क्यों नहीं आया साक्षात्कार का बुलावा ?

Image caption नीलेश ने लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास की लेकिन उन्हें साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया.

रिकार्डर, कैसेट और ब्रेल में लिखी किताबें नेत्रहीनों के लिए पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया जटिल भी है और बेहद थकाने वाली भी, लेकिन इतनी कड़ी मेहनत के बाद मिली सफलता को सरकारी तंत्र अगर बेमानी करार दे दे तो कोई क्या करे.

कुछ ऐसी ही कहानी है नीलेश की जो इस हफ्ते बने हैं हमारे सिटीज़न रिपोर्टर.

'' मेरा नाम नीलेश सिंघल है और मैं आपको बताना चाहता हूं कि नेत्रहीनों और शारीरिक चुनौतियों का समाना कर रहे लोगों को सरकार भले ही समान अधिकार दिलाने की बात करती हो लेकिन ज़मीनी हक़ीकत कुछ और है.

जब मैं कॉलेज से एमए करके निकला तो मेरा सपना था मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करके अपने प्रदेश और देश की सेवा करना.

सालों की कड़ी मेहनत के बाद 1997, 98 और 99 में मैंने लोक सेवा आयोग की दोनों परीक्षाएं यानी प्रीलिम्स और मेन्स पास कीं, लेकिन मेरा मनोबल तब टूटा जब इसके बावजूद मुझे साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया.

आठ साल लंबा संघर्ष

मुझे परीक्षा में बैठने की अनुमती तो दी गई लेकिन साक्षात्कार के लिए यह कहकर नहीं बुलाया गया कि आप नेत्रहीन हैं और हमारे पास आपके लिए कोई सीट नहीं हैं.

लोक सेवा आयोग के इस दोहरे रवैये के खिलाफ मैंने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में आवाज़ उठाई.

मैंने दलील दी कि पीडब्लूडी यानि 'पर्सन्स विद डिसेबिलिटी एक्ट' में विकलांगों को आरक्षण देने की बात कही गई है, फिर मुझे नौकरी पाने के संवैधानिक अधिकार से वंचित क्यों रखा गया.

आखिरकार आठ साल तक किया गया मेरा संघर्ष रंग लाया और 8 अप्रैल 2008 को हाईकोर्ट ने मेरे हक़ में फैसला सुनाया और कहा कि हर तरह की विकलांगता के लिए समान आरक्षण का प्रावधान है और मुझे साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना चाहिए.

आज मैं नौकरीशुदा हूं और मेरे केस की सफलता ने शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे कई और लोगों अपने हक के लिए लड़ने की प्रेरणा दी है. ''

अगर आपके पास भी संघर्ष की ऐसी ही कोई कहानी है या फिर आपने समाज में बदलाव की पहल की है तो बनिए हमारे सिटीज़न रिपोर्टर. हमसे संपर्क करें parul.agrawal@bbc.co.uk पर.

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