शहरों से गायब हो रही गौरैया

गौरैया

गौरैया एक ऐसी चिड़िया है, जो इंसान के घर आँगन में घोसला बनाकर उसके सबसे करीब रहती है. लेकिन शहरों के विस्तार और हमारी बदलती जीवन शैली से अब गौरैया के रहन सहन और भोजन में कई दिक्कतें आ रही हैं.

यही वजह है कि शहरों में अब गौरैया की आबादी कम होती जा रही है.

लखनऊ एक जमाने में बागों का शहर था. आलमबाग, चारबाग, लालबाग, कैसरबाग वगैरह-वगैरह.

ये सब इलाके अब बाजार बन चुके हैं. शहर का विस्तार हुआ तो गोमती नगर, इंदिरा नगर, महानगर, निराला नगर, अलीगंज, जानकीपुरम, राजाजी पुरम और कानपुर रोड की तरफ आशियाना जैसे उप नगर बसते चले गए.

पुराने गाँवों के खेत खलिहान, तालाब और बाग बगीचे कंक्रीट के जंगल बन गए.

बची-खुची हरियाली पिछले कुछ सालों में जमीन और सड़कों के चौड़ीकरण, पक्की टाइल्स और पत्थर के पार्कों में चली गयी.

छिन गया दाना-पानी

पेड़ों की जगह बिजली, टेलीफोन के खम्भों, मोबाइल टावर्स, बहुमंज़िली इमारतों ने ले ली.

इंसान ने बढ़ती आबादी के लिए तो जगह बनायी लेकिन जाने कितने पशु-पक्षी इसके चलते बेघर हो गए और उनका दाना-पानी छिन गया.

शहरीकरण के इस दौर में गौरैया भी प्रभावित हुई.

गौरैया आबादी के अंदर रहने वाली चिड़िया है, जो अक्सर पुराने घरों के अंदर, छप्पर या खपरैल अथवा झाड़ियों में घोंसला बनाकर रहती हैं.

घास के बीज, दाना और कीड़े-मकोड़े गौरैया का मुख्य भोजन हैं, जो पहले उसे घरों में ही मिल जाता था, लेकिन अब ऐसा नही है.

पत्रकार रुचिकुमार बचपन में लखनऊ के नज़रबाग मोहल्ले में रहती थीं. गौरैया के झुण्ड दिन भर उनके आँगन में मंडराते रहते थे.

चिड़ियों के घर

रुचिकुमार कहती हैं, ''हमारे घर में आँगन था और आँगन से सटा बरामदा. हम जब सुबह उठते थे, आँख खुलती थी तो बहुत सी चिड़ियां, खासतौर से गौरैया हमारे आँगन और बरामदे में भरी रहती थीं. अब वह तादाद बहुत कम हो गयी है. आप कह सकते हैं कि पहले हमारे घर में अगर 40-50 चिड़ियां आती थीं तो अब मुश्किल से तीन चार ही दिखाई देती हैं.''

रुचिकुमार अब बटलर पैलेस कालोनी में रहती हैं. वे खुशकिस्मत हैं कि बटलर पैलेस कालोनी में उनके घर के आसपास कई पेड हैं, जिससे तरह-तरह की चिडियां उनके घर आती हैं.

रुचिकुमार बताती हैं कि आजकल दिन भर कोयल कूकती है. उन्होंने और उनके पति कमाल खान ने इन पेड़ों पर चिड़ियों के लिए घर टांग दिए हैं, दाने और पानी का भी इंतजाम है. इसलिए भोर होते ही चिड़ियों के झुण्ड उनके घर पर आ जाते हैं.

चिड़ियों के प्रति आम लोगों में ऐसा ही प्रेम जगाने के लिए उत्तर प्रदेश जैव विविधता बोर्ड की अधिकारी प्रतिभा सिंह ने अखबारों के जरिये लोगों से अपील की कि वे सबेरे उठाकर अपने आसपास नजर डालें और देखें कि कितनी गौरैया बची हैं या नहीं हैं. प्रतिभा सिंह का कहना है कि करीब 50 लोगों ने उन्हें जवाब दिया.

'नहीं देखी गौरैया'

प्रतिभा सिंह ने बताया, ''लखनऊ के लोगों ने हमें बहुत सारे ईमेल भेजे हैं कि हमने इतनी चिड़िया देखी. कुछ ने लिखा कि पहले हम बहुत चिड़िया देखा करते थे आश्चर्य हुआ कि अब हमने उससे कम देखी. तीन चार लोगों ने यह भी लिखा कि हमने कोई गौरैया नही देखी.''

चिड़ियों को देखना एक शौक है. लोग दूरबीन लेकर चिड़िया देखने जंगल जाते हैं. लेकिन कई लोग घर पर ही चिड़िया बुला लेते हैं.

आँखों के डाक्टर एनके मिश्रा अलीगंज की नई बनी कालोनी में रहते हैं उन्हें पेड पौधों का शौक है.

डाक्टर एन के मिश्र सुबह-सबेरे ही चिड़ियों के लिए दाने-पानी का इंतजाम कर देते हैं. फिर गौरैया और दूसरी चिड़ियों को इंसानों की तरह आपस में प्यार और लड़ाई करते देखते आनंदित होते हैं.

Image caption पेड़ों पर टंगे चिड़ियों के घर जिनमें दाने और पानी का भी इंतजाम है.

डाक्टर मिश्र के अनुसार चिड़ियों का परस्पर व्यवहार बड़ा मजेदार है, ''जैसे आप आदमियों के व्यवहार में तरह-तरह के प्रकार देखते हैं वैसे ही चिड़ियों में भी दिखाई देता है. जैसे दबंगई, गुंडई एक-दूसरे पर वर्चस्व की लड़ाई, फिज़ूल में चोंच मारना. ढेर सारा दाना पड़ा है, लेकिन वह साथ वाली चिड़िया को चोंच मारकर भगाकर ही खायेगी. आप दस मिनट बैठे रहिए तो ये ढेर सारे उधम दिखायी देंगे. यह सब बहुत दिलचस्प है.''

कीटनाशक और प्रदूषण

डाक्टर मिश्र इस बात पर अफ़सोस करते हैं कि शहरी विस्तार की योजना बनाने वाले लोग पेड़-पौधे, घास-फूस और वनस्पति खत्म करते जा रहे हैं. जो नये पेड लग रहे हैं न उनमें न छाया है, न फल है. ये दूरदर्शिता वाली योजनाएं नही हैं.

जैव विविधता बोर्ड की अधिकारी प्रतिभा सिंह कहती हैं कि हमारी जीवन शैली में बदलाव ने गौरैया के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है.

वो कहती हैं, ''पहले गाँव में आँगन होता था. आंगन में अनाज धुलते-सुखते थे. जो शहरी घर हैं, उनमें न आँगन हैं, न अनाज धुलते-सुखते हैं. आटा बाजार से पैकेट में ले आते हैं. पहले घरों में चिड़ियों को जो खाना मिलता था, वह अब उस तरह से नहीं मिल पाता है.''

प्रतिभा सिंह कहती हैं कि ‘आजकल केमिकल्स और कीटनाशक दवाओं के बढते प्रयोग और प्रदूषण भी प्रभाव डाल रहे हैं.’’

कई अन्य जानकार लोग कहते हैं कि गौरैया चिड़िया बहुत संवेदनशील पक्षी हैं और मोबाइल फोन तथा उनके टावर्स से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन से भी उसकी आबादी पर असर पड़ रहा है.

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