केरल की राजनीति

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दक्षिण भारतीय राज्य केरल राजनीतिक रुप से संवेदनशील राज्य है और शायद इसी वजह से लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता भी झेलता रहा है.

वैसे इसका गठन तीन पुराने रजवाड़ों त्रावणकोर, कोचीन और मलाबार को मिलाकर किया गया था.

वैसे एक तरह से 1947 से 49 के बीच यह राज्य अस्तित्व में आ गया था लेकिन केरल को उसका वर्तमान स्वरुप में 1956 में जब भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ. आसपास के मलयालम बोलने वाले इलाक़ों को जोड़कर केरल का निर्माण किया गया.

ईएमएस नंबूदरीपाद, एके गोपालन और टीएम वर्गीस जैसे नेताओं के साए में राज्य ने बीसवीं सदी के आरंभिक काल में राजनीतिक चेतना हासिल की.

अस्थिर राजनीति

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Image caption राजनीतिक खींचतान के बीच सीपीएम के अच्युतानंदन पिछले पाँच साल से मुख्यमंत्री बने हुए हैं

नवगठित केरल राज्य विधानसभा का पहला चुनाव मार्च, 1957 में हुआ. ईएमएस नंबूदरीपाद पहले मुख्यमंत्री बने. कुछ लोग मानते हैं कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी गई पहली वामपंथी सरकार थी. हालांकि ये सरकार सिर्फ़ जुलाई, 1959 तक रह सकी. लेकिन इसने शिक्षा और कृषि भू-सुधार के महत्वपूर्ण क़ानून बनाए.

इसके बाद फ़रवरी, 1960 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन किया और जीत हासिल करके पीटी पिल्लई के नेतृत्व में सरकार का गठन किया. इस सरकार में पहली बार मुस्लिम लीग भी शामिल हुई और उसने अपना स्पीकर नियुक्त किया.

लेकिन ये सरकार सिर्फ़ सितंबर, 1964 तक चल सकी.

तीसरी विधानसभा में ईएमएस नंबूदरीपाद पूर्ण बहुमत हासिल करके फिर मुख्यमंत्री बने लेकिन जो साल बाद उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा और सी अच्युत मेनन मुख्यमंत्री बने. पहली बार कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने इस सरकार को समर्थन दिया.

1970 में मुख्यमंत्री ने विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश कर दी और चुनाव करवाए. अच्युत मेनन फिर मुख्यमंत्री बने और केरल के राजनीतिक इतिहास में पहली बार सरकार पाँच साल चली.

पाँचवी विधानसभा में मार्च, 1977 को पहले करुणाकरण मुख्यमंत्री बने फिर 27 अप्रैल को एके एंटनी मुख्यमंत्री बने. लेकिन उन्हें भी इस्तीफ़ा देना पड़ा और सीपीआई के पीके वासुदेव नायर मुख्यमंत्री बने लेकिन वे भी अक्तूबर, 1979 तक ही पद पर रह सके.

गठबंधनों का युग

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Image caption कांग्रेस का गठबंधन इस बार सत्ता में लौटने की आस लगाए हुए है

छठवीं विधानसभा चुनाव के लिए जनवरी, 1980 में वामपंथी दलों ने सात राजनीतिक दलों को मिलाकर पहली बार गठबंधन बनाया जिसे लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) कहा गया. इस बार जीतकर उन्होंने ईके नयनार को मुख्यमंत्री बनाया. लेकिन इस सरकार ने सिर्फ़ 22 महीनों में अपना समर्थन खो दिया और दिसंबर, 1981 में फिर से करुणाकरण मुख्यमंत्री बनाए गए लेकिन उनकी सरकार मार्च, 1982 तक टिक सकी.

सातवीं विधानसभा में कांग्रेस ने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट (यूडीएफ़) नाम का गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा और मई, 1982 में बहुमत हासिल किया. करुणाकरण एक बार फिर मुख्यमंत्री बने. इसके बाद आठवीं विधानसभा में वाम गठबंधन को सत्ता मिली और ईके नयनार मुख्यमंत्री बना.

वाम गठबंधन ने विधानसभा 1991 में भंग कर दी लेकिन उनका अनुमान ग़लत निकला और सत्ता यूडीएफ़ के हाथों में चली गई. पहले करुणाकरण मुख्यमंत्री बने लेकिन उन्हें बीच में हटाकर केंद्र में भेज दिया गया और केंद्र सरकार से एके एंटनी को बुलाकर मुख्यमंत्री बना दिया गया.

राज्य में कांग्रेस में हमेशा से ही गुटबाज़ी रही और इसका फ़ायदा उठाकर ईके नयनार फिर विजयी हुए.

केरल के राजनीतिक इतिहास के अनुरूप ही एलडीएफ़ के बाद फिर यूडीएफ़ की सरकार आई और एंटनी मुख्यमंत्री बने. वर्ष 2006 में एक बार फिर पासा पलटा और एलडीएफ़ सत्ता में लौटी और वीएस अच्युतानंदन मुख्यमंत्री बने.

केरल देश में सबसे अधिक साक्षरता वाला और सबसे अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं वाला प्रदेश है. चूंकि वहाँ से एक बहुत बड़ी आबादी विदेशों, ख़ासकर खाड़ी देशों में काम करते हैं, वहाँ संपन्नता भी बहुत है. लेकिन राजनीतिक समीकरण वहाँ भी शेष देश की तरह ही है.

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