'मैं डॉक्टर होने से पहले देशभक्त हूं'

हज़ारे के डॉक्टर

दिल्ली के जंतर मंतर पर अन्ना हज़ारे के हज़ारों समर्थक हर टीवी चैनल और अख़बार के पहले पन्नों पर दिखाई दे जाएंगें.

लेकिन पर्दे के पीछे भी कुछ लोग हैं जो अन्ना के समर्थन में आमरण अनशन करने के साथ-साथ उन लोगों का भी ध्यान रख रहे हैं. जिन्होंने चार दिनों से कुछ नहीं खाया है.

इनमें से एक हैं डॉक्टर प्रवीण शर्मा, जो अन्ना हज़ारे का साथ देने के लिए मुंबई से दिल्ली आए हैं और पिछले चार दिनों से आमरण अनशन पर हैं. डॉक्टर प्रवीण शर्मा मुंबई के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में न्यूरो सर्जन हैं.

अनशन करने वाले दूसरे लोगों के मुक़ाबले उनका संघर्ष ज़्यादा कठिन लगता है, क्योंकि उन्हें अपने साथ-साथ अन्ना हज़ारे और उनके साथ बैठे करीब 250 लोगों के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना होता है.

उन्होंने बीबीसी संवाददाता शालू यादव के साथ बातचीत में अपना अनुभव बयान किया.

डॉक्टर प्रवीण शर्मा की आपबीती

अन्ना हज़ारे जी की बदौलत जब सूचना का अधिकार आया, तो उसके बाद देश में बहुत से घोटाले सामने आए हैं.

बहुत से सरकारी अफ़सर और मंत्री भ्रष्ट पाए गए, लेकिन जब उन पर क़ानूनी कार्रवाई करने का वक़्त आया, तो किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. फिर मुझे अन्ना हज़ारे जी से पता चला कि हमारा क़ानून अधूरा है.

इस क़ानून में कोई समय सीमा नहीं है, जिसके तहत भ्रष्ट लोगों के ख़िलाफ कार्रवाई की जा सके और न ही कोई ऐसा प्रावधान है जिससे उन्हें तुरंत दंडित किया जा सके.

जब जन लोकपाल और सरकारी लोकपाल विधेयक के बीच मुझे अंतर मालूम हुआ, तो मुझे लगा कि मुझे अपना रोज़मर्रा का काम छोड़कर इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहिए.

आज हर आदमी अपनी नौकरी में व्यस्त है और यही कारण है कि सरकार जनता के प्रति दुर्व्यवहार करती आ रही है.

अगर हम सभी अपने काम के साथ-साथ थोड़ा वक़्त सामाजिक मुद्दों के लिए निकालें, तो पूरे देश में जागरुकता बढ़ सकती है.

मेरी अंतरात्मा ने मुझसे कहा कि मुझे सब काम छोड़कर अन्ना जी के साथ भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आमरण अनशन पर बैठना चाहिए.

अन्ना जी के साथ दिल्ली आकर ये पता चला है कि हमने बचपन में जो स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में किताबों में पढ़ा था, वो सिर्फ़ इतिहास नहीं था.

ख़ुद संघर्ष करने पर ये महसूस होता है कि उनका संघर्ष कितना कठिन रहा होगा.

प्रेरणात्मक संघर्ष

चार दिन से हमने कुछ नहीं खाया है, लेकिन फिर भी संघर्ष करने की तमन्ना है और ये संघर्ष जारी रखने के लिए मानसिक रुप से हम पूरी तरह तैयार हैं.

ये भी संभव है कि मैं अब डॉक्टर का पेशा छोड़ कर पूरी तरह देश और समाज की सेवा में कार्यरत हो जाऊं.

यहाँ आमरण अनशन पर बैठे क़रीब 250 लोगों का जज़्बा देखने लायक है. कुछ लोग बेहोशी की हालत में अस्पताल भेजे जाने के बाद वापस यहां आकर अपना अनशन जारी रख रहे हैं.

ये देख कर मुझे ऐसा लग रहा है कि भारत की जनता को क्रिकेट के अलावा एक दूसरा मुद्दा मिल गया है देशभक्ति भाव दिखाने का.

जहां तक अन्ना हज़ारे जी की बात है, तो वे शारीरिक रूप से ज़्यादा मानसिक रुप से मज़बूत हैं. उनकी इच्छाशक्ति ही उनकी ताक़त है.

हालांकि पिछले चार दिनों में उनका दो किलो वज़न कम हो गया है, लेकिन वे योग के ज़रिए अपने शरीर को कंट्रोल में रख रहे हैं.

लेकिन मेरा सरकार से एक सवाल है. क्या आप अन्ना हज़ारे की तबीयत बिगड़ने का इंतज़ार कर रहे हैं? क्या अन्ना जी का स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद ही आप इस मुद्दे को गंभीरता से लेंगें?

अगर अन्ना जी को कोई क्षति पहुंचती भी है तो हम अपना अनशन तब तक जारी रखेंगें, जब तक सरकार जन लोकपाल बिल पारित नहीं करती.

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