लोहिया जन्मशती से क्या हासिल हुआ?

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Image caption विचार जगत के प्रतिष्ठानों में लोहिया के नामलेवा इक्के-दुक्के ही मिलते हैं

किसी नेता या विचारक को हम कैसे याद करते हैं, ये अमूमन उसके कर्म और विचार पर निर्भर नहीं करता. अतीत को हम कैसे याद करते हैं, ये हमारी वर्तमान दशा और भविष्य के दिशाबोध पर निर्भर करता है.

महापुरुषों की याद उनके अपने व्यक्तित्व, कृतित्व और रचनासंसार से ज़्यादा उनके चेलों के आचार-व्यवहार, उनके अनुयायियों के चिंतन-मनन और उनके वारिसों के काम-काज से बनती है.

इस लिहाज़ से राममनोहर लोहिया की जन्मशती से बहुत कुछ अपेक्षाएं बांधने की गुंजाइश नहीं थी.

समकालीन भारत में लोहिया के विचार और राजनीति चारों ओर बिखरे हुए हैं. खुद को लोहियावादी मानने या बताने वाले लोग तमाम राजनैतिक दलों में पाए जाते हैं.

कोई एक दल नहीं जिसे लोहिया की परम्परा का वारिस कहा जा सके. एक वक्त मुलायम सिंह की पार्टी ऐसा दावा करती थी, अब उसने ये पाखंड भी छोड़ दिया है.

विचार जगत के प्रतिष्ठानों में लोहिया के नामलेवा इक्के-दुक्के ही मिलते हैं.

अराजनीतिक विरासत

लोहिया का नाम किसी राजनैतिक या वैचारिक सत्ता से तार नहीं जोड़ता. ऐसे में 23 मार्च 2010 को शुरू हुई लोहिया की जन्मशती के बारे में यही आशंका थी कि ये अवसर एक छोटे से कर्मकांड में बदल कर रह जायेगा.

इस 23 मार्च को जब जन्मशती के समारोह पूरे हो जाएंगे तब ये आशंका निर्मूल तो नहीं हो जाएगी. लेकिन जो कुछ हुआ उसे महज़ एक छोटे से कर्मकांड की संज्ञा नहीं दी जा सकती.

स्वर्गीय सुरेन्द्र मोहन जैसे निर्विवाद छवी और ऊँचे कद के शख्स की अध्यक्षता में बनी जम्शाती समारोह समिति के कई सदस्यों ने अपने पूर्वाग्रह, संगठनिक जुड़ाव और सहूलियत से ऊपर उठकर, व्यापक एका बनाने का काम किया.

इन समारोहों के ज़रिये कम से कम लोहिया का नाम दर्ज हुआ, जन्मशती गुमनामी में बीतने से बच गई. देश भर में फैले तमाम साधारण कार्यकर्ताओं ने अनेकानेक छोटे-बड़े कार्यक्रमों के ज़रिये लोहिया को याद किया.

बिना किसी चमक दमक लेकिन असीम लगन से हुए इन प्रयासों ने लोहिया की मूर्तिभंजक छवि को बचाए रखा. स्वयं लोहिया को ऐसे प्रयास देख कर सुकून होता.

राममनोहर का स्मरण

विचार जगत में इस जन्मशती के बहाने कुछ नए काम हुए. स्वर्गीय हरिदेव शर्मा की लगन और मस्तराम कपूर के उद्यम से लोहिया की रचनावली प्रकाशित हुई.

समाजवादी आन्दोलन से जुड़ी तमाम पत्रिकाओं ने विशेषांक के जरिये लोहिया की याद को दर्ज किया और कुछ नए आयाम भी खोले.

इनमे 'अकार', 'सामान्यजन सन्देश', 'जनता' , 'सामायिक वार्ता' और 'युवा संवाद' के प्रयास याद किए जाएंगे.

अंग्रेज़ी के बौद्धिक जगत मे भी 'मेनस्ट्रीम' और 'इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली' के विशेषांकों के ज़रिये लोहिया की उपस्थिति दर्ज हुई.

देश भर में दर्जनों सेमिनार हुए. उम्मीद की जा सकती है कि नेहरूवादी और मार्क्सवादी दबदबे के चलते लोहिया को बौद्धिक जगत से बहिष्कृत रखने की परंपरा में सेंध लगेगी.

अगर जन्मशती का उद्देश्य ये था कि राजनीतिक दायरों में लोहिया का नाम बचा रहे और बौद्धिक जगत में लोहिया की पहचान बन जाए तो दो बरस चले इन प्रयासों को निरर्थक नहीं कहा जा सकता.

लेकिन क्या इतनी भर अपेक्षा रखना लोहिया के साथ न्याय होगा?

लोहिया खुद होते तो निस्संदेह ज्यादा कड़े सवाल पूछते, जैसे उन्होंने गांधी के बाद गांधी के चेलों से पूछे थे.

राजनीति के दायरे में असली सवाल ये है कि क्या वह राजनीति मजबूत हुई जिसे लोहिया क्रांतिकारी राजनीति मानते थे?

बौद्धिक क्षेत्र में सवाल ये है कि क्या लोहिया के विचार आगे बढे़? क्या लोहिया की वैचारिक परंपरा सुदृढ़ हुई?

इन सवालों का उत्तर देना लोहियावादियों के लिये कठिन होगा.

लोहिया की राजनीति को लोहिया के साथ जुड़े लोगों या संगठनों की राजनीति मान लेना न सिर्फ लोहिया के साथ अन्याय होगा बल्कि खुद हमारे भविष्य के प्रति लापरवाही होगी.

लोहिया के वारिस?

चाहे मुलायम सिंह यादव हो, शरद यादव या फिर राम विलास पासवान...इन सबकी राजनीति का शुरुआती दौर लोहिया के आन्दोलन में गुज़रा.

आज भी वो गाहे-बगाहे लोहिया का नाम ले लेते हैं और उनसे जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल कटे हैं. लेकिन उनकी राजनीति अक्सर जातिवाद का सहारा लेती है, जिसके खिलाफ लोहिया ने बार-बार आगाह किया.

आज इन सब नेताओं और दलों की राजनीति उस पूंजीवादी व्यवस्था से समझौता कर चुकी हैं जिसके खिलाफ लोहिया ने जीवन भर लडाई लड़ी.

नाम भले ही समाजवादी हो, ये सब चेहरे आज पूंजीवादी सत्ता प्रतिष्ठान के अभिन्न अंग बन चुके हैं. अगर यही लोहिया के वारिस हैं तो लोहियावादी राजनीति का कोई भविष्य न तो है और न होना चाहिए.

आज लोहिया की राजनीति कि तलाश हमें लोहियावादी या समाजवादी ठप्पे से दूर ले जाएगी.

समाजवादी आन्दोलन की एक छोटी सी कुजात धारा ने ज़रूर ये कोशिश की है कि इसकी धार को कुंद न पड़ने दिया जाए. लेकिन आज लोहिया के राजनीतिक वारिसों की तलाश हमें देश भर में फैले जनांदोलनों तक ले जाएगी.

वे अपने आप को समाजवादी नहीं कहते. कई तो लोहिया का नाम तक नहीं जानते. लेकिन उनके आन्दोलन आज वही काम कर रहे हैं जो लोहिया ने अपने दिनों में किया.

विचार जगत में भी हमें इसी ईमानदारी और निर्ममता से काम लेना होगा.

आज के संदर्भ में लोहियावादी दृष्टी का मतलब ये नहीं हो सकता कि हम उनकी लिखी-कही हर बात से चिपके रहें. उनके अपने मुहावरे या स्थापनाएं, उनके आग्रह या दुराग्रह, किसी परिस्थिति विशेष में उनका सही या गलत मूल्यांकन.

लोहिया के सिद्धांत के प्रति न्याय करने के लिये हमें लोहिया के अपने विचार से असहमत होना पड़ सकता है, नए तथ्यों की रोशनी में उनके आग्रहों से अलग होना पड़ सकता है.

वैचारिक विरासत

यही नहीं, अगर हम लोहिया के सवालों को गंभीरता से लें तो कई बार हमें लोहिया के उत्तर को ख़ारिज करना पड़ेगा, उनके सिद्धांत से असहमत होना पड़ेगा. लोहिया की वैचारिक विरासत का सबसे बड़ा खजाना है उनकी विचार पद्धति और उनका नज़रिया, जो हमें बिलकुल नए सवालों और उनका उत्तर देने के नए तरीकों की ओर ले जाता है.

इस पद्धती की ख़ूबसूरती यही है कि इसमें बने-बनाए उत्तर नहीं हैं. समसामायिक उत्तरों की तलाश हमें अपने आप करनी होगी. ठीक वैसे ही जैसे लोहिया ने अपने श्रद्धेय विचारकों से सीखते हुए भी अपने उत्तर स्वयं खोजे थे.

लोहिया की विरासत महज़ एक नेता या संगठन की धरोहर नहीं है. लोहिया के विचार में बीसवीं सदी के भारत की दो राजनीतिक धाराओं का संगम करने की अनोखी कोशिश है.

समता और स्वराज की ये दोनों धाराएं पिछले सौ बरस से एक दूसरे के सामानांतर बह रही हैं.

इस लिहाज से लोहिया की विरासत को खंगालना इक्कीसवीं सदी के विकल्प विचार और वैकल्पिक राजनीति के सफर का अनिवार्य अंग है. इस लंबे सफर में जन्मशादी तो सिर्फ एक छोटा पड़ाव ही हो सकती है.

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