'न्यायपालिका में विश्वास क़ायम'

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Image caption पिछले साल बिनाक सेन को उम्रकैद की सज़ा सुनाए जाने के बाद राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई लोग उनके समर्थन में आगे आए हैं.

डॉ बिनायक सेन को ज़मानत मिलने पर प्रतिक्रिया देते हुए उनकी पत्नी, इलिना सेन ने कहा कि शुरुआत से ही उनका ये मानना रहा है कि ये केस सिर्फ़ राजनीति से प्रेरित है, और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से इस बात को बल मिला है.

कोर्ट से बाहर निकलने के बाद उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं राहत महसूस कर रही हूँ, लेकिन आगे बहुत लंबी लड़ाई है. संविधान और न्यायपालिका में मेरा विश्वास है लेकिन ज़रूरी है कि निचली अदालतों में उच्च अदालतों जैसी संवेदनशीलता आए."

इलिना सेना का कहना था कि वो चार साल से ये लड़ाई लड़ रही हैं जो किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता के लिए आसान नहीं है. उनका कहना था कि छत्तीसगढ़ सरकार ये साबित करना चाहती थी कि अगर कोई उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगा तो उसे बख़्शा नहीं जाएगा, और इस मक़सद में वो कुछ हद तक कामयाब हो गई है.

छत्तीसगढ़ सरकार की भूमिका

फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि ये स्वाभाविक था क्योंकि एक ऐसी अदालत ही ज़मानत की अर्ज़ी ख़ारिज करती जिसे मानवाधिकारों से कोई सरोकार ना हो.

प्रशांत भूषण ने कहा कि, "ये केस दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ सरकार कैसे माओवादियों से जुड़ी उनकी नीति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों को परेशान कर रही है."

प्रशांत भूषण ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ़ किया है कि अगर कोई शख़्स हिंसा भड़काता हो, तभी उसके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला बनाया जा सकता है.

अदालत में मौजूद सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने भी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा कि ज़मानत मिलने के बाद अब राजद्रोह के मामले से बिनायक सेन को बरी कराने की कोशिश करनी होगी.

उन्होंने कहा कि, "सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला उन समाजसेवियों के लिए बहुत सहायक होगा, जिनके ख़िलाफ़ ज़्यादा सबूत नहीं हैं पर माओवादी समर्थक होने के आरोप में देश की अलग-अलग जेलों में बंद हैं."

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन

राजद्रोह के लिए दोषी पाए गए मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ बिनायक सेन लंबे समय से छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के साथ काम करते रहे हैं.

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ शाखा के पदाधिकारी के तौर पर उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौत और कुपोषण जैसे मुद्दों को उठाया और कई ग़ैर सरकारी जाँच दलों के सदस्य रहे हैं.

पिछले साल उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाए जाने के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई लोग उनके समर्थन में आगे आए.

दुनिया भर के 40 नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने एक संयुक्त अपील जारी करते हुए बिनायक सेन की रिहाई की मांग की थी.

दिल्ली में बिनायक सेन के समर्थन में आयोजित एक कार्यक्रम में पिछले हफ़्ते लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा था कि छत्तीसगढ़ सरकार बिनायक सेन के ज़रिए सभी समाजसेवियों को सरकार के विरोध में आवाज़ उठाने से डराना चाहती है.

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