जिसकी बंदूक उसकी हुकूमत

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Image caption आदवासियों के ऊपर ज़्यादती का चौ तरफ़ा विरोध हो रहा है

चिंतलनार की घटना के बाद छत्तीसगढ़ की सरकार दबाव में आ गयी है. शायद यह पहला मौक़ा है जब सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों के मामले पर विधान सभा में जमकर हंगामा हुआ और मुख्यमंत्री और राज्यपाल और वरिष्ट पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को घटनास्थल जाना पड़ा.

घटना को लेकर जहाँ राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार को नोटिस दिया है. पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने तेवर तल्ख़ करते हुए खाद्य सुरक्षा आयुक्त एन सी सक्सेना और हर्ष मंदर को चिंतलनार के इलाके में हुई मौतों की जाँच करने का निर्देश दिया है.

सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग के दबाव के बाद 2 अप्रैल को मुख्यमंत्री रमन सिंह, राज्यपाल शेखर दत्त, राज्य के गृहमंत्री ननकीराम कँवर और वरिष्ट पुलिस अधिकारी ताड़मेटला पहुंचे जहाँ उन्होंने पीड़ित ग्रामीणों का हाल सुना और उन्हें राहत सामग्री उपलब्ध कराई.

यह घटना 11 से 14 मार्च के दरम्यान की है जब माओवादियों से मुठभेड़ के बाद सुरक्षाबल के जवान चिंतलनार से वापस लौट रहे थे. आरोप है कि लौटते वक़्त सुरक्षा बलों नें चिंतलनार के इलाक़े में कुछ गांवों में जमकर उत्पात मचाया. इस क्रम में जवानों ने आदिवासियों के 300 घरों को जलाया, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया और कुछ ग्रामीणों की हत्या भी की.

पुलिस प्रतिक्रया से नाराज़

Image caption पुलिस ने कुछ पत्रकारों के खिलाफ़ मुक़दमे दर्ज कर लिए हैं

पुलिस के अधिकारी घटना से इनकार करते हुए कहते रहे हैं कि ये सिर्फ माओवादियों का 'प्रचार मात्र' है.

इस घटना के बाद दंतेवाड़ा के कलक्टर ने जब न्यायिक जांच के आदेश दिए तो उससे कई पुलिस के बड़े अधिकारी नाराज़ हो गए. शायद यही कारण रहा कि पहले तो पुलिस ने आयुक्त और कलक्टर को राहत सामग्री लेकर जाने से रोका और बाद में पुलिस ने अपना ग़ुस्सा पत्रकारों पर भी निकाला और उनके खिलाफ़ मामले भी दर्ज कर लिए.

कहा जा रहा है कि 'सलवा जुडूम’के कार्यकर्ता किसी को भी प्रभावित गावों में जाने से रोक रहे हैं. जो भी इन गांवों में जाने का प्रयास करता है, चाहे वह जिला प्रशासन के अधिकारी हों या फिर सामजिक कार्यकर्ता सलवा जुडूम के लोग और विशेष पुलिस अधिकारी या कोया कमांडो उस के साथ मारपीट या हमला करते हैं.

इसकी वजह से न सिर्फ कलेक्टर, कमिश्नर और अनुमंडल अधिकारी को बैरंग वापस लौटना पड़ा बल्कि राहत का सामन ले जा रहे वाहनों को विशेष पुलिस अधिकारियों के एक दल ने रोका और वाहन के मालिकों के साथ मार पीट भी की.

सुरक्षा के घेरे में राहत सामग्री ले जा रहे सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश के काफ़िले पर भी कुछ दिनों पहले पथराव हुआ था और उन पर अंडे फेंके गए यही सुलूक कांग्रेस के विधायक दल के साथ भी हुआ.

विपक्ष का दवाब

छत्तीसगढ़ की विधान सभा में विपक्ष नें इस मामले को लेकर सरकार को घेरा और तीन दिनों तक सदान की कार्रवाई चलने नहीं दी. इस दौरान विपक्ष नें ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और कार्य स्थगन प्रस्ताव पेश कर सरकार से चर्चा करके की मांग कि. शोर शाराबे और हंगामे के बीच सदन से विपक्ष के विधायकों नें बहिष्कार किया. इस दौरान विपक्ष के 29 विधायकों को अध्यक्ष धरमलाल कौशिक द्वारा निलंबित भी कर दिया गया.

विपक्ष नें लगातार सरकार को इस बात पर आड़े हाथों लिया कि एक पखवाड़ा बीट जाने के बाद भी ना राज्य के मुख्यमंत्री और ना ही बड़े अधिकारी या मंत्री घटना स्थल पर पहुँच पाए हैं. विपक्ष का आरोप है कि बस्तर संभाग में अराजकता का माहौल है.

सदन में विपक्ष के नेता रविन्द्र चौबे नें बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, "जब प्रशासन के लोगों को पुलिस वाले लूट रहे हैं. उनसे राहत सामग्री छीन रहे हैं तो अंदाजा लगाया जा सकता है वहां क्या चल रहा है. बस्तर संभाग में छत्तीसगढ़ की सरकार का अस्तित्व ही समाप्त हो चूका है. आखिर वहां किसकी हुकूमत चल रही है?"

तो सवाल उठता है कि बस्तर के इलाके में किसकी हुकूमत चल रही है. राज्य के पूर्व गृह मंत्री नन्द कुमार पटेल, जिन्हें भी अपने विधायक दल के साथ बैरंग वापस लौटना पड़ा कहते हैं :" वहां कोया कमांडो, सलवा जुडूम के कार्यकर्ता और हथयारबंद लोग ही अपनी हुकूमत चला रहे है. इस इलाके में प्रशासन के लोग और पुलिस वालों के बीच युद्ध चल रहा है. राहत की सामग्री लेकर जाने वाले सरकार के अनुमादल अधिकारी पर सलवाजुडूम और पुलिस के लोग हमला करते हैं. यह लोग आपस में ही युद्ध लड़ रहे हैं"

तमाम आलोचनाओं और सदन में विपक्ष के बहिष्कार के बीच राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह का तर्क है कि जिस इलाके में यह घटना घटी वह राज्य का समबसे संवेदनशील इलाका है और जो कुछ वहां हो रहा है वह लोगों के आक्रोश की वजह से हो रहा है.

`पुलिसिया कार्रवाई नहीं जनाक्रोश'

रमन सिंह कहते हैं, "वह ऐसा स्थान है जहां लगातार तीन बड़ी घटनाओं में सीआरपीऍफ़, विशेष पुलिस अधिकारी और कोया कमांडो के 91 जवान शहीद हुए हैं. उस क्षेत्र में तहसीलदार के नेतृत्व में राहत सामग्री लेकर जाने वालों पर आक्रमण हुआ. मुझे लगता है कि जबतक स्थिति सामान्य ना हो वहां पर जाने में दिक्कत आ सकती है क्योंकि उस क्षेत्र के लोगों के मन में आक्रोश है. उन्हें लगा के लोग राहत लेकर नक्सलियों सहयोग और समर्थन के लिए जा रहे हैं. अब चक्का जाम की स्थिति में पुलिस के अधिकारी क्या कर सकते हैं जब आम आदमी वाहन बैठे हैं. दो हज़ार लोग बैठे हैं. तो लोग लौट कर आ गए. ठीक है. कुछ अंडे फेंके गए. जब स्वाभाविक आक्रोश स्थानीय लोगों में आता है तो उसकी प्रतिक्रिया होती है."

बावजूद इसके छत्तीसगढ़ की सरकार ने मामले को लेकर अलग अलग जांच के आदेश दिए हैं. एक जांच दल का गठन दंतेवाड़ा के कलक्टर नें किया है जिसमे तहसीलदार के अलावा पत्रकार और सामाजिक संगठन शामिल हैं. दूसरी जांच जिले के ही एक दंडाधिकारी के नेतृत्वा में हो रही है जबकि घटना के संबंध में सरकार नें न्यायिक जांच के आदेश भी दिए हैं. मगर सवाल फिर उठता है कि जब चिंतलनार के मोरपल्ली, ताड़ मेटला और तिमापुरम में कोई जा ही नहीं पा रहा है तो फिर यह अलग अलग तरह की जांच कैसे संभव हो पाएगी. बस्तर और ख़ास तौर पर दक्षिण बस्तर की परिस्थितियों को देख कर यह कहावत चरित्रार्थ होती नज़र आ रही है कि "हाथों में बंदूक है जिसकी, चलती है हुकूमत उसकी."

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