बिरादरी से बाहर शादियों से चिंतित हैं पारसी

Image caption समुदाय से बाहर शादी करने वाले लड़कों की संख्या लड़कियों से ज़्यादा है.

घटती संख्या से जूझ रहे पारसी समुदाय की चिंता जैसे और गहरा गई है.

समुदाय की एक पत्रिका ‘पारसियाना’ में छपे आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2010 में मुंबई में पंजीकृत शादियों में से 38 प्रतिशत शादियों में पारसी लड़के या लड़की ने समुदाय से बाहर शादी की.

समुदाय से बाहर शादी करने वाले लड़कों की संख्या लड़कियों से ज़्यादा है. इसका कारण समुदाय में शादी के लायक लड़कियों की तादाद कम होना बताया जाता है.

‘पारसियाना’ के संपादक जहांगीर पटेल कहते हैं, ‘एक अनुमान के मुताबिक पिछले 12 सालों में ये आंकड़ा करीब 31 प्रतिशत के आसपास था, लेकिन इसका 38 प्रतिशत तक पहुँच जाना चिंता की बात है. समुदाय से बाहर जाकर शादी करने की ओर झुकाव बढ़ रहा है.’

जहाँगीर के मुताबिक जहाँ समुदाय के कुछ लोग इन आंकड़ों को नकार रहे हैं, कुछ चिंता भी व्यक्त कर रहे हैं.

वर्ष 2001 के आंकड़ों के मुताबिक देश में पारसियों की जनसंख्या मात्र 69,600 के आसपास थी, जिसमें से मुंबई में करीब 46,000 पारसी रहते थे.

पारसी समुदाय में लोगों को अपने ही समुदाय में शादी करने के लिए प्रेरित किया जाता है, लेकिन लोग अब बड़ी संख्या में समुदाय से बाहर जाकर शादी कर रहे हैं.

समुदाय से बाहर शादी

इसके कारण कई हैं. पटेल के मुताबिक समुदाय में हर साल मात्र 200 नए बच्चों का जन्म होता है, जिस वजह से अपने पसंद का जीवनसाथ ढ़ूंढना आसान नहीं होता.

जहाँ माता­-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे समुदाय में ही शादी करें, कई बार लोगों को समुदाय के भीतर मनपसंद जीवनसाथी नहीं मिल पाता. जहाँगीर पटेल के मुताबिक इस कारण समुदाय में करीब 20 प्रतिशत लोग ज़िंदगी भर कुँवारे ही रह जाते हैं.

जहाँगीर पटेल बताते हैं, ‘मान लीजिए अगर दक्षिणी मुंबई में रहने वाली, अच्छा कमाने वाली किसी लड़की की रुचि संगीत, कला में हो, तो वो ऐसा ही साथी ढूंढेगी जिसकी रुचि भी मिलती जुलती हो, लेकिन जब आपके समुदाय की संख्या बेहद कम हो, तो पसंद का साथी मिलना मुश्किल हो जाता है. फ़ेसबुक और ट्विटर के ज़माने में दूसरे समुदाय के लोग आपसे टकरा ही जाते हैं..’

'स्पीड डेटिंग'

जनसंख्या बढ़ाने के लिए पारसी समुदाय कई तरह से कोशिशें कर रहे हैं, जिनमें 'स्पीड डेटिंग' शामिल है. समुदाय ने फ़र्टिलिटी प्रोजेक्ट का भी सहारा लिया जिससे अभी तक 500 से ज़्यादा दंपत्ति फ़ायदा उठा चुके हैं. लेकिन इन सभी कदमों का बहुत असर होता नहीं दिख रहा है.

सवाल यह भी है कि समुदाय से बाहर शादी करने के अनुभव कैसे रहे हैं?

जहाँगीर पटेल कहते हैं, ‘पिछले 30 सालों से पारसी जोड़ों में तलाक़ का औसत 10 या 11 प्रतिशत के आसपास है. मुझे लगता है कि समुदाय के बाहर हो रही शादियों के मामले में इतनी सावधानी बरती जाती है कि ऐसी शादियों में ज़्यादा समस्या नहीं होती. लेकिन शादी के बाद ग़ैर-पारसी के साथ भेदभाव बरता जाता है. उन्हें फ़ायर-टेंपल जाने की इजाज़त नहीं होती. वो किसी पारसी के अंत्येष्टि में हिस्सा नहीं ले सकते. लेकिन इसके बावजूद ऐसी शादियाँ होती हैं क्योंकि उस वक्त सोच होती है कि जो होगा, देख लेंगे.’

27 वर्षीय अर्नवाज़ संजना ने समुदाय के भीतर ही शादी की और वो युवाओं के एक समूह ‘ज़ोरास्ट्रिय यूथ फ़ॉर द नेक्स्ट जेनरेशन’ की सदस्य हैं.

मनपसंद साथी

वो कहती हैं, ‘मैने कभी समुदाय से बाहर शादी करने का नहीं सोचा था, क्योंकि मै नहीं चाहती कि हमारी संख्या कम हो. गैर-पारिसयों पर लगे कुछ प्रतिबंधों की वजह से शादी के बाद उनमें धर्म के प्रति घृणा उत्पन्न होती है.’

पारसी समुदाय की बाप्सी की शादी शरद दोशी से 36 साल पहले हुई और उनकी दोनों लड़कियों की शादी पारसी समुदाय में हुई है. वो बताती हैं कि उनकी शादी को लेकर शुरुआत में परिवारों में परेशानियाँ हुई थीं, लेकिन बाद में सब ठीक हो गया.

वो कहती हैं, ‘’ये परिवार पर निर्भर करता है कि वहाँ ऐसी शादियों को किस तरह स्वीकार किया जाता है. ‘’

उधर दिल्ली की एक बीपीओ काम करने वाले पारसी समुदाय के आदिल नारगोलवाला ने 20 साल पहले दार्जिलिंग की एक बौद्ध लड़की से शादी की. वो समुदाय के भीतर ही शादी करने की बात से बेहद नाराज़ हैं.

वो कहते हैं, ‘जो कहते हैं कि पारसियों को अपने समुदाय में ही शादी करनी चाहिए वो बेवकूफ़ हैं. उनको पता नहीं वो क्या बात कर रहे हैं. मैने समुदाय से बाहर शादी की, लेकिन मेरे बच्चे पारसी हैं. हम जिस तरह से हैं, खुश हैं. अगर हम इस बात पर कायम रहे कि हम समुदाय के भीतर ही शादी करें, तो हमारी संख्या ज़रूर कम होगी. जब हमारे पैगंबर ने लोगों को अपने धर्म में परिवर्तन करवाया, तो फिर ये लोग कौन हैं जो कहते हैं कि हमें ये करना चाहिए, ये नहीं करना चाहिए. ये सब बकवास है.’

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