'भूख से जूझ रहे हैं चिंतलनार के लोग'

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Image caption पिछले महीने चिंतलनार में कथित तौर पर सुरक्षाबलो ने आदिवासियों के लगभग 300 घर जला दिए थे.

भारत के सुप्रीम कोर्ट के ज़रिए नियुक्त किए गए खाद्य सुरक्षा आयुक्त हर्ष मंदर ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में चिंतलनार के ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिमापुरम के आदिवासी भूख से जूझ रहे हैं जो काफ़ी गंभीर मामला है.

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले में पिछले कुछ दिनों में ग्रामीणों की रहस्यमय मौतों पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित गावों का मुआयना कर रिपोर्ट पेश करने का निर्दश दिया था.

जनवितरण प्रणाली में अनियमितता से सम्बंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायलय ने ख़ुद के ज़रिए नियुक्त किए गए आयुक्तों को दंतेवाड़ा के कलक्टर और अधिकारियों के साथ इन गावों में जाकर जांच करने के निर्देश दिए थे जिसके तहत हर्ष मंदर नें हेलीकाप्टर से बुधवार को इन गावों में जाकर ग्रामीणों से मुलाक़ात की.

'हालात गंभीर'

हर्ष मंदर ने जब इन इलाक़ो का दौरा किया तो वह हैरान रह गए. उनका कहना था "लोग भूख से जूझ रहें हैं. भूख के साथ जी रहे हैं. इन इलाक़ों में दो महीनों में एक बार अनाज पहुंचाया जा रहा है जो काफ़ी गंभीर बात है".

लेकिन बुधवार को ही इस मुद्दे पर पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री रमन सिंह ने दावा किया कि चिंतलनार के इलाक़े में किसी की भी मौत भूख से नहीं हुई है.उनका कहना था कि पूरे इलाक़े को माओवादियों ने बंधक बनाकर रख दिया है इसलिए वहां विकास का काम नहीं हो पा रहा है.

रमन सिंह का कहना था,'' माओवादी उन इलाक़ों में किसी को जाने नहीं देते.अगर पुलिस के लोगों को भी जाना पड़ता है तो इस काम के लिए कम से कम 600 जवान लगाए जाते हैं.''

Image caption चिंतलनार माओवादियों का गढ़ है और सुरक्षाबल अक्सर माओवादी हिंसा के शिकार होते हैं.

दूसरी तरफ़ हर्ष मंदर का कहना था कि हालाकि उन्हें भूख से मौतों के कोई सुराग नहीं मिले लेकिन जिस परिस्थिति में इस इलाक़े के लोग रह रहे हैं वह काफ़ी चिंतनीय है. उनका कहना था,"यहां सरकार की मौजूदगी का कोई चिन्ह नहीं दिखता. ना पेंशन ना आंगनवाड़ी. लोग अत्यंत ग़रीबी में जी रहे हैं."

पिछले 14 मार्च को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले के मोरपल्ली में कम से कम छह ग्रामीणों की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी.

कहा जा रहा है की यह मौतें भूख की वजह से हुईं थीं मगर ज़िला प्रशासन का कहना है की इन मौतों का कारण बीमारी भी हो सकता है.

राज्य सरकार नें इस मामले की जांच के आदेश अलग से दे दिए गए हैं.

दंतेवाड़ा के तत्कालीन कलक्टर आर प्रसन्ना नें बीबीसी को बताया था कि उन्हें भी ऐसी ख़बरे मिलीं हैं कि मोरपल्ली के इलाक़े में कुछ लोग मरे हैं.

वह कहते हैं, "कितने लोग मरे हैं और कैसे मरे हैं अभी तक स्पष्ट नहीं है. हमने एक जांच दल का गठन किया है. इस दल में चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मियों के अलावा स्थानीय सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं."

पिछले मंगलवार को सर्वोच्च न्यायलय में न्यायमूर्ति दीपक वर्मा और न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी की खंडपीठ के सामने पीयुसीएल के वकील कॉलिन गोंसाल्वेज़ ने अदालत का ध्यान मीडिया की रिपोर्टों की तरफ़ आकृष्ट किया जिनमें कहा गया था कि दंतेवाड़ा के मोरपल्ली में कथित रूप से भूख के कारण कुछ आदिवासियों की मौत हुई है.

हालाकि छत्तीसगढ़ सरकार के वकील अतुल झा का तर्क था कि मीडिया की रिपोर्ट ग़लत है और उन्हें फ़ौरन किसी जांच का आधार नहीं बनाया जा सकता. मगर अदालत ने उनके तर्क को दरकिनार करते हुए कहा था कि रिपोर्ट ग़लत है या सही जांच करने में हर्ज ही क्या है.

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