अन्ना का आदर्श गांव

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Image caption रालेगाँव सिद्धी गांव में अन्ना इसी मंदिर में रहते हैं.

अहमदनगर ज़िले में स्थित गाँव रालेगाँव सिद्धी को एक आदर्श गाँव क्यों बुलाते हैं, ये यहाँ आकर ही पता चल सकता है. यहाँ की हर चीज़ पर अन्ना हज़ारे की छाप देखी जा सकती है.

साफ़-सुथरी सड़कें, चारों और हरियाली, पक्के मकान, दुकानों में सिगरेट, बीड़ी और पान का न बिकना यही इस गाँव की पहचान है. यहाँ हर तरह की दुकानें हैं और लोग समृद्ध नज़र आते हैं.

गाँव में साफ़ सुथरे दफ़्तर हैं. बैंक, इंटरनेट की भी सुविधा है.

बाहर से आने वाले लोगों के लिए यहां ठहरने की जगह है. उनके खाने पीने का इंतज़ाम है और पढ़ने के लिए लाईब्रेरी भी है.

सोमवार को जब अन्ना दिल्ली से रालेगाँव सिद्धी पहुँचे तो उनका एक हीरो की तरह स्वागत किया गया.

मंदिर ही घर

लेकिन अनशन का असर अन्ना के शरीर पर साफ़ नज़र आ रहा था. वो कमज़ोर नज़र आ रहे थे.

उन्होंने बताया कि अनशन करने से उनका वज़न कम हो जाता है.

मंगलवार शाम को लोगों से बातचीत के दौरान मौजूद एक महिला ने जब उनसे पूछा कि कमिटी में शामिल लोगों का चुनाव ‘लोकतांत्रिक’ तरीके से क्यों नहीं किया गया तो अन्ना खीज़ से गए.

उसके बाद उन्होंने खुद को हमेशा की तरह एक कमरे में बंद कर लिया. बाहर से ताला लगा दिया गया.

अन्ना को जब निकलना होता है तो वो पास ही स्थित दफ़्तर में फ़ोन कर देते हैं और उसके बाद कमरे का ताला बाहर से खोल दिया जाता है.

अन्ना के एक सहयोगी बताते हैं कि अन्ना कई बार खुद को कई दिनों तक इसी तरह बंद कर लेते हैं.

वैसे गाँव में सभी को पता है कि भक्ति गीत के शौकीन अन्ना की दिनचर्या क्या है.

सीधी-साधी दिनचर्या

गाँव के बीच स्थित संत यादव बाबा मंदिर में रहने वाले अन्ना सुबह पाँच बजे उठ जाते हैं.

उसके बाद करीब दो घंटे तक योग, फिर दिन का काम काज करते है और इसमें लोगों से मिलना भी शामिल है.

इसके बाद वह गाँव में स्थित स्कूलों और दफ़्तरों आदि का काम निपटाते है.

वो संत ग्यानेश्वर को मानते हैं और उनकी माला गले में पहनते हैं.

जब हम रालेगाँव उनके मंदिर पहुँचे तो अन्ना भजन में लीन थे.

मंदिर के एक कमरे में अन्ना ज़मीन पर सोते हैं.

अन्ना बताते हैं कि ज़िंदगी में उन्होंने आज तक कोई इंजेक्शन नहीं लिया है.

समाज सेवा

यादव भीमाजी गायकवाड अन्ना हज़ारे के साथ बड़े हुए हैं.

वो कहते हैं, "सेना में काम करने के दौरान अन्ना के कई दोस्तों को मौत हो गई थी. रिटायरमेंट लेने के बाद वो क़रीब 1975 में गाँव आए और समाज सेवा का काम शुरू कर दिया."

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Image caption अन्ना की दिनचर्या से गांव के सब लोग वाक़िफ़ है.

जिस मंदिर में अन्ना हज़ारे का आवास है वह उनके आने से पहले बहुत बुरी हालत में था.

अन्ना के साथ काम करने वाले राजाराम शंकर गाजरे बताते हैं, "ये मंदिर बहुत पुराना था और लकड़ी का था. हालत इतनी ख़राब थी कि उस वक्त शराब बनाने वाले लोग इस मंदिर की लकड़ी का इस्तेमाल चूल्हे में करते थे. उस वक्त दो भाईयों का एक पेड़ को लेकर झगड़ा चल रहा था. अन्ना ने ग्राम सभा बुलवाई, उस पेड़ को कटवाया और उस लकड़ी का इस्तेमाल मंदिर बनाने में किया."

एक वक्त शराब की भट्टियों के लिए बदनाम इस गाँव में आज इसका नामोनिशान नहीं है.

राजाराम हंसकर बताते हैं कि जब वो छोटे थे तो उनके पिता की भी शराब की भट्टी थी और वह भी थोड़ा बहुत काम भट्टी के लिए करते थे.

जब अन्ना से सवाल पूछा गया कि केंद्र सरकार ने उनकी बात मान तो मान ली है लेकिन सालों से अनशन कर रही ईरोम शर्मीला की बात नहीं मानी गई है तो इसके जवाब में अन्ना का कहना था,"जितना समर्थन हमारे आंदोलन को मिला उतना ही सहयोग ईरोम शर्मिला के आंदोलन को मिला या नहीं मुझे नहीं पता. वह आंदोलन तो कई सालों से चल रहा है पर मुझे लगता है कहीं न कहीं संगठन में कमी रही होगी. अगर उनका संगठन भी मज़बूत होता तो शायद वह सरकार पर दबाव डाल पातीं."

ईरोम शर्मीला मणिपुर और उत्तर पूर्व के इलाकों से आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर्स ऐक्ट हटाने की मांग कर रही हैं. इस क़ानून में सेना को कई विशेष अधिकार दिए गए हैं जिनका कई संगठन और लोग विरोध करते रहे हैं.

सुरक्षा गार्ड

गाँव वाले बताते हैं कि अन्ना हज़ारे ने चाहे सेना छोड़ दी हो लेकिन सेना का अनुशासन अन्ना नहीं भूले और वो उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया.

अन्ना को लेकर कई कहानियाँ मशहूर हैं. इनमें से एक कहानी जो सबसे ज़्यादा चर्चित है वो ये कि जब एक व्यक्ति ने शराब छोड़ने से इंकार कर दिया तो अन्ना ने उसे पेड़ में बंधवाकर उसकी पिटाई भी की है.

सरकार ने अन्ना की सुरक्षा के लिए उन्हें गार्ड भी मुहैया करवाए हैं.

अन्ना के सुरक्षागार्ड मस्के बताते हैं कि छह बार उन्हें अन्ना ने ये कहकर लौटा दिया कि उन्हें सुरक्षा की ज़रूरत नहीं है.

लेकिन प्रशासन के ज़ोर देने पर वो मान गए. अन्ना की सुरक्षा के लिए चार लोग तैनात हैं जो शिफ़्ट पर ड्यूटी करते हैं.

वो दिन में एक ही बार खाना खाते हैं और रात 11 बजे के बाद ही सोते हैं.

परिवार से दूर

ये जानकार और आश्चर्य होता है कि अन्ना पिछले 35 सालों से घर नहीं गए और उन्होंने मंदिर को ही अपना घर बना लिया.

उनके तीन भाई और दो बहने हैं. लेकिन अन्ना कहते हैं कि उन्हें उनके बच्चों के नाम भी नहीं पता.

अन्ना से कई सालों तक जुड़े रहे राजाराम बताते हैं कि जब पहले वो अन्ना के माता-पिता के घर किसी काम से जाते थे तो वह बार-बार यही चिंता ज़ाहिर करते थे कि अन्ना शादी क्यों नहीं कर रहे हैं.

राजाराम बताते हैं कि अन्ना को समाजसेवा की जैसे धुन सवार थी और उन्होंने ठान लिया था कि वो शादी नहीं करेंगे क्योंकि उससे वक्त की बरबादी होगी और वो अपने काम में पूरा ध्यान भी नहीं लगा सकेंगे.

वो बताते हैं कि, "अन्ना के माँ-बाप बोलते थे कि वो घर का खाता है लेकिन काम बाहर का करता है. लड़कियाँ तो अन्ना को बहुत पसंद करती थीं. लेकिन अन्ना ने फ़ैसला कर लिया था कि वह शादी नहीं करेंगे."

राजाराम बताते हैं कि शुरुआत में जब अन्ना ने लोगों को समझाया कि वो शराब छोड़ दें तो लोग उन्हें पागल समझते थे.

लोगों को समझाने में अन्ना को करीब पाँच साल लग गए. लेकिन जब लोगों ने देखा कि एक अकेला आदमी अपना सबकुछ मंदिर के निर्माण में और लोगों को समझाने में लगा रहा है तब उनके आसपास भीड़ जुटने लगी.

राजाराम से मैंने पूछा कि अन्ना की वो कौन सी आदत है जो उन्हें पसंद नहीं, तो थोड़ा सोचकर उन्होंने कहा कि अन्ना किसी की सुनते नहीं हैं और एक बार जो उनके मन में आ गया वो वही काम करते हैं.

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