असम चुनाव की किसी को कोई परवाह नहीं

असम में चुनाव हो रहा है. इसकी न तो किसी को ख़बर है, न ही कोई परवाह. असम के चुनाव में न तो बंगाल जैसी राजनीतिक गर्मी है, न केरल जैसा वैचारिक द्वंद्व और न ही तमिलनाडु जैसा ड्रामा और सस्पेंस.

असम के मुद्दे गहरे हैं लेकिन दिखाई नहीं देते. सत्ता पलट की गुंजाइश है लेकिन परिवर्तन की आंधी नहीं बह रही.

चुनाव का परिणाम अनिश्चित है लेकिन किसी नाटकीय नतीजे की सम्भावना नहीं दीखती.

कौन बनेगा मुख्यमंत्री? किसकी होगी जीत? कैसी बनेगी सरकार? जाहिर है चुनाव के बारे में सोचते हुए सबसे पहले यही सवाल जहन में आते हैं.

अभी से इन सवालों का उत्तर तो नहीं दिया जा सकता. लेकिन यह ऐसा चुनाव भी नहीं है जिसमे आख़िरी घड़ी तक कुछ भी हो सकता है.

अगर कोई चमत्कार ही न हो जाये तो इतना तो कहा जा सकता है कि पिछली बार के तरह इस बार भी त्रिशंकु विधानसभा होगी.

संभावना इसी की है कि कोई एक दल बहुमत के बहुत निकट भी न पंहुच पाए.

सवाल यही है कि गठबंधन की सरकार का नेतृत्व कांग्रेस करेगी या असम गण परिषद. राज्य में पिछले दस साल से तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस का राज है.

आम तौर पर दस साल तक राज करने के बाद बड़े-बड़ों की हालत पतली हो जाती है. तीसरे चुनाव में चन्द्रबाबू नायडू और दिग्विजय सिंह सरीखे मुख्यमंत्री भी हांफने लगे थे.

लेकिन तरुण गोगोई के बारे में फिलहाल ऐसा नहीं कहा जा सकता. आज की तारीख़ में दोनों संभावनाएं खुली हैं.

अगर कांग्रेस को काफ़ी सीटों का नुकसान हो जाए तो अगप के नेतृत्व में गैरकांग्रेस दलों का चुनावोंपरांत समझौता होकर उनकी एक मिली जुली सरकार बन सकती है.

लेकिन यह भी संभव है कि कुछ सीटें घटने के बावजूद कांग्रेस फिर सरकार बना ले.

अगर ऐसा होता है तो उसकी वजह तरुण गोगोई का करिश्मा या फिर सरकार का शानदार कामकाज नहीं होगा.

मुख्यमंत्री की छवि

दस साल मुख्यमंत्री रहने के बाद मुख्यमंत्री की छवि ठीक-ठाक है, लेकिन उससे ज्यादा नहीं.

वे हितेश्वर सैकिया की तरह जातीय नफरत फ़ैलाने या फिर प्रफुल्ल महंता की तरह खुल्लमखुल्ला भ्रष्टाचार बढ़ाने के लिए बदनाम नहीं है, लेकिन गोगोई में न तो वाईएस रेड्डी जैसी पकड़ है, न नरेन्द्र मोदी जैसी वाकपटुता और न नीतिश कुमार जैसी कार्यक्षमता.

हालांकि कांग्रेस विकास का दावा कर रही है, लेकिन सरकार के पास दिखाने को बहुत कुछ नहीं है.

चाहे औसत आमदनी के हिसाब से देखें या फिर गरीबी के आंकड़ों में, स्वास्थ्य को देखें या शिक्षा को, असम पहले भी निचली पायदान पर था और आज भी वहीं खड़ा है.

एक तरफ बाढ़ की समस्या है तो दूसरी तरफ पीने के पानी का संकट है. बिजली और सड़क की हालत में कोई खास सुधार नहीं है. जंगल कट रहे हैं, आजीविका का संकट मुंह बाएँ खड़ा है. पिछले दो बरस में भष्ट्राचार के गंभीर आरोप भी लगे हैं.

अगर कोई और राज्य होता तो लोगों की नाराज़गी के चलते सरकार के चुनाव हारने की भविष्यवाणी आसानी से की जा सकती थी.

लेकिन कुछ ख़ास न करने के बावजूद काँग्रेस टिकी हुई है. वर्ष 2006 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत तो नहीं मिला लेकिन बोडो पार्टी और निर्दलीयों के सहयोग से सरकार बना ली. 2009 के लोक सभा चुनाव में पासा पलटने के तमाम कयासों के बावजूद कांग्रेस हल्का सा नुक़सान खाकर बच गई.

पहली नजर में कांग्रेस की यह सफलता विपक्ष के बिखराव का नतीजा रही है.

जब कांग्रेस चुनाव जीतती है तो उसे 35 फ़ीसदी के करीब ही वोट मिलते हैं. लेकिन बाकी वोट असम गण परिषद्, भाजपा, कम्युनिस्ट पार्टियों और एयूडीएफ़ जैसी तमाम छोटी छोटी पार्टियों में बंट जाते हैं.

पिछले एक दशक में अगप और भाजपा ने कई बार समझौता किया भी है, लेकिन इनका गठबंधन कभी भी जमीन पर चल नहीं पाया.

पहली सरकार बनाने के बाद से खुद अगप में फूट पड़ गई और हर चुनाव में अगप के दो या ज्यादा धड़े एक दूसरे के सामने होते थे. इस बार भी ग़ैरकांग्रेसी पार्टियाँ पूरी तरह बिखरी हुई हैं.

पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन का खामियाजा भुगत चुकी अगप इस बार फूंक फूंक कर कदम रख रही है.

चुनाव से पहले अगप की ओर से सभी ग़ैर काँग्रेसी दलों का महा गठबंधन बनाने का आधा-अधूरा प्रयास भी हुआ, लेकिन यह तो होने वाला नहीं था.

कहने को अगप का दो छोटे दलों के साथ समझौता है लेकिन हकीकत में किसी बड़े विपक्षी दल का किसी और के साथ समझौता नहीं है.

हाँ, अगप की अंदरूनी फूट लगभग ख़त्म हो गई है, पार्टी से निष्कासन झेलने के बाद महंता अगप में वापिस आ गए हैं.

दरअसल असम में इस राजनीतिक बिखराव की जड़ में जातीय समीकरण है. धर्म और जाति से ज्यादा भाषा और आप्रवास के आधार पर राज्य की राजनीति बंटी हुई है.

असम आन्दोलन के बाद से राज्य के बहुसंख्यक असमिया (या अहोमिया) समुदाय की चिंता को राजनीति में अभिव्यक्त करने का काम असम गण परिषद् ने किया.

लेकिन सिर्फ़ 58 फीसदी अहोमिया समाज की राजनीति करने वाली अगप को अपने बूते पर बहुमत मिलना असंभव प्राय है.

अगर वो भाजपा के साथ गठबंधन करती है तो उसे कुछ बांग्ला भाषी हिन्दुओं का वोट तो मिल जाता है लेकिन असमिया मुसलमान कट जाते हैं.

उधर 2006 के विधानसभा चुनाव से इतर के व्यापारी बदरूदीन अजमल ने एयूडीएफ़ की स्थापना कर बांग्ला भाषी मुसलमानों की पार्टी भी खड़ी कर दी.

राज्य में कांग्रेस ही एक पार्टी है जिसकी कमोबेश सभी समुदायों और इलाकों में पहुंच है.

राज्य की 12 फीसद आबादी आदिवासी है, लेकिन वह भी छोटे-छोटे स्थानीय कबीलों में बंटी है. बोडो और कार्बी समुदाय का कई सीटों पर दबदबा है और उनकी अपनी पार्टियाँ हैं.

कुल मिलाकर राजनीति कि बुनावट ऐसी है कि गठबंधन के गणित और जातीयता की चिंताओं के चलते राज्य के बाकी सब मुद्दे गौण हो जाते रहे हैं.

और तो और असम आन्दोलन के प्रमुख मुद्दे यानि विदेशी आप्रवासियों के सवाल पर भी पिछले 20 साल में कुछ भी सार्थक प्रगति नहीं हुई है. लेकिन अब धीरे-धीरे जातीयता के चढ़ाव का उतार शुरू हुआ है.

जातीय राजनीति

अस्सी के दशक में अहोमिया समाज में जनाधार खोने के बाद कांग्रेसी नेता हितेश्वर सैकिया ने तमाम अल्पसंख्यक समुदायों को जोड़ने की ख़तरनाक जातीय रणनीति बनाई थी.

इस मायने में तरुण गोगोई कांग्रेस की नीति बदली है और कुछ हद तक अहोमिया समुदाय का विश्वास जीतने में सफलता पाई है.

अगप भी आदिवासी समुदायों और मुस्लिम समाज का विश्वास जीतने की कोशिश कर रही है.

इस बार अगप के घोषणापत्र में राज्य की जनता के दैनंदिन मुद्दों पर जोर है. इसलिए चुनाव के परिणाम से ज्यादा महत्त्वपूर्ण ये है कि असम की राजनीति में ये मुद्दे किस हद तक उभर पाते हैं.

असम का दुख ये है कि शेष भारत उसके दर्द को नहीं समझता.

असम की दिक्कत ये है कि उसका दुख-दर्द राज्य की राजनीति में धारदार मुद्दा नहीं बनता.

असम की त्रासदी ये है कि सतरंगा समाज इन्द्रधनुष बुनने की बजाय हर रंग के धागे को एक असंभव गुच्छा बना देता है.

यह चुनाव अपने आप में इस दर्द की दावा तो नहीं बन सकता, लेकिन अगर जातीय राजनीति के गुच्छे को सुलझाने की शुरुआत हो सके तो यह सीमान्त प्रदेश अपनी त्रासदी से उबरना शुरू कर सकता है.

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