कुछ सिमटती नज़र आ रही है.

होली की बैठकों की आयोजक माया पंत कहती हैं, “ये तो अपने परिवार की बात है जहां हमलोग गा रहे हैं वहां बच्चे सुन रहे हैं लेकिन कई परिवारों ने इसे छोड़ दिया है और नई पीढ़ी का इस ओर रूझान कम ही है.”

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