परिवारजनों का इंतज़ार करते दो शव

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Image caption गाँव वाले परिवार को अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दे रहे हैं

उनके रिश्ते को जीते-जी समाज से मान्यता नहीं मिली. दोनों को बार-बार एक-दूसरे से नहीं मिलने की चेतावनी दी गई. आखिर में जब समाज की बेड़ियों से तंग आकर उन दोनों ने आत्महत्या कर ली तब भी उनको अभिशाप से मुक्ति नहीं मिली.

मरने के बाद समाज ने उनसे मुंह मोड़ लिया है और उनका अंतिम संस्कार तक करने को तैयार नहीं है. नतीजतन उनके शव बीते दस दिनों से एक अस्पताल के शवगृह में अपनों का इंतजार कर रहे हैं.

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम इलाके के सोनाचूड़ा गांव की रहने वाली इन दोनों युवतियों- 23 वर्षीया स्वपना मंडल और 19 साल की सुचेता मंडल का एकमात्र क़सूर यह था कि वे समलैंगिक थीं.

माँ ने अपनाया

स्वपना की मां ने तो दोनों चचेरी बहनों के इस रिश्ते को मंजूरी दे दी थी, लेकिन पूरा गांव इसके खिलाफ था. गांव वालों की प्रताड़ना से आजिज़ आकर दोनों ने अपनी जान दे दी.

अब पूर्व मेदिनीपुर जिला मुख्यालय तमलुक के एक सरकारी अस्पताल में दस दिनों से उनके शव परिजनों के इंतजार में हैं.

पुलिस ने अब यह उम्मीद छोड़ दी है कि कोई अंतिम संस्कार के लिए उन शवों को ले जाएगा. पुलिस और अस्पताल प्रबंधन कुछ दिनों तक इंतजार के बाद दोनों के शवों को लावारिस की तरह जला देगा.

स्वपना और सुचेता के बीच इस समलैंगिक रिश्ते की शुरूआत कुछ साल पहले उस समय हुई जब सुचेता स्वपना के पास पढ़ने जाती थी. बाद में इसका पता चलने पर गांव वालों ने कड़ा विरोध किया और पंचायत के फैसले के बाद सुचेता की शादी कहीं और कर दी गई.

दोनों बहनों के मिलने-जुलने पर भी पाबंदी लगा दी गई. इस रिश्ते के लिए उम्र में बड़ी स्वपना को दोषी मानते हुए लोगों और रिश्तेदारों ने उसका सामाजिक बायकाट कर दिया था.

साथ-साथ जान दी

लेकिन शादी के एक महीने बाद 19 फरवरी को सुचेता जब मायके लौटी तो दोनों लड़कियाँ चुपके से खेतों की ओर निकल गईं. अगले दिन दोनों के शव बरामद किए गए. दोनों के शव एक तौलिए के सहारे कमर से बंधे हुए थे. उन्होंने ज़हर खाकर जान दे दी थी.

मौक़े से स्वपना के हाथों लिखा पांच पेज का एक सुसाइड नोट भी बरामद किया गया. उसमें लिखा था, "आप लोग मुझसे नाराज मत होना. मैं अपने प्यार के बिना जीवित नहीं रह सकती".

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Image caption स्वपना की माँ अपनी बेटी की मौत से दुखी हैं

लड़कियों की दादी चंपा मंडल कहती है, "हमने दोनों को कई बार इस अप्राकृतिक रिश्ते से दूर रहने की चेतवानी दी थी. लेकिन किसी ने हमारी बात नहीं सुनी. अब उनके शवों से हमारा कोई लेना-देना नहीं है".

उनके चाचा सुकुमार मंडल सवाल करते हैं, "अब उन सड़े-गले शवों को गांव में लाने से क्या फायदा? पुलिस जैसे चाहे उनका अंतिम संस्कार कर सकती है".

वे कहते हैं, "हम सुचेता को एक बेहतर जिंदगी देना चाहते थे. लेकिन उसने अपने लिए मौत चुन ली".

दूसरी ओर, स्वपना की मां चंपा मंडल कहती हैं, "मेरी बेटी को सुचेता से बेहद प्यार था. लेकिन मुझे दुख है कि मैं उसका अंतिम संस्कार तक नहीं कर सकती".

गांव के पंचायत प्रधान कालीकृष्ण प्रधान कहते हैं, "पंचायत अंतिम संस्कार का खर्च देने के लिए तैयार है. लेकिन जब गांव वाले ही इसके लिए तैयार नहीं हैं तो हम क्या कर सकते हैं?"

नंदीग्राम थाने के सब-इंस्पेक्टर अनिमेष चक्रवर्ती कहते हैं कि वह दोनों युवतियों की माताओं से अस्पताल जाकर शवों को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने का अनुरोध कर चुके हैं.

स्वपना की मां तो परेशान हैं लेकिन सुचेता की मां को इसकी कोई फिक्र नहीं है.

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