'इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी'

इरोम शर्मिला
Image caption इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल पर कई बार मीडिया का ध्यान गया है

भारत के गृहसचिव जी के पिल्लै ने बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में कहा है कि मणिपुर की आंदोलनकारी इरोम शर्मिला की एक दशक से भी ज़्यादा समय से चल रही भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण है.

जी के पिल्ले ने कहा कि केवल इरोम शर्मिला ही नहीं बल्कि देश का कोई भी नागरिक अगर सरकार की किसी नीति के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर जाता है तो ये सरकार के लिए शर्मनाक बात है. जिस घटना के कारण इरोम शर्मिला ने ये असाधारण क़दम उठाया है वो अफसोसनाक है और हमे इससे ये सीखना है कि ऐसी घटनाएं न हो.

ये सरकार के लिए एक सबक़ है.

सशस्त्रबल विशेषाधिकार क़ानून

भारत के पूर्वोत्तर में पचास के दशक से चले आ रहे कई पृथक्तावादी आंदोलनों की चुनौती से निपटने के लिए उस इलाक़े में सरकार ने सशस्त्रबल विशेषाधिकार क़ानून लागू किया है जिसके तहत सेना की कार्रवाई किसी भी क़ानूनी जांच परख के परे है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दावा है कि सुरक्षा बल इस क़ानून का फ़ायदा उठाकर आम बेगुनाहों को निशाना बनाती है. इस विशेष क़ानून पर लगे इन आरोपों की जांच के लिए सरकार ने जीवनरेड्डी समिति गठित की थी जिसकी रिपोर्ट में इस क़ानून को हटा देने की सिफारिश की गई है. इरोम शर्मिला इस क़ानून को पूरी तरह से हटाए जाने की मांग को लेकर वर्ष 2000 से भूख हड़ताल पर हैं.

जी के पिल्लै का मानना है कि इस क़ानून को पूरी तरह से हटा देना तो मुमकिन नहीं है लेकिन इसको एक मानवीय चेहरा देने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है और इसके बदलाव की योजना तत्काल सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी के सामने है. पूरी उम्मीद है कि अगले दो तीन महीनों में इन बदलावों को हरी झंडी मिल जाएगी.

हाल के दिनों मे पूर्वोत्तर के पृथक्तावादी संगठन ख़ास तौर पर उल्फ़ा की शांति वार्ता पहल को गृह सचिव एक अच्छी शुरूआत मानते है और उनका अनुमान है इन इलाक़ों में स्थिति बेहतर होने के प्रमाण साफ़ हैं.

Image caption गृह सचिव को यक़ीन है कि पिछले कुछ सालों में पूर्वोत्तर के हालात में बेहतरी हुई है.

गृहमंत्रालय के अनुसार इसकी पूरी संभावना है कि कई इलाक़ो को “डिस्टर्ब्ड एरियास” या अस्थिर इलाक़ों की श्रेणी से हटा दिया जाए जिसके बाद सेना का विशेषाधिकार क़ानून भी वहां लागू नही रहेगा. उनका मानना है कि अब समय आ गया है जब सेना को पूर्वोत्तर के इलाक़ो से रवाना कर दिया जाए.

'समस्या जटिल'

ये पूछे जाने पर कि क्या केन्द्र सरकार की पूर्वोत्तर नीतियों से वे संतुष्ट है, इसके जवाब में गृहसचिव ने माना कि इस इलाक़े की बुनावट बहुत जटिल है और इसे समझने में केन्द्रीय सरकार ने काफ़ी लंबा समय लगा दिया. अब समझ बढ़ी ज़रूर है लेकिन अभी भी लोगों के स्तर पर सम्पर्क बढ़ाने की ज़रूरत है.

ये माना जाता है कि एशिया के सबसे लंबे पृथक्तावादी आंदलोन को पड़ोसी देश ख़ास कर बांग्लादेश, बर्मा और चीन का समर्थन हासिल है.

गृह सचिव ने माना कि इस सहयोग को नकारा नहीं जा सकता है लेकिन पिछले दिनों बांग्लादेश सरकार ने ऐसे संगठनों को उनकी ज़मीन से कार्रवाई न करने के प्रति ठोस क़दम उठाए हैं और पृथक्तावादी नेताओं की गिरफ़्तारी में मदद की है लेकिन ऐसा लगता है कि बर्मा सरकार के हाथ में बहुत कुछ नहीं है और वो एक तरह से ऐसे संगठनों के नेटवर्क के सामने थोड़ी असहाय सी नज़र आती है.

चीन एक समय पर ज़रूर सहयोग दे रहा था लेकिन अब चीन सरकार को ये समझ आ गया है कि ये दोनो देशों के हित मे नहीं है लेकिन चीन इतना बड़ा देश है कि हो सकता है कई लोग इन संगठनों को अब भी मदद दे रहे हों.

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