दंतेवाड़ा: 'दुर्व्यवहार' मामले की जाँच शुरु, पर राहत नहीं पहुँची

Image caption छत्तीसगढ के दंतेवाड़ा में नक्सली काफी प्रभावी है लेकिन पुलिस ज्यादती की खबरें भी आती रहती हैं.

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में पुलिस अधिकारियों द्वारा कथित दुर्व्यवहार किए जाने की मामले की जांच हो रही है लेकिन इलाक़े में राहत लेकर जा रहे प्रशासनिक अधिकारियों को बैरंग लौटना पड़ा है.

पिछले 14 मार्च को सुरक्षा बलों के जवानों और विशेष पुलिस अधिकारियों द्वारा कथित रूप से आदिवासियों के घरों को जला दिया था और कुछ महिलाओं से दुर्व्यवहार किया गया था.

इन आरोपों की जांच तो शुरू कर दी गई है मगर गुरुवार को प्रशासनिक अधिकारियों को अजीब स्थिति का सामना करना पड़ा है.

बस्तर के कमिश्नर श्रीनिवासलू और दंतेवाड़ा के कलेक्टर आर प्रसन्ना गुरुवार को चिंतलनार के उस गाँव में राहत लेकर जा रहे थे लेकिन उन्हें बीच रास्ते से ही बैरंग वापस लौटना पड़ा.

कहा जा रहा है कि ऐसा पुलिस के विरोध के चलते हुआ. वैसे भी दंतेवाड़ा के सीनियर एसपी एसआरपी कल्लूरी ने सुरक्षा बलों द्वारा इसी तरह की किसी भी घटना को अंजाम देने की बात से इंकार करते हुए कहा है कि यह "माओवादियों का दुष्प्रचार" मात्र है.

ना सिर्फ कलेक्टर और कमिश्नर और अनुमंडल अधिकारी को बैरंग वापस लौटना पड़ा बल्कि राहत का सामन ले जा रहे वाहनों को विशेष पुलिस अधिकारियों के एक दल ने रोका और ड्राइवरों और वाहन के मालिकों के साथ मार पीट भी की.

हालांकि इस मामले में बार बार कमिश्नर और कलेक्टर से बात करने की कोशिश की गयी मगर दोनों ही अधिकारी उपलब्ध नहीं थे.

राहत ले जा रहे एक ऐसे ही वाहन के मालिक कपूर चाँद राजपूत का कहना है कि उनके साथ विशेष पुलिस अधिकारियों नें मार पीट भी की.

उन्होंने कहा, ‘‘वो कह रहे थे तुम नक्सलियों को अनाज पहुंचा रहे हो. मैंने कहा यह गाड़ी तो प्रशासन के लोग यानी के कलक्टर, आयुक्त और अनुमंडल अधिकारी लेकर जा रहे है. मगर उन्होंने एक ना सुनी और मेरे साथ मार पीट की.’’

बस्तर से एक मात्र कांग्रेस विधायक कवासी लकमा ने बीबीसी को बताया कि यह सभी अधिकारी राहत सामग्री जैसे चावल, आता, डाल, आलू और दूसरी ज़रुरत की चीज़ें लेकर चिंतलनार के मोरापल्ली जा रहे थे.

सुरक्षा बलों पर आरोप है कि उन्होंने पांच ग्रामीणों को नक्सली बताते हुए मार गिराया, लगभग तीन सौ झोपड़ियों में आग लगाई है और तीन महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया है. चिंतलनार में स्थित पुलिस के कैंप के बीस किलोमीटर की परिधि में घने जंगलों के बीच कई आदिवासी गांव हैं और 14 मार्च की सुबह अचानक नाकेबंदी करते हुए अर्द्ध सैनिक बलों के जवानों नें इस पूरे इलाके को घेर लिया.

पुलिस का दावा था कि उन्हें गुप्त सूचना मिली थी कि मोरापल्ली के इलाके में बड़े माओवादी कमांडरों का जमावड़ा है और इस इलाके में नक्सलियों की हथियार बनाने की मशीन भी लगी हुई है. मगर यहाँ पुलिस को कुछ नहीं मिला. खबरें हैं की सुरक्षा बलों की टुकड़ी ने लौटने के क्रम में पास के ही तिमापुरम में पड़ाव डाला जहाँ उनकी माओवादियों के साथ मुठभेड़ हुई. इस मुठभेड़ में तीन जवान मारे गए थे जबकि 9 जवान घायल हुए थे.

उसके बाद जो कुछ हुआ उसने पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों को कटघरे में खड़ा कर दिया है.

सुरक्षा बलों पर आरोप है कि बौखलाहट में उन्होंने तीन गांव में जमकर तांडव मचाया. कहा जा रहा है कि पटेलपाड़ा गाँव में जब सुरक्षा बलों ने धावा बोला तो एक ग्रामीण माडवी चूला पेड़ पर चढ़ कर इमली तोड़ रहा था. आरोप है कि उसको वहीँ गोली मार दी गयी. हालाकि दंतेवाड़ा के सीनियर एसपी एसआरपी कल्लूरी इस तरह की किसी भी घटना से इंकार कर रहे हैं लेकिन जिले के कलेक्टर आर प्रसन्ना नें बीबीसी से बात करते हुए कहा, ‘‘हमें भी खबरें मिली हैं कि कुछ आदिवासियों के घरों में आग लगा दी गयी है. अब यह आग किसने लगाई है इसका पता नहीं चला है. सुरक्षा बलों के जवानों नें लगाई या माओवादियों ने यह स्पष्ट नहीं है."

प्रसन्ना कहते हैं कि कि गांववाले आरोप लगा रहे हैं कि तीन महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों के जवानों ने दुर्व्यवहार किया है और कुछ ग्रामीणों को भी गोली मारी है.

वो कहते हैं "मगर अभी तक किसी गांव वाले नें आगे आकर इसके बारे में कोई लिखित शिकायत नहीं की है."

दंतेवाड़ा के कलेक्टर नें मामले की जांच करने के लिए तहसीलदार के नेतृत्व में एक कमिटी का गठन किया है.

उनका कहना है इस कमिटी में एक महिला अधिकारी को भी रखा गया है. चूँकि यह पूरा इलाका दुर्गम है और बारूदी सुरंगों से पटा हुआ है, यहाँ जाना बहुत मुश्किल काम है.

प्रसन्ना कहते हैं, ‘‘हम इन गाँव के पास ही कहीं कैंप लगायेंगे ताकि पीड़ित परिवार वहां तक आकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकें.’’

फिलहाल दंतेवाड़ा जिला प्रशासन नें मुआवज़े की घोषणा भी की है. प्रसन्ना का कहना है जिनके घर जले हैं उन्हें पचास हज़ार रुपए बतौर मुआवजा मिलेगा मगर जांच पूरी होने के बाद.

इस पहल के बाद प्रसन्ना बस्तर के आयुक्त श्रीनिवासुलु और अधिकारियों के साथ पीड़ित गांव राहत लेकर जा रहे थे. राहत दल में यूनीसेफ की तरफ से भी राहत सामग्री ले जाई जा रही थी.

कहा जा रहा है कि पुलिस ने अधिकारियों को ऐसा करने से रोका. कुछ सूत्र यह भी कहते हैं कि मुख्य मंत्री रमन सिंह के कहने पर अधिकारियों को रास्ते से लौटने पड़ा है.

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